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चीन को देखते हुए तिब्बत पर भारत की व्यावहारिक रणनीति

तिब्बत सरकार के दिल्ली में होने वाले एक कार्यक्रम को रद्‌द कर दिया गया है और दूसरे को धर्मशाला ले जाया गया है।

Bhaskar News | Last Modified - Mar 07, 2018, 05:17 AM IST

अंतरराष्ट्रीय स्थितियों के मद्‌देनज़र भारत चीन से किसी तरह का टकराव नहीं चाहता। यही कारण है कि तिब्बत सरकार के दिल्ली में होने वाले एक कार्यक्रम को रद्‌द कर दिया गया है और दूसरे को धर्मशाला ले जाया गया है। इस साल 31 मार्च को दलाई लामा के तिब्बत से भारत आने के 60 साल पूरे हो रहे हैं और तिब्बत सरकार ने उस आगमन को स्मरणीय बनाने के लिए 31 मार्च और 1 अप्रैल को दिल्ली में दो कार्यक्रम निर्धारित किए थे। इनमें अंतर-आस्था का कार्यक्रम राजघाट स्थित गांधी समाधि पर और भारत को आभार जताने वाला दूसरा कार्यक्रम त्यागराज स्टेडियम में होना था।

इस बीच सरकार की तरफ से जब अपने पदाधिकारियों को कार्यक्रम में भाग लेने से मना किया गया तो पहला रद्‌द कर दिया गया और दूसरा धर्मशाला में करने का फैसला लिया गया। हालांकि, भारत सरकार ने इस फैसले के पीछे कोई कारण नहीं बताया है लेकिन, पिछले दिनों हुए भारत के विदेश सचिव विजय गोखले के चीन दौरे और जून में शंघाई सहयोग संगठन में होने वाली प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भागीदारी के मद्‌देनज़र इस स्थिति को समझा जा सकता है।

भारत सरकार नहीं चाहती कि चीन भारत की सीमा पर डोकलाम जैसी स्थिति फिर उत्पन्न करे। निश्चित तौर पर तिब्बत की समस्या जटिल है और भारत मानवीय आधार पर तिब्बत की निर्वासित सरकार और परम पावन दलाईलामा के साथ पूरी सहानुभूति रखता है। इसीलिए उसने उन्हें अपने देश में पनाह दे रखी है।

इसके बावजूद चीन की आक्रामक नीति और तिब्बत के लिए विशेष संवेदनशीलता को देखते हुए भारत इस स्थिति में नहीं है कि वह इस मुद्‌दे का कोई राजनयिक लाभ उठाए। भारत को चीन के साथ न सिर्फ व्यापारिक रिश्तों का निर्माण करना है बल्कि पाकिस्तान के संदर्भ में उसे उदासीन भी करना है। चीन ने हाल में यूरोपीय देशों द्वारा पाकिस्तान को निगरानी सूची में डाले जाने पर कोई आपत्ति नहीं की थी, जो सहयोग का संकेत था।

दूसरी ओर, भारत ने भी चीन का ध्यान रखते हुए मालदीव में किसी तरह का सैन्य हस्तक्षेप नहीं किया है। अमेरिकी राष्ट्रपति की आयात विरोधी नीतियों के कारण भारत और चीन को एक साझा मुद्‌दा मिल सकता है, जिस पर जून के सम्मेलन में दोनों में नज़दीकी बढ़ने की गुंजाइश है। चीन से सहयोग और विश्वास निर्माण की इन स्थितियों के बीच तिब्बत पर भारत का निर्णय व्यावहारिक है।

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