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व्यक्ति की गरिमा के पक्ष में है सुप्रीम कोर्ट का फैसला

उन्होंने विवाह का निर्णय लिया है तो उनके विवाह को तोड़ने या उन्हें दंड देने का अधिकार सिर्फ अदालत को है।

Danik Bhaskar | Mar 28, 2018, 07:50 AM IST

सुप्रीम कोर्ट ने दो बालिग व्यक्तियों के विवाह को रद्‌द कराने वाली खाप पंचायतों को अवैध करार देकर महत्वपूर्ण फैसला दिया है लेकिन, इसके जमीनी स्तर पर लागू होने की उम्मीदें बहुत कम हैं। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट तौर पर कहा है कि अगर विवाह करने वाले युवक-युवती बालिग हैं और उन्होंने विवाह का निर्णय लिया है तो उनके विवाह को तोड़ने या उन्हें दंड देने का अधिकार सिर्फ अदालत को है। उस बारे में हस्तक्षेप करने का अधिकार किसी जाति पंचायत को नहीं है।

न्यायमूर्ति दीपक मिश्र, न्यायमूर्ति एएम.खानविलकर और न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ की खंडपीठ ने यह फैसला सुनाते हुए इस बारे में कुछ दिशा-निर्देश भी जारी किए हैं। उनका उद्‌देश्य संसद की तरफ से कानून बनाए जाने से पहले प्रशासन को कार्रवाई के लिए आधार प्रदान करना है। शक्ति वाहिनी नामक एनजीओ की याचिका के विरुद्ध खाप पंचायत के वकील की दलील थी कि वे ‘ऑनर किलिंग’ नहीं करते बल्कि अंतरजातीय विवाह भी कराते हैं। हालांकि खाप ने हिंदू विवाह अधिनियम के आधार पर सगोत्र विवाहों को रोकने की दलील दी और कहा कि ऐसा विज्ञान सम्मत है। खाप पंचायत भले कोई दलील दे लेकिन, हकीकत है कि हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान के जिन इलाकों में उनका प्रभाव है वहां के युवक अगर अंतरजातीय विवाह करते हैं तो उनके घर जला दिए जाते हैं।

उनकी महिलाओं से दुराचार होते हैं और अगर युवक युवती मिल गए तो उन्हें अलग करवा दिया जाता है या मार दिया जाता है। अगर बालिग युवक-युवती परिवार और पंचायत के नियम के विरुद्ध विवाह करके बच गए हैं तो या तो उन्होंने इलाके छोड़ दिए हैं या फिर भूमिगत हो गए हैं। जिस लोकतंत्र का संविधान नागरिकों को जीवन और निजी स्वतंत्रता का अक्षुण्ण अधिकार देता है उसे गैर-कानूनी संस्थाओं द्वारा कुचला जाना उसकी बड़ी विडंबना है।

सुधार करने वाले संगठन या तो समाप्त हो गए हैं या भयभीत हैं। उनकी जगह राजनीतिक दलों ने ले ली है, जिनका काम हर हाल में पार्टी और उम्मीदवार के लिए वोट का गणित तैयार करना है। उनके लिए संविधान के मूल्यों से ज्यादा अगला चुनाव महत्वपूर्ण है जो खाप जैसी संस्था से पंगा लेकर नहीं जीता जा सकता। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने व्यक्ति के अधिकार और गरिमा को कायम करने का स्वागत होना चाहिए। देखना है कि उसके आदेश को प्रशासन-सरकारें किस हद तक लागू करती हैं।