संपादकीय

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खुशी कम कर रही अार्थिक विषमता पर ध्यान देना होगा

एशिया में अफगानिस्तान को छोड़कर चीन, भूटान, बांग्लादेश, नेपाल सब हमसे आगे हैं।

Danik Bhaskar

Mar 16, 2018, 12:09 AM IST
संयुक्त राष्ट्र स्थायी विकास समाधान नेटवर्क की इस साल की रिपोर्ट ने पाकिस्तान को भारत से ज्यादा खुश देश बताकर सबको हैरान कर दिया है। आतंकवाद, कट्‌टरता और भ्रष्टाचार से प्रभावित पाकिस्तान न सिर्फ भारत से ज्यादा खुश है बल्कि 156 सीढ़ियों के इस क्रम में वह हमसे 58 सीढ़ी ऊपर है। सबसे ज्यादा फिल्में और मनोरंजन चैनल वाला भारत खुशी की पायदान पर पिछले साल के मुकाबले 11 पॉइंट नीचे गिरा है तो पाकिस्तान पांच पॉइंट ऊपर चढ़ा है। भारत 133 वें नंबर, पाकिस्तान 75वें और अफगानिस्तान 145वें पर है। एशिया में अफगानिस्तान को छोड़कर चीन, भूटान, बांग्लादेश, नेपाल सब हमसे आगे हैं। संयुक्त राष्ट्र जैसी प्रतिष्ठित संस्था का आकलन होने के नाते इसे हल्के में खारिज नहीं किया जा सकता लेकिन, भारतीय लोकतंत्र में मीडिया, न्यायपालिका और व्यक्तिगत आज़ादी के साथ उसकी विकास दर को देखते हुए इस पर सहज विश्वास भी नहीं किया जा सकता। खुशी के इस सूचकांक पर हमसे बेहतर देशों की राजनीतिक स्वतंत्रता की स्थिति बहुत खराब है। हो सकता है कि छोटे देश होने के नाते वहां के लोगों में अपनी सरकार के प्रति ज्यादा विश्वास हो और भारत जैसे विशाल देश में असंतोष का स्तर ज्यादा हो। बहुसांस्कृतिक और बहुधार्मिक देश होने के नाते भारत में सामाजिक अविश्वास और तनाव का स्तर भी ज्यादा होने की संभावना है, क्योंकि ऐसे लोग आपस में राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक स्तर पर ज्यादा प्रतिस्पर्धा में उलझे होते हैं और मिलने वाले लाभ में पक्षपात की आशंका बनी रहती है। प्रधानमंत्री ने भी अपने कार्यकाल के आरंभ में कहा था कि उदारीकरण से संपन्न हुआ मध्यवर्ग अनिश्चितता में जी रहा है, क्योंकि वह कभी भी फिसलकर निचले वर्ग में आ सकता है। पहले मंदी, फिर नोटबंदी और बाद में जीएसटी ने समाज को आर्थिक रूप से दुखी तो किया है। यूपीए-2 के कार्यकाल में अमर्त्य सेन और ज्यां द्रेज ने ‘द अनसरटेन ग्लोरी’ लिखकर बताया था कि भारत मानव विकास सूचकांक पर पड़ोसी देशों से कितना पीछे है। थामस पिकेटी ने भी भारत की असमानता और गरीबी की ओर ध्यान खींचा था। हाल में आई ऑक्सफैम की रिपोर्ट भी आर्थिक असमानता की ओर संकेत करती है। ऐसे में जरूरी है कि सरकार, बाजार और नागरिक संस्थाएं इस ओर ध्यान दें।
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