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बिना दवा रोगी को बचाना सबसे बड़ी खुशी

जब से मैंने मेडिकल पेशे की भावना को समझा- शायद चार साल की उम्र में ही - मैं एक डॉक्टर ही बनना चाहता था।

Danik Bhaskar | Feb 12, 2018, 07:30 AM IST

जब से मैंने मेडिकल पेशे की भावना को समझा- शायद चार साल की उम्र में ही - मैं एक डॉक्टर ही बनना चाहता था। ‘डाॅक्टर’ और ‘चिकित्सा व्यवसाय’ शब्दों का मतलब, मेरे लिए यही था कि बीमारों और जरूररतमंदों की सेवा करना। हालांकि, जब मैंने डॉक्टर के रूप में प्रैक्टिस शुरू की तब और आज की स्थिति में महत्वपूर्ण बदलाव हुआ है- कुछ चीजें बेहतर हुई हैं। लेकिन आज न तो रोगी खुश हैं और न डॉक्टर। कुछ साल पहले, फैमिली डाॅक्टर का चलन हुआ करता था, जो अब समाप्त-सा हो गया है। इसके साथ डॉक्टर-रोगी संबंध भी बिगड़े हैं। उस भरोसे को वापस लाने के लिए हमें फैमिली डॉक्टरों के काॅन्सेप्ट पर वापस जाना होगा। उस भूमिका में एक डॉक्टर परिवार के सभी निर्णयों का हिस्सा होता था। उसे पारिवारिक इतिहास, पृष्ठभूमि और आर्थिक स्थिति तक सब कुछ पता होती थी।


हर दिन टीवी शो में हम असंतुष्ट रोगियों के साथ बातचीत होती देखते हैं, लेकिन कभी ऐसा शो नहीं होता जहां संतुष्ट रोगी डॉक्टरों और अस्पतालों के बारे में अपने सकारात्मक अनुभवों की बातें करते हों। इसके बावजूद, यह सच है कि देश में अपेक्षित आयु 1947 के 45 वर्ष से बढ़कर 70 हो गई है। उपचार के लिए विदेश जाने वाले रोगियों का प्रतिशत नगण्य है। सबसे जटिल मामलों की मृत्यु दर दुनिया के बराबर है।


अन्य देशों की तुलना में चिकित्सा परामर्श की लागत भारत में सबसे कम है। कोई भी डॉक्टर सीए या वकील जैसी फीस नहीं लेता। अमेरिका जैसे देशों में परामर्श शुल्क 200 से 800 डॉलर तक होता है। भारत में बड़े अस्पतालों में भी डाॅक्टर 1000 रुपए से कम ही परामर्श शुल्क लेते हैं। जब हम बीमार पड़ें, तब किसी महंगे कॉर्पोरेट अस्पताल की बजाय पहले छोटे स्वास्थ्य सेवा केंद्र या बड़े निःशुल्क सरकारी अस्पताल में जाना चाहिए।


जब हमें कोर्ट के किसी फैसले से शिकायत होती है तब हम क्या करते हैं? हम पहले उसी न्यायाधीश से अपील करते हैं, न कि किसी बेंच में चले जाते हैं। हालांकि, जब डॉक्टरों की बात आती है, तो हम यह मौलिक सिद्धांत भूल जाते हैं- स्पष्टीकरण के लिए उसी डाॅक्टर के पास जाने की बजाय हम उसकी आलोचना करने लगते हैं। डॉक्टर इलाज की गारंटी नहीं दे सकते हैं पर अंत तक प्रयास करेंगे। पैसे से जीवन नहीं खरीदा जा सकता, यह समझ लेना चाहिए।
अगर रोगी के जीवित बचने की संभावना नहीं है, तो उपचार जारी रखना और भारी एंटीबायोटिक दवाएं देते रहना या मशीनों का इस्तेमाल करना व्यर्थ है। अस्पताल में लंबे समय तक रहने से केवल प्रतिरोधी बैक्टीरिया संक्रमण बढ़ेगा। ऐसे मरीजों को घर पर ही आगे की देखभाल करनी चाहिए और उन्हें सम्मान के साथ मुक्त होने की अनुमति होनी चाहिए। यहां पारिवारिक चिकित्सक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। डॉक्टर के लिए सबसे अच्छा शुल्क तब होता है जब एक बेहोश रोगी आंखें खोलता है, जब एक गर्भवती महिला स्वस्थ बच्चे को जन्म देती है या जब हृदय रोगी फिर जीवित हो जाता है।


डॉक्टरों को अधिक समय बीमारियों की रोकथाम के परामर्श पर लगाना चाहिए। मेरा काम यह सुनिश्चित करना है कि अगर मुझे 70 वर्ष का कोई रोगी मिले, तो मैं उसे 30 साल और जीवित कैसे रख सकता हूं। मैं उनकी वर्तमान बीमारी का कारण ढूंढ़ने की कोशिश करूंगा। मैं भविष्य की बीमारियों को आवश्यक टीकाकरण से रोकने की कोशिश करूंगा। मैं यह पता लगाने के लिए हर मौत का ऑडिट करूंगा कि क्या इसे रोका जा सकता था और सुनिश्चित करूंगा कि परिवार में किसी अन्य सदस्य को वैसी समस्या न हो। हर किसी को सीपीआर सीखना चाहिए। रोगों की रोकथाम की सलाह पर गौर करना चाहिए। सबसे बड़ी बात, डाॅक्टरों पर भरोसा करें कि वे आपकी भलाई के लिए ही हैं। हृदय रोग का डॉक्टर होने के नाते हार्ट अटैक की स्थितियों में रोगी की जिंदगी बचाना हमारी पहली प्राथमिकता होती है, क्योंकि इस रोग में सीधे जीवन पर संकट आ जाता है। ऐसे में अगर बिना दवाइयों के आप सिर्फ सीपीआर ‘बिना शॉक दिए इलाज’ से रोगी बचा लेते हैं तो हमारे लिए सबसे बड़ी खुशी होती है। यह खुशी न सिर्फ एक इंसान के बच जाने की होती है, बल्कि अपने पेशे में भी महारत का आनंद देती है। दवाइयों से रोगी की जान तो सब बचा लेते हैं मगर बिना दवा के रोगी को बचा लेने की खुशी हर बार मेरे लिए अवर्णनीय रही है। दिल्ली की डिफेंस कॉलोनी में ऐसा ही परिवार है, जिसके मुखिया को मैंने तीन बार बिना शॉक के बचाया। पूरी लाइफ में मैैंने करीब 60 केस ऐसे किए होंगे जिसमें हार्ट की गंभीर स्थितियों में बिना दवा या शॉक मरीज बच गए।
अगर आपको पैसा कमाना है तो मेडिकल प्रोफेशन आपका धर्म नहीं हो सकता। यह एक सोशल बिज़नेस है, न कि बिज़नेस। सेवा में भी पैसा मिलता है, आप उन्नति करते हैं, लेकिन पैसा उसका मूल उद्‌देश्य नहीं होता। पैसा माध्यम होता है। जो लोग यह कहते हैं कि हमने मेडिकल प्रोफेशन में आने के लिए या अस्पताल में करोड़ों लगाए हैं इसलिए पैसा वसूलेंगे, उन्हें इस पेशे में नहीं होना चाहिए। ऐसे लोग मरीज को मुनाफा कमाने की वस्तु से अधिक समझते और पूरे प्रोफेशन की बुनियाद के भरोसे को खत्म करते हैं।