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विजय दिवस : राष्ट्रीय उपलब्धि की शानदार याद

देश को दुनिया में इसके नियत स्थान पर ले जाने के लिए काम करते हुए हमें एकजुट और सकारात्मक रहना चाहिए।

bhaskar news | Last Modified - Dec 16, 2017, 07:07 AM IST

  • विजय दिवस : राष्ट्रीय उपलब्धि की शानदार याद

    सोलह दिसंबर (विजय दिवस) भारत और इसके लोगों के लिए महत्वपूर्ण तारीख है। यह सफलता, देशभक्ति और प्रतिबद्धता की प्रतीक तिथि है। इससे यह भी ध्यान में आता है कि एक राष्ट्र के रूप में हमने काफी कुछ हासिल किया है और देश को दुनिया में इसके नियत स्थान पर ले जाने के लिए काम करते हुए हमें एकजुट और सकारात्मक रहना चाहिए।


    वर्ष 1971 के भारत-पाकिस्तान संघर्ष के समय वजूद में रही पीढ़ी के हममें से कई लोगों में इससे नॉस्टेल्जिया (अतीत मोह) पैदा होता है। तब भारतीय राजनीतिक व्यवस्था अपने श्रेष्ठतम स्वरूप में थी, जिसने संकट के समय जरूरी नेतृत्व दिया। राजनीतिक विपक्ष और सरकार ने भारतीय सशस्त्र सेनाओं को समर्थन देने के लिए मिलकर काम किया। तब की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने सेनाध्यक्ष (जो बाद में फील्ड मार्शल बने) सैम मानेकशॉ को कार्रवाई करने की आवश्यक स्वतंत्रता दी, जो किसी भी सेना के लिए जरूरी होती है। सशस्त्र सेनाओं ने भी उनमें जताए गए भरोसे के मुताबिक नतीजे दिए। 1971 का साल तीनों सेनाओं की वीरता का साल था। चाहे मेजर होशियार सिंह परम वीर चक्र, सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल परमवीर चक्र, लांस नायक अल्बर्ट एक्का परमवीर चक्र, फ्लाइट लेफ्टिनेंट निर्मलजीत सेखों परमवीर चक्र हों या कैप्टन एमएन मुल्ला महावीर चक्र वे सब हमारी सामूहिक स्म़ति में राष्ट्रीय नायकों के रूप में दर्ज हैं। बसनतार, तानगैल (ढाका), हिल्ली, अखौरा अथवा नया चोर की लड़ाइयां हमारी सैन्य विरासत का हिस्सा हैं। तब के पूर्वी पाकिस्तान के ओवरऑल कमांडर एएके नियाजी का ढाका में लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत अरोरा के सामने समर्पण करने का फोटो आज कई सैन्य संग्रहालयों की दीवारों की शोभा बढ़ा रहा है। यह शानदार तरीके से भारत व इसकी सेनाओं की उपलब्धियों को व्यक्त करता है। चौदह दिनों से भी कम समय में वायुसेना और नौसेना की सहायता से भारतीय सेना पाकिस्तानी सेना की विकट किलेबंदी चीरकर ढाका के बाहरी इलाके में पहुंच गई। यह ऐसी रणनीति थी, जिसे अब नायाब रणनीति बताया जाता है।
    पाकिस्तान के पास पर्याप्त फौैज और इतने संसाधन थे कि वह आखिर तक लड़ाई लड़ सकती थी लेकिन, भारत का राजनीतिक, राजनयिक और सैन्य दबाव बढ़ने के साथ उसे सद्बुद्धि मिली। पाकिस्तानी सेना ने थोक में समर्पण कर दिया और भारतीय हाथों में 93 हजार युद्धबंदी आ गए। उन्हें भीड़ की मारकाट से सुरक्षित बचाकर भारत लाया गया और सेना की बैरकों में रख दिया गया।। जेनेवा समझौते के सारे मानकों का पालन किया गया और दुनिया में भारत की चमक और तेज हो गई।

