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इस साल उपज फेंकी गई अब खेती पर फोकस रहेगा

किसान की आय दोगुनी करना ही संकट का समाधान

Danik Bhaskar | Dec 27, 2017, 02:22 AM IST
देविंदर शर्मा कृषि विशेषज्ञ और पर्यावरणविद देविंदर शर्मा कृषि विशेषज्ञ और पर्यावरणविद

जब 2017 का साल खत्म हो रहा है तो दो हताशाजनक खबरों से भारतीय कृषि की हालत का पता चलता है। उत्तर प्रदेश के आगरा व कन्नौज शहरों में कोल्ड स्टोरेज वाले सड़कों पर आलू फेंक रहे थे। आलू की 50 किलो की बोरी की लागत 100 रुपए होती है, जबकि कोल्ड स्टोरेज में प्रति बोरी 115 रुपए लगते हैं। इस तरह किसान को 15 रुपए घाटा तो बेचने के पहले ही हो जाता है। नतीजा यह हुआ कि किसान कोल्ड स्टोरेज से आलू ही नहीं उठा रहे थे। उधर, आंध्र के कुरनूल जिले के पट्‌टीकोंडा और आलूर के बाजारों में टमाटर 50 पैसे प्रति किलो रह गया। बम्पर फसल के बाद भी किसान की आंखों में आंसू उमड़ आए हैं। चार एकड़ में टमाटर उगाने में 1.40 लाख रुपए लगते हैं। फिर किराये के ट्रेक्टरों में नज़दीकी बाजार में भेजे जाते हैं। लेकिन, जब पता चला की 10 किलो का भाव 5 रुपए हैं तो गुस्से और हताशा में टमाटर सड़कों पर फेंकने के अलावा उनके पास कोई चारा नहीं था। किराया देकर वापस उपज वापस लाने का कोई औचित्य नहीं था।


2017 में सारी कृषि उपज की कीमतों का यही हाल था। कृषि क्षेत्र पर नोटबंदी का खासतौर पर असल पड़ा, जिससे यह अब तक नहीं उबर सका है। मुझे तो याद नहीं आता कि हाल के वर्षों में कृषि जिंसों की कीमत इतनी गिरी हो। दो साल लगातार सूखे के बाद 2016 के खरीफ में सामान्य या लगभग सामान्य मानसून देखा गया पर इससे कृषि क्षेत्र में उत्साह नहीं लौटा। 2017 का यह साल हाल के इतिहास में सबसे ज्यादा हताशा जनक रहा। उड़द की दाल का समर्थन मूल्य था 5,400 प्रति क्विंटल पर किसान को हर क्विंटल पर हजार से 1800 रुपए का नुकसान हुआ। सोयाबिन का समर्थन मूल्य था 3,050 प्रति क्विंटल पर बिकी 2660 से 2800 रुपए प्रति क्विंटल।


गुजरात में मुंगफली का भाव 2,675 से 2,750 रुपए प्रति क्विंटल के बीच रहा, जबकि समर्थन मूल्य था 4,450 रुपए प्रति। 5,575 प्रति क्विंटल समर्थन मूल्य की मूंग पर औसतन प्रति क्विंटल 1,600 रुपए घाटा हुआ। कपास, गेहूं, धान, बाजरा, सनफ्लावर, सरसो, प्याज और अन्य दालों व फलियों की हालत कोई बेहतर नहीं थी। किसानों में गुस्सा रहा और विरोध प्रदर्शन व रैलियां देखी गईं। कुछ शहरों में तो खाद्यान्न व सब्जियों की सप्लाई तक रोकी गई। महाराष्ट्र में शुरू हुआ यह आंदोलन मध्यप्रदेश में पांच किसानों की मौत का कारण बना। इसकी परिणति नई दिल्ली में किसान मुक्ति आंदोलन के तहत विशाल प्रदर्शन में हुई। कई और किसान संघों ने नए साल में जनवरी और फरवरी में विरोध प्रदर्शन का आह्वान किया है।


स्पष्ट है कि किसान को गुस्सा फट पड़ा है। महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्र में बीटी कॉटन की नाकामी ने किसान की हताशा और बढ़ा दी है। पहले दावा किया गया था कि बीटी कॉटन यानी आनुवांशिक रूप से सुधारी गई कपास की किस्म पर पिंक बॉल वर्म नामक कीट का कोई असर नहीं होगा पर हुआ उलटा। वही पिंक बॉल वर्म 70 फीसदी फसल खा गया। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के कमजोर अमल से कर्ज माफी की मांग और बढ़ी है। पहले ही पंजाब, महाराष्ट्र, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक 1.07 लाख करोड़ माफ कर चुके हैं। यह मांग भविष्य में और बढ़ेगी।


क्या 2018 का साल इससे बेहतर होगा। हाल के चुनाव में ग्रामीण गुजरात ने सत्तारूढ़ भाजपा को जो सबक सिखाया है, उसे देखते हुए लगता है कि आगामी बजट में फोकस फिर कृषि पर होगा, हालांकि मुझे संदेह है। किसान कर्ज की सीमा एक लाख करोड़ रुपए और बढ़ाने अथवा कुछ और योजनाएं लाने से कोई फर्क पड़ने की संभावना नहीं है। कृषि को तो किसान के हाथों में अधिक आमदनी पहुंचाने का पक्का रास्ता चाहिए। सच तो यह है कि कॉर्पोरेट एग्रीकल्चरल के लिए पूर्व शर्त ही यह है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य या खरीद के मूल्य की व्यवस्था को खत्म कर दिया जाए। फल-सब्जियां इससे बाहर कर दी गई हैं और हालात जैसे हैं उनमें गेहूं-चावल भी इससे बाहर किए जा सकते हैं। बाजार व्यवस्ता इतनी कुशल होती तो कोई कारण नहीं कि 94 फीसदी भारतीय किसान को खरीद मूल्य व्यवस्था का फायदा नहीं मिले। शांता कुमार कमेटी ने बताया था कि केवल 6 फीसदी किसान ही इसका फायदा ले पाते हैं। शेष बाजार पर निर्भर होते हैं, जिससे क्या नतीजा निकलता है, यह हम इस लेख की शुरुआत में देख चुके हैं। ऐसी स्थिति में किसान के हाथों में अधिक आमदनी आए, इसके उपाय करना ही उचित समाधान है।
वैसे भी प्रधानमंत्री ने 2014 के आम चुनाव के पहले यही तो वादा किया था। आधी राह में आकर लक्ष्य बदलकर अगले पांच साल में किसान की आय दोगुनी करने के वादे से किसानों में उत्साह नहीं लौटेगा। आइए, देखें और इंतजार करें।