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लोकतांत्रिक समाज में हिंसा के लिए कोई जगह नहीं है

Dainik Bhaskar

Apr 02, 2018, 10:50 PM IST

हिंसा से न कभी कुछ हासिल हुआ है, न होगा।

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अनुसूचित जाति/ अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम को कमजोर करने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के विरुद्ध आयोजित भारत बंद उचित है लेकिन, उस दौरान होने वाली हिंसा एकदम अनुचित है। एक सभ्य और लोकतांत्रिक समाज में अपनी नाराजगी व्यक्त करने का तरीका भी शांतिपूर्ण होना चाहिए और सरकार को भी अपने नागरिकों को संभालने में कम से कम बल का प्रयोग करना चाहिए। लोकतंत्र में हिंसा के लिए कोई जगह नहीं है, क्योंकि यह न तो लाठी और बल से चलता है और न ही अनैतिक क्रियाकलापों से। लोकतंत्र की संचालन शक्ति सामाजिक और आर्थिक न्याय है और उसे अदालती स्तर पर ही नहीं बल्कि अन्य संस्थाओं के स्तर पर सुनिश्चित किया जाना चाहिए। एनडीए सरकार की ओर से अनुसूचित जाति और जनजाति समाज को सम्मान देने के राजनीतिक कदम के बावजूद अगर वह तबका नाराज है तो उसके कारणों की समीक्षा होनी चाहिए। पिछले चुनाव में उस समाज ने अपने सबसे ज्यादा जनप्रतिनिधि भाजपा के टिकट पर संसद भेजकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके संगठन में विश्वास भी व्यक्त किया था। इन सबके बावजूद गुजरात, उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्यप्रदेश और देश के दूसरे राज्यों से भारत बंद में प्रकट दलित आदिवासी आक्रोश देखकर यही लगता है कि राज्य की विभिन्न संस्थाओं के साथ धार्मिक और जातिगत स्तर पर कट्‌टर होते समाज ने भी सामाजिक न्याय के अहसास को कमजोर किया है। मौजूदा आक्रोश की वजह सुप्रीम कोर्ट का निर्णय तो है ही, जिसमें नागरिक की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए अत्याचार निरोधी कानून की अनिवार्य गिरफ्तारी की धारा को लगभग खारिज ही कर दिया गया है और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के अनुसूचित जाति और जनजाति के सासंदों के दबाव के बाद सरकार ने उस पर न्यायालय में पुनर्विचार याचिका दायर कर दी है। इसके अलावा वे कारण भी हैं जिनके तहत आर्थिक विकास के नाम पर आदिवासियों के जल जंगल और जमीन की लूट बढ़ी है और जातिवाद के चलते दलितों पर अत्याचार की बर्बर घटनाएं जारी हैं। प्रधानमंत्री मोदी भले ही अपनी सफलता का सारा श्रेय बाबा साहेब आंबेडकर को देते हैं लेकिन, देश असमानता से ग्रस्त है। यह दूर तो होना चाहिए और शिकायतों के विरोध की लोकतांत्रिक पद्धतियां भी हैं। हिंसा से न कभी कुछ हासिल हुआ है, न होगा।

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