    यह दुर्भाग्यपूर्ण रहा कि पाकिस्तान के साथ 1971 के युद्ध में जो बुद्धिमत्ता और रणनीतिक परिपक्वता दिखाई गई, वह शिमला शांति वार्ता की टेबल तक नहीं पहुंची। 93 हजार युद्धबंदियों को बिना कुछ हासिल किए लौटाना रणनीतिक महाभूल थी। शिमला में बेहतर सौदेबाजी से भविष्य के लिए स्थिति सुलझ जाती। शायद इस गलत धारणा के तहत भारतीय सेना की राय नहीं ली गई कि संघर्ष बाद की सारी वार्ताएं राजनीतिक-राजनयिक जिम्मेदारी है, जिसमें सेना की कोई भूमिका नहीं है। जहां विडंबना यह है कि भारत पाकिस्तान से केवल यह आश्वासन ले पाया कि जम्मू-कश्मीर की समस्या द्विपक्षीय आधार पर चर्चा से सुलझाई जाएगी। हम जानते हैं कि कैसे पाकिस्तान ने 1978 से 1984 के बीच सियाचिन ग्लैशियर पर कब्जा करने की कोशिशों से शिमला समझौते का उल्लंघन किया। आखिरकार भारत ने 1984 के साहसी अभियान में उसे मात देकर वहां अपना प्रभुत्व कायम किया। यह ज्यादा लोगों को मालूम नहीं है कि हमने पाकिस्तान की हिरासत से सभी भारतीय युद्धबंदियों की रिहाई सुनिश्चित नहीं कराई। हमारे कम से कम 56 कैदी अब भी पाकिस्तानी जेलों में सड़ रहे हैं और उनके परिवार दुख में डूबे हुए हैं।


    विजय दिवस जैसे जीत के दिनों का सशस्त्र सेनाओं की क्षमता, बहादुरी, देशभक्ति और बलिदान के प्रति विश्वास और राष्ट्रीय अस्मिता की अभिव्यक्ति के लिए अत्यधिक प्रतिकात्मक महत्व होता है। लेकिन, जैसे पीढ़ीगत बदलाव होता है तो यह महत्वपूर्ण है कि हमें न सिर्फ इन विजयों का उपयोग राष्ट्र को एकजुट करने में करना चाहिए बल्कि उतना ही जरूरत नई पीढ़ी को उन घटनाओं की जानकारी देना भी, जिनका हम जश्न मनाते हैं। 1971 के युद्ध को इतिहास की पुस्तकों, फिल्मों, संग्रहालयों,कला की चीजों, स्मारकों आदि में बेहतर ढंग से दर्ज करने की जरूरत है ताकि राष्ट्र की सामूहिक स्मृति में उनकी याद सतत बनी रहे। भारतीय फिल्म उद्योग ने ‘बॉर्डर’ जैसी फिल्मों से अच्छा काम किया है लेकिन, वे कुछ ही हैं। कई और स्पॉन्सर करने की जरूरत है। भारत में सैन्य वर्दी और पेशे को जनता बहुत सम्मान देती है लेकिन, यह सिर्फ सतह ही है। इसमें राष्ट्र के लिए सैनिक जो गहरी प्रतिबद्धता व साहस दिखाने के साथ बलिदान करते हैं उसकी समझ नहीं होती।


    सैन्य पेशे के बारे में ज्यादा कुछ मालूम नहीं है और एक विषय के रूप में राष्ट्रीय सुरक्षा अब कहीं विद्वानों और शोधकर्ताओं को आकर्षित करने लगा है। हमें एक नेशनल डिफेंस यूनिवर्सिटी की सख्त जरूरत है, जिसका मसला पिछले 16 वर्षों से अधरझूल में है। इसके गठन से राष्ट्रीय सुरक्षा के महत्वपूर्ण पहलू के नॉलेज मैनेजमेंट को प्रोत्साहन मिलेगा और उसमें लोगों की अधिक रुचि जागेगी। दुर्भाग्य से पाकिस्तान का जो खतरा 1971 में खत्म हो जाना चाहिए था वह उत्तरोत्तर फिर बढ़ गया है। 1989 में इसने ‘वॉर बाय थाउंजेंड कट्स’ की रणनीति के तहत जम्मू-कश्मीर में छद्म युद्ध छेड़ने का निर्णय लिया। उद्देश्य था उसे जो उसे भारत की खामियां लगती थी उसे भुनाना, अलगाव भड़काकर जम्मू-कश्मीर को हथियाने का प्रयास करना और भारत को उपद्रव की स्थिति में उलझाकर रखना ताकि यह अपनी राष्ट्रीय आकांक्षाएं पूरी न कर सके।


    भारत के सामने सैन्य स्तर पर बलशाली होने के अलावा चारा नहीं है। सैन्य बलों में उचित भर्ती, उन्हें संसाधनों की पूर्ति और अधिकतम संभव प्रशिक्षण देना होगा ताकि हमारे प्रभुत्व को सुनिश्चित रखा जा सके। हमें पाकिस्तान व चीन से दोहरा खतरा है, जो सिर्फ जमीनी सीमाओं तक सीमित नहीं रह गया है। समुद्री, अंतरीक्ष, साइबर, मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और आर्थिक क्षेत्रों में भी हमारे शत्रु हमें अन्य प्रकार के संघर्षों में उलझा सकते हैं।(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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Web Title: Great Memories Of National Achievement
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)

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