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आधार : अब वृद्धि नहीं, गुणवत्ता को लक्ष्य बनाएं

कार्ड डेटा की गोपनीयता और विश्वसनीयता नहीं होगी तो यह शानदार उपलब्धि बर्बाद हो जाएगी

Danik Bhaskar | Jan 18, 2018, 04:59 AM IST
चेतन भगत, अंग्रेजी के युवा उपन्यासकार चेतन भगत, अंग्रेजी के युवा उपन्यासकार

दुनिया में थोड़ी ही चीजें होंगी, जो आधार कार्ड जितनी रफ्तार से बढ़ी होंगी। आधार कार्ड जारी करने वाली संस्था भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) की स्थापना 2009 में हुई और पहला आधार कार्ड सितंबर 2010 में जारी हुआ। सिर्फ सात वर्ष बाद जनवरी 2018 में आधार कार्ड 1.2 अरब की स्तब्धकारी संख्या तक पहुंच गए हैं। शून्य से एक अरब तक पहुंचने में सिर्फ साढ़े पांच साल लगे, यानी 5 लाख कार्ड प्रतिदिन जारी करने की सुपरसॉनिक रफ्तार।


एेसी चकराने वाली वृद्धि की तुलना के लिए सिर्फ फेसबुक जैसी कंपनियों के बढ़ने की बात मन में आती है, जिसने 2006 में पब्लिक अकाउंट खोले और 2012 तक एक अरब यूज़र तक पहुंच गई। शायद उबर का उदाहरण अधिक प्रासंगिक होगा। उबर 2011 में लॉन्च हुई और 2015 तक उसने दुनियाभर में एक अरब राइड्स पूरी कर लीं। उबर सिर्फ डिजिटल एप भर नहीं है। आधार की तरह यह वास्तविक दुनिया को जोड़ती है। किसी सरकारी योजना का दुनिया की श्रेष्ठतम इंटरनेट कंपनियों की रफ्तार से बढ़ना भारत में नहीं, विश्व में अप्रत्याशित है। इसके लिए यूआईडीएआई श्रेय की हकदार है। आधार के संभावित लाभों से इनकार करने वाले बहुत कम लोग होंगे। यह उन लोगों की पहचान कर सकता है, जो सरकारी सब्सिडी और स्वास्थ्य रक्षा के लाभ पाने के हकदार हैं। यह बिचौलियों और फर्जी लोगों को हटा सकता है, जिनके कारण सरकारी संसाधानों की बर्बादी होती है। यह सही है कि पैन कार्ड और ड्राइविंग लाइसेंस जैसे अन्य पहचान-पत्र मौजूद हैं लेकिन, यह हकीकत है कि कई भारतीयों के पास पहचान के ये दोनों कार्ड नहीं हैं। मतदाता परिचय-पत्र अधिक आम है लेकिन, यह 18 वर्ष से अधिक आयु के भारतीय नागरिकों पर ही लागू होता है। इस प्रकार आधार में यूनिवर्सिल आईडी का वादा निहित है। आधार ही ऐसा पहचान-पत्र है, (पासपोर्ट के अलावा) जिसमें बायोमेट्रिक्स शामिल है।


