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अपने साथ जोखिम लेकर आएगी आर्थिक तेजी

जीएसटी की मुश्किलें जल्दी दूर करने से ही होगा लाभ

Danik Bhaskar | Jan 05, 2018, 06:56 AM IST
धर्मकीर्ति जोशी, वैश्विक वित्तीय सलाहकार संस्था क्रिसिल के मुख्य अर्थशास्त्री धर्मकीर्ति जोशी, वैश्विक वित्तीय सलाहकार संस्था क्रिसिल के मुख्य अर्थशास्त्री

बीते साल ने सुधारों के साथ उथल-पुथल भी देखी। जीएसटी जैसा महत्वपूर्ण सुधार वज़ूद में आया और पुनर्पूंजीकरण कार्यक्रम के रूप में बैंकिंग सेक्टर को सरकार की मदद मिली। नोटबंदी के मंडराते असर और जीएसटी को लागू करने से उथल-पुथल मची। सुधारों का कुछ वक्त बाद फायदा मिलेगा पर उससे जो उथल-पुथल मची उसके तात्कालिक परिणाम होने थे। इसलिए मौजूदा वित्तवर्ष की शुरुआती दो तिमाहियों में जीडीपी गिरकर 6 फीसदी हो गई। मुश्किलें आसान होने के साथ कुल जीडीपी वृद्धि 6.8 फीसदी तक पहुंच जाएगी।


यदि जीएसटी की मुश्किलें दूर होने में वक्त लगता है और बढ़ते वित्तीय तनाव के कारण सरकारें पूंजीगत खर्च में कटौती करती हैं खासतौर पर राज्यों के स्तर पर तो शेष तिमाहियों में आर्थिक वृद्धि सीमित ही रहेगी। इन जोखिमों से 6.8 की वृद्धि के हमारे अनुमान में नीचे का रुझान निर्मित होगा। फिर 2017 उन दुर्लभ वर्षों में से था जब भारतीय अर्थव्यवस्था सुधरते वैश्विक परिदृश्य का लाभ नहीं ले सकी। 2017 में विश्व अर्थव्यवस्था ने मजबूत वापसी देखी। आईएमएफ को वैश्विक व्यापारिक माल के निर्यात की अपेक्षा है, जो पिछले तीन साल से गिरता जा रहा था। इसके 4.2 फीसदी से बढ़ने की अपेक्षा है। भारत को इसका ज्यादा लाभ नहीं मिला।


वैश्विक जीडीपी और इसका फायदा उठाने की भारत की क्षमता के हिसाब से 2018 बेहतर होगा। आईएमएफ को वैश्विक जीडीपी में 3.7 फीसदी की वृद्धि अपेक्षित है। नोटबंदी का असर लगभग खत्म हो गया है और जीएसटी की मुश्किलें दूर की जा रही हैं। सार्वजनिक बैंकों के पुनर्पूंजीकरण से ऋण देने की क्षमता बढ़ेगी। इन सब से अगले वित्तीय वर्ष में देश की जीडीपी वृद्धि दर 7.6 फीसदी तक पहुंच जाएगी। यह वृद्धि ग्रामीण क्षेत्र से संचालित होगी, क्योंकि कृषि को मुनाफे वाली बनाने की ओर तथा ग्रामीण बुनियादी ढांचे पर निवेश बढ़ाने पर सरकार का जोर होगा। 2017-18 के वित्त वर्ष में किसानों ने खासतौर पर दलहन और मोटे अनाज को लागत अथवा न्यूनतम समर्थन मूल्य से नीचे की कीमत पर बेचा। इस तरह किसानों को लगातार दो अच्छे मानसून और अच्छे उत्पादन का लाभ नहीं मिला। इसमें संदेह नहीं कि इसे उलटना बहुत जरूरी है। हमें यह जानने के लिए बजट तक इंतजार करना पड़ेगा कि सरकार इसे वित्तीय जिम्मेदारी के साथ करती है अथवा लोकलुभावन दबावों में आती है।


2018-19 के वित्त वर्ष में जोखिमें भी हैं। कच्चे तेल की कीमतों में इजाफा और विकसित देशों की मौद्रिक नीति में विसंगति प्रमुख बाहरी जोखिमें हैं। घरेलू मोर्चे पर जीएसटी के क्रियान्वयन आसान होने में देरी और बढ़ता वित्तीय दबाव उत्साह पर पानी फेर सकते हैं। 2017 के अप्रैल से नवंबर में ब्रेंट क्रूड ऑइल की कीमत पिछले साल के इसी समय की तुलना में औसतन 16 फीसदी बढ़ी है। तेल की कम कीमतों ने देश के चालू खाते और वित्तीय घाटों व महंगाई को काबू में रखा और जीडीपी वृद्धि को भी उछाल दिया। कच्चे तेल की कीमत 70 डॉलर प्रति बैरल की सीमा पार करने पर इसका असर इन मानकों पर दिखने लगेगा। विचलन दो बातों से होगा। एक, यूरोप व जापान की तुलना में अमेरिका की लंबे समय से चल रही वापसी। जहां अमेरिका लगातार सात वर्षों से बढ़ रहा है यूरोप में यह 2-3 साल पुरानी है। दो, यूरोप में वृद्धि की उक्त क्षमता के बाद भी महंगाई ऐसा मसला है जिसका पहले से संकेत नहीं मिला। नतीजा यह है कि अमेरिका ने ब्याज दरें बढ़ाना शुरू कर दिया है। इसके विपरीत यूरोजोन और जापान में ब्याज दरें लंबे वक्त तक नीचे रहने की संभावना है। एस एंड पी ग्लोबल को अपेक्षा है कि यूरोप के केंद्रीय बैंक 2019 में दरों में कटौती शुरू करेगी।


ऐसी भिन्न मौद्रिक नीतियों का नतीजा यह होगा कि पूंजी का प्रवाह अमेरिका जाएगा तथा डॉलर और मजबूत हो जाएगा। इससे भारत में पूंजी का प्रवाह प्रभावित होगा खासतौर पर बॉन्ड में विदेशी पोर्टफोलियो निवेश पर असर होगा। फिर मजबूत डॉलर स्थानीय उत्पादन पर दबाव डाल सकता है, क्योंकि वैश्विक पोर्टफोलियो संतुलन साधकर सुरक्षित क्षेत्रों में जाएगा। कितनी जल्दी एेसा होता है, यह इस बात पर निर्भर है कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व कितनी तेजी से कड़ाई बरतकर बाजारों को चकित करता है।


जीएसटी की जटिल संरचना ने सरकार के लिए प्रशासनिक व बिज़नेस के लिए पालन संबंधी लागत बढ़ा दी है। इन मसलों को सुलझाया जा रहा है पर इसमें कोई भी देरी से घरेलू कारकों से होने वाली वृद्धि सीमित हो जाएगी और वैश्विक तेजी का फायदा उठाने की भारत की क्षमता सीमित हो जाएगी। वित्तीय जोखिम भी है ही खासतौर पर राज्य स्तर पर। वित्तीय घाटे को काबू में रखने के उत्साह में केंद्र व राज्य सरकारें संभव है अंतत: पूंजीगत खर्च में कटौती कर दें।