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उच्च शिक्षा में टीचिंग के साथ शोध को भी महत्व देना होगा

शोध की समाज में बहुत कद्र है और इसी वजह से वहां नोबेल पुरस्कारों की भरमार नज़र आती है।

देवेन्द्रराज सुथार | Last Modified - Feb 14, 2018, 08:02 AM IST

  • उच्च शिक्षा में टीचिंग के साथ शोध को भी महत्व देना होगा
    देवेन्द्रराज सुथार, 21 जयनारायण व्यास विश्वविश्वद्यालय जोधपुर, राजस्थान

    उच्च शिक्षा में शोध की भूमिका सबसे अहम होती है। शोध के स्तर और उसके नतीजों से ही किसी विश्वविद्यालय की पहचान बनती है। लेकिन भारत में उच्च शिक्षा में शोध को बहुत गंभीरता से नहीं लिया जाता। इसकी वजह भारत में जब उच्च शिक्षा संस्थानों की शुरुआत हुई थी तो टीचिंग के ऊपर ज्यादा ध्यान दिया गया, रिसर्च को बहुत महत्व नहीं दिया गया। अमेरिका का उदाहरण लें तो वहां शोध की समाज में बहुत कद्र है और इसी वजह से वहां नोबेल पुरस्कारों की भरमार नज़र आती है।


    भारत में सकल घरेलू उत्पाद का मात्र 0.8 फीसदी शोध पर खर्च किया जाता है जो चीन और कोरिया से भी काफी कम है। यह भी एक तथ्य है कि दुनिया में ऑक्सफोर्ड, कैम्ब्रिज, हार्वर्ड जैसे शिक्षा के बड़े केंद्र हैं वे अपने शोध के ऊंचे स्तर और शोधार्थियों की गुणवत्ता की वजह से ही जाने जाते हैं। अमर्त्य सेन (हार्वर्ड विश्वविद्यालय), जगदीश भगवती (कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय), हरगोविंद खुराना (लिवरपूल विश्वविद्यालय) ने अपने शोध की वजह से न केवल भारत का नाम रोशन किया बल्कि जिन विश्वविद्यालयों से ये जुड़े, उनकी प्रतिष्ठा को भी इन्होंने आगे बढ़ाया। भारत में वस्तुस्थिति यह है कि पहले के मुकाबले यहां शोध के क्षेत्र में सुविधाएं बढ़ी हैं। विश्वविद्यालयों में प्रयोगशालाओं का स्तर सुधरा है, इंटरनेट की सुविधा आज शोधार्थियों को आसानी से उपलब्ध है, आर्थिक रूप से भी सरकार शोध करने वालों को पर्याप्त मदद देती है। ऐसे में सवाल उठता है कि जब तुलनात्मक रूप से सुविधाएं बढ़ी हैं तो शोध का स्तर क्यों नहीं बढ़ रहा, क्योंकि यहां शोध जिज्ञासा का नहीं औपचारिकता का अंग बनकर रह गया है।


    शिक्षा कोे समाजोपयोगी बनाने के लिए यह बेहद जरूरी है कि छात्र और शिक्षक दोनों की अनुसंधान के प्रति सोच ईमानदार हो और वो विषय में कुछ नया जोड़ने के उद्‌देश्य से ही इस दिशा में आगे बढ़ें। शोध महज शोध की औपचारिकता के लिए न हो बल्कि उससे वैश्विक स्तर पर अनुशासन को गति मिले। इन सबके लिए सबसे जरूरी है नीति नियंताओं की नीयत का साफ होना ताकि शोध के प्रति सरकारकी अवधारणा भी बदले।

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