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क्या वाकई कांग्रेस 2019 में जीत सकती है?

प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी की घोषणा सहित कुछ बदलाव लाने और तत्काल चुनावी मोड में आना जरूरी होगा

चेतन भगत | Last Modified - Feb 15, 2018, 07:14 AM IST

क्या वाकई कांग्रेस 2019 में जीत सकती है?

सबसे पहले दो बातों पर सफाई। एक, इस लेख का उद्‌देश्य कांग्रेस का समर्थन करना या भाजपा को कम आंकना नहीं है। न यह सुझाव देना है कि दोनों में से कोई बेहतर विकल्प है। दो, लेख में जिन शख्सियतों का उल्लेख है, उन्हें यह लेख लिखे जाने की जानकारी नहीं थी। उन्होंने इसे किसी भी रूप में प्रभावित नहीं किया है। हममें से कुछ वाकई विश्लेषण के उद्‌देश्य और दुनिया को बेहतर ढंग से समझने के लिए ऐसा करते हैं। अपने नेता का आंखें मूंदकर अनुकरण करने वाले झुंड इससे विचलित हो सकते हैं। उन्हें सलाह है कि वे अपने वॉट्सएप ग्रुप पर लौट जाएं।


अब मैं उस प्रश्न की ओर आता हूं, जो इन दिनों काफी पूछा जा रहा है, ‘क्या वाकई कांग्रेस के लिए 2019 में अवसर हैं?’ एक साल पहले कोई ऐसे प्रश्न नहीं पूछता था। अब भी मोदी के हारने के मौके कम ही हैं। हालांकि, कांग्रेस संबंधी प्रश्न का जवाब है, हां। कांग्रेस जीत सकती है, यदि यह कुछ बदलाव लाएं और तत्काल चुनावी अभियान के मोड में आ जाए। यहां दस बिंदु का गेम प्लान है, जो संभव है काम कर जाए। :


1. प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी की घोषणा कर देनी चाहिए।फिलहाल सर्वश्रेष्ठ विकल्प सचिन पायलट हैं। हां, राहुल गांधी नेता हैं। हालांकि, निष्पक्ष मतदाताओं में उन्हें लेकर पर्याप्त आपत्तियां हैं। ये पांच फीसदी इधर या उधर झुकाव लेने वाले वोट ही किसी को भी चुनाव में झटका देने के लिए जरूरी हैं। सचिन पायलट के पक्ष में कई चीजें हैं। एक, वे युवा हैं, जो दूसरे पक्ष के पास नहीं है। दो, उनके लहजे की स्वाभाविकता और उनका अंदाज उन्हें बुद्धिमान दर्शाता है। वे औसत भारतीय से राहुल की तुलना में बेहतर ढंग से संपर्क स्थापित कर पाते हैं। तीन, राजस्थान में उनका समर्थन आधार है, जहां कांग्रेस जीत (उसे जीतना ही होगा) सकती है, जिससे 2019 के लिए पृष्ठभूमि तैयार हो जाएगी। चार, चाहे वे भी राजनीतिक घराने से हों लेकिन, प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी के लिए योग्यता का भी कुछ योगदान है। पांच, सचिन ताजा चेहरा होंगे। पार्टी के शेष नेता तो थके हुए होंगे। ‘ताजा’ चेहरा मीडिया, सोशल मीडिया और युवा मतदाताओं में चल जाता है। जरूरी वोट जम्प देना ही पर्याप्त है। राहुल प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी का समर्थन करते हैं। वे अपने चांदी के चम्मच की यूं ही अनदेखी नहीं कर सकते लेकिन, यदि वे प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी को पूरा समर्थन देते हैं तो उन्हें प्रतिभा का सम्मान करने वाले व्यक्ति के रूप में देखा जाएगा। सचिन का ऊपर उठना तख्तापलट नहीं होगा। राहुल ही वे व्यक्ति होंगे जो जनता को सचिन देंगे। दोनों का साथ कमाल दिखाएगा।

2. उन मुद्दों पर फोकस करें, जिनसे लोग आहत हुए हैं।मोदी ने बहुत मेहनत की है। उन्हें भ्रष्ट नेता के रूप में भी नहीं देखा जाता। उनकी कई योजनाओं के पीछे अच्छा इरादा है। ऐसे किसी व्यक्ति पर हमला करना बहुत कठिन होता है। केवल वहीं कुछ किया जा सकता है, जहां उन्होंने खुद के लिए ऊंची अपेक्षाएं निर्मित कीं और कुछ करके नहीं दिखा पाए। बांटने वाली आवाजों को बंद न करना और भारत को असुरक्षित बनाए रखना ऐसी ही बात है। अर्थव्यवस्था का दम घोंटना और पर्याप्त जॉब पैदा न कर पाना दूसरा मामला है। मौजूदा करदाता पर लगातार टैक्स थोपते जाना तो हाल का मामला है।

