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विचलित करने वाले दृश्यों का प्रसारण कितना उचित?

सवाल उठता है कि क्या किसी भी सभ्य समाज में ऐसे विचलित करने वाले वीडियो प्रसारित किए जाने को उचित ठहराया जा सकता है?

Dainik Bhaskar

Dec 14, 2017, 04:28 AM IST
Distracted scenesTelecast issue

राजस्थान के राजसमंद शहर में लव जेहाद के नाम पर एक शख्स ने एक अधेड़ व्यक्ति की बर्बर हत्या कर शव को आग लगा दी। इस दर्दनाक घटना का वीडियो सोशल मीडिया और कई टेलीविजन चैनलों पर दिखाई दिया। सवाल उठता है कि क्या किसी भी सभ्य समाज में ऐसे विचलित करने वाले वीडियो प्रसारित किए जाने को उचित ठहराया जा सकता है? इस सवाल का स्पष्ट जवाब 2011 में जारी न्यूज ब्रॉडकास्टिंग स्टैंडर्ड अथॉरिटी की वह गाइडलाइन देती है, जिसके मुताबिक किसी भी जीवित प्राणी के ऐसे हिंसक दृश्यों को दिखाने पर सख्त पाबंदी है, जो समाज में किसी तरह की उत्तेजना, हिंसा या आक्रामकता को बढ़ावा देते हों।


हमारे देश के संविधान में अनुच्छेद 19 के तहत नागरिकों की तर्ज पर हमारे मीडिया को अभिव्यक्ति की आज़ादी का अधिकार प्राप्त है। लेकिन मीडिया को सामाजिक-सांस्कृतिक ताने-बाने को ठेस पहुंचाने वाले दृश्यों को दिखाने से परहेज़ कर अपने नैतिक व सामाजिक दायित्व के प्रति संवेदनशीलता दिखाने की जरूरत को समझना होगा। चूंकि सोशल मीडिया, प्रिंट मीडिया, टीवी मीडिया इन सबका एक-दूसरे के साथ गहरा जुड़ाव होता है, इसलिए एक संयुक्त तंत्र विकसित किया जा सकता है, जो ऐसे दृश्यों पर निगरानी रख सकें और उल्लंघन करने की स्थिति में उचित कार्रवाई की जा सकें। तंत्र प्रभावी और सशक्त तरीके से काम करे इसके लिए हमें उन्हें अधिकार देने होंगे और उसे निष्पक्षता से काम करने की आज़ादी देनी होगी।


इसके अलावा यह भी सुनिश्चत करना होगा की सदस्यों की नियुक्ति या किसी अन्य मामले में राजनीतिक हस्तक्षेप अंतिम विकल्प के तौर पर होगा। लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ मीडिया को उनके सामाजिक प्रभावों से अवगत होना होगा। इसके लिए विशेष पाठ्यक्रम तैयार करने और उन्हें ट्रेनिंग देने जैसे उपायों पर विचार किया जा सकता है। मीडिया की जवाबदेही और समाज की ऐसी घटनाओं और दृश्यों से बचने की प्रवृति ही देश में आंतरिक शांति और सुरक्षा को सुनिश्चत कर सकती है। संवेदनशीलता का विकास हमेशा अच्छा ही होता है।

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