यहां उद्‌देश्य आधार को निशाना बनाना नहीं है। हमें पहचान-पत्र की जरूरत तो है और भारतीय समाज में आधार का अपना स्थान है। समस्या यह है कि आधार के साथ सबकुछ ठीक नहीं है। इसका मुख्य कारण है जरूरत से ज्यादा रफ्तार से बढ़ना। वास्तविक जीवन में ऐसी तेज रफ्तार का नतीजा अपरिहार्य रूप से स्टैंडर्ड कम होने में होगा। उबर का मामला फिर आता है। तेजी से बढ़ने के लिए उबर ने कई शहरों में नियमों का उल्लंघन किया। कई लेखों में उसकी कार्य संस्कृति को ‘विषैली’ और ‘महिलाओं के लिए कठिन’ बताया गया पर उसने उपेक्षा कर दी। इसने ड्राइवरों से जुड़ी कुछ घटनाअों को भौंडे तरीके से लिया। एेसी रिपोर्टें भी थीं कि कंपनी यूज़र डेटा का दुरुपयोग कर रही है और उबर के अधिकारी उन रिपोर्टरों की जासूसी कर रहे हैं, जो कंपनी के खिलाफ लिख रहे हैं। जहां कई आरोप सिद्ध नहीं हो सकें वहीं उबर के सहृ-संस्थापक और सीईओ ट्रैविस कैलेनिक को इस्तीफा देना पड़ा। उबर ने दुनिया भर में वृद्धि और प्रभाव के संदर्भ में जो हासिल किया वह अद्‌भुत है। लेकिन, यह वृद्धि की कोशिश में उठाए गलत कदमों से इनकार नहीं कर सकती। आधार के साथ भी यही हुआ। एक अरब की संख्या तक तेजी से पहुंचने की कोशिश में यू्आईडीएआई ने कई गलतियां कीं, जिन्हें सुधारने की जरूरत है। यदि ऐसा नहीं किया तो एक शानदार आईडी प्रोग्राम के सामने विश्वसनीयता खोने का जोखिम रहेगा। मुख्य समस्याएं ये हैं : एक, अकेला सबसे बड़ा मुद्‌दा- ठोस व्यवस्था का अभाव। निजी क्षेत्र के व्यक्तियों द्वारा कार्ड जारी करने का मतलब है बहुत सारे घटिया अथवा फर्जी कार्ड का सिस्टम में आना। फिर कार्ड बनाने की प्रक्रिया भी तसल्ली नहीं देती। कार्ड बनवाने के लिए मुझे ही तीन बार जाना पड़ा और हर बार सिस्टम क्रैश हुआ। कार्ड बनाने वाला शख्स टीन की चद्‌दर वाले जर्जर कमरे में बैठा था। यह ऐसी जगह नहीं हो सकती,जहां देश का सबसे महत्वपूर्ण पहचान-पत्र जारी होता हो। कितनी ही संख्या में कार्ड जारी करने हों पर आधार जारी करना गंभीर काम है। क्या हम इस तरह पासपोर्ट जारी करेंगे? लागत शायद ज्यादा आए पर आधार सेंटर बुनियादी ढांचे और जांच के मामले में पासपोर्ट सेंटर की तरह होने चाहिए।


दो, बेहतर उपकरण का इस्तेमाल कीजिए। तेज रफ्तार के लिए घटिया कैमरे और फिंगप्रिंट स्कैनर इस्तेमाल किए गए। ये उपकरण वरिष्ठ नागरिकों के फिंगरप्रिंट ठीक से नहीं लेते। आधार पर मौजूद फोटो हर व्यक्ति को किसी भूत जैसा दिखाता है। जरूरत ऐसे मजबूत प्लास्टिक कार्ड की है, जिस पर स्पष्ट फोटो और माइक्रोचिप हो। जीवनभर इस्तेमाल होने वाले कार्ड से इतनी गुणवत्ता की अपेक्षा क्या अधिक है? तीन, यूआईडीएआई वेबसाइट बहुत सुस्त है। यूज़र इंटरफेस डिज़ाइन तो 1980 के दशक का है। इससे यह भरोसा पैदा नहीं होता कि यह पहचान-पत्र जारी करने वाली दमदार संस्था है। इसे आउटसोर्स करें। चार, हर चीज को आधार से जोड़कर लोगों को धमकाएं नहीं। समय के साथ आधार लिकेंज हो जाएगा। यदि कार्ड अच्छा होगा तो लोग इसका इस्तेमाल पहचान के लिए सब जगह करेंगे। इसे जबर्दस्ती लोगों के गले उतारने की क्या जरूरत है? इससे कार्ड की बदनामी ही होती है।
पांच, प्राइवेसी और डेटा में सेंध लगने की चिंताएं वास्तविक हैं। अभी भारतीयों में प्राइवेसी के मुद्‌दे को लेकर बहुत ज्यादा संवेदनशीलता नहीं है, पर अंतत: ऐसा होगा ही। किसी भी लेन-देन, यात्रा, कहीं ठहरने या किसी चीज को खरीदने में आधार को अनिवार्य बनाना मामले को ज्यादा ही खींचना है। जैसा पहले कहा है यदि कार्ड अच्छा है तो लोग इसका इस्तेमाल करेंगे ही।


इसी तरह हाल में डेटा में लगाई गई सेंध चिंता का कारण है। यदि यूआईडीएआई का डेटा सुरक्षित नहीं है तो कार्ड में भरोसा तेजी से नीचे गिरेगा। डेटा को सुरक्षित रखना इतना कठिन भी नहीं है। सिर्फ समस्या को स्वीकार करने और उस पर काम करने की जरूरत है। वृद्धि का नशा हो जाता है और यूआईडीएआई ने जो हासिल किया है उस पर यह हवा में उड़ रहा है। जहां इसके लिए वे शाबाशी के हकदार है, वहीं वक्त आ गया कि वे आधार को परिष्कृत रूप दें और ऊपर बताई समस्याएं दूर करें। आधार की वृद्धि का चरण खत्म हो गया है। अब समय आ गया है कि यूआईडीएआई वृद्धि के लक्ष्य से हटकर गुणवत्ता को लक्ष्य बनाए।
(ये लेखक के अपने विचार हैं।)