3. अपनी कहानी लेकर सामने आए।सिर्फ भाजपा की आलोचना करना ही पर्याप्त नहीं है। सचिन (राहुल के समर्थन से) अलग क्या करेंगे? क्या वे अर्थव्यवस्था और खोलेंगे? क्या वे जनप्रतिनिधियों द्वारा सांप्रदायिक बयान देने को अपराध घोषित करेंगे? क्या वे भ्रष्टाचार रोकने के लिए आरटीआई जैसा खेल बदल देने वाला सुधार लाएंगे? दो-तीन महत्वपूर्ण मुद्दे काफी होंगे।

4. हिंदू विरोधी नज़र न आएं।कांग्रेस से लोगों के रुष्ट होने का एक कारण यह था कि वह अल्पसंख्यक वोट को ध्यान में रखने की खातिर हिंदू भावनाओं की अनदेखी कर देती थी। अल्पसंख्यकों के वोट तो पहले ही झोली में हैं। कांग्रेस को आधुनिक हिंदुत्व का हल्का, गैर-डंडामार संस्करण लाना होगा, जो नई पीढ़ी की आकांक्षाओं के अनुरूप हो और परम्परावादियों को भी संतुष्ट करे।

5. गठबंधन, गठबंधन, गठबंधन। कांग्रेस इस पल इतनी कमजोर है कि अकेली कमाल नहीं दिखा सकती। इसे गठबंधन बनाने की जरूरत है। वह जितनी ताकत चाहती है, उसमें से कुछ और उसे छोड़नी होगी। जब तक गठबंधन के सहयोगियों से घोटाला न होने की गारंटी हो (क्योंकि घोटाले सरकार को गिरा देते हैं) वह जितने संभव हो उतने गठबंधन करे, फायदा ही मिलेगा।

6. सीटों का समीकरण निर्णायक होगा।बिहार में यह काम कर गया। उत्तर प्रदेश में यह बुरी तरह नाकाम रहा। कांग्रेस को जरूरी संतुलन खोजना होगा।

7. पुराने नाम खारिज कर दें।हम सब जानते हैं कि वे कौन हैं। वे कांग्रेस नेता, जो पुरानी कांग्रेस के अहंकार और श्रेष्ठिवर्ग के रवैए का प्रतिनिधित्व करते हैं। ऐसा एक ही नेता, अन्य दस नेताओं के अच्छे काम पर पानी फेर सकता है। वे बाहर होने चाहिए।

8. निष्पक्ष मतदाताओं का पीछा करें।पहली बार वोट देने वाले और किसे वोट दें इस बारे में पक्की राय न रखने वाले नए वोटर दसियों लाख हैं। कुछ शिकायती स्वरों और वरिष्ठ भाजपा नेताओं की मौजूदगी के बावजूद भाजपा ने मोदी को आगे बढ़ाया। कारण? मोदी इन मतदाताओं को आकर्षित कर सकते थे। हायरार्की कोई भी क्यों न हो, यदि प्रत्याशी कुछ प्रतिशत अतिरिक्त वोट खींच सकें तो वही पार्टी का चेहरा है।

9.डिजिटल हो जाएं।रैलियों का अब भी महत्व है। लेकिन, हर चुनाव के साथ डिजिटल कैम्पेन का असर बढ़ता जा रहा है। क्या कांग्रेस के पास 2019 के लिए सामग्री तैयार है? छोटे वीडियो क्लिप, चित्र, डेटा- वह सब जिसे आसानी से फोन पर फारवर्ड किया जा सके और रोचक हो। इस पर काम शुरू कर दे।

10. बुराई से दूर रहें। ऊपर बताए बिंदु चुनाव जीतने का रास्ता है लेकिन, दिल में बुराई न रखें। हां, सत्ता विष होती है लेकिन, इसे अधिक विषैला बनाने की जरूरत नहीं है। भारत और भारतीयों के लिए विशुद्ध मन से कल्याण की भावना रखें और परिणाम सामने होगा।
बेशक, ऊपर बताई बातें कहने का अर्थ यह संकेत देना नहीं है कि भाजपा हारनी चाहिए अथवा उसके हारने की संभावना है। किंतु, महान लोकतंत्र तो वही होता है, जहां विपक्ष के लिए भी अच्छे मौके हों। यह जानना महत्वपूर्ण है कि ठीक-ठीक कैसे उस मौके को जीत में बदला जा सकता है। कामना है कि श्रेष्ठतम दल की जीत हो! (ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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