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राजनीति का अपराधीकरण रोकने वाला कारगर कदम

स्थिति लाने के लिए समाज में चौतरफा लोकतांत्रिक जागरूकता और सक्रियता की जरूरत है।

Dainik Bhaskar

Dec 16, 2017, 06:50 AM IST
Criminalization of politics

सुप्रीम कोर्ट ने राजनीति के अपराधीकरण पर अंकुश लगाने के उद्‌देश्य से सांसदों और विधायकों पर लगे फौजदारी के अभियोग की सुनवाई के लिए 12 विशेष अदालतें गठित करने को मंजूरी देकर एक ठोस कदम उठाया है। इससे इतनी उम्मीद जरूर बनती है कि फौजदारी मामलों को लंबित रखकर संसद और विधानसभा का सत्तासुख भोगने वालों पर सजा की तलवार जरूर लटकेगी। 2014 में चुनाव आयोग के समक्ष दायर हलफनामे के अनुसार ऐसे मामलों की संख्या 1581 है और संभव है इस बीच यह संख्या बढ़ी भी हो। यही कारण है कि केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट को यह बताने की स्थिति में नहीं थी कि वास्तव में ऐसे कितने मामले हैं। याचिकाकर्ता और दिल्ली भाजपा के नेता और वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय से लेकर सरकार और अदालत सभी का रुख यही था कि इन लंबित मुकदमों की तीव्र सुनवाई से मुख्यधारा की राजनीति से वैसे लोग बाहर होंगे जिनका व्यवहार और चरित्र आपराधिक हैं।

याचिकाकर्ता की यह भी मांग है कि सजायाफ्ता जन प्रतिनिधियों को छह साल की बजाय आजीवन चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित कर दिया जाए। अगर विधायिका इस काम के लिए तैयार होती है तो लालू प्रसाद और शशिकला जैसे राजनेताओं को चुनाव लड़ने का अवसर ही नहीं मिलेगा। इस स्थिति की व्याख्या राजनीति को पवित्र बनाने के रूप में की जा सकती है लेकिन, क्या इतने कदम से ही राजनीति पवित्र हो जाएगी? पिछले कुछ वर्षों में धर्म, जाति और लिंग आधारित अपराध बढ़े हैं और वैसा करने वाले समाज में या तो गौरवान्वित हो रहे हैं या वे लगातार बच निकल रहे हैं। उन अपराधों की तरफ सरकारों का ध्यान नहीं है और हाल के कुछ मामलों में अदालतों के कड़े फैसलों के बावजूद वे बेरोकटोक घटित हो रहे हैं।

अब ऐसा अपराध करने वाले चुनाव भले न लड़ें लेकिन, वे चुनाव को प्रभावित कर रहे हैं और ऐसा माहौल बना रहे हैं, जिनसे उनको संरक्षण देने वाले उनके आका चुनाव जीतते रहें। केरल से राजस्थान तक विचारधारा प्रेरित अपराधों ने मौजूदा राजनीति को भयानक छवि प्रदान की है और समाज में क्रूरता को बढ़ाया है। उन्हें रोकने के लिए जहां न्यायिक प्रशासन को निष्पक्ष और स्वायत्त होना चाहिए वहीं सरकारों और उन्हें चलाने वाली पार्टियों में भी संवेदनशीलता होनी चाहिए। वैसी स्थिति लाने के लिए समाज में चौतरफा लोकतांत्रिक जागरूकता और सक्रियता की जरूरत है।

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