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राहुल को अपनी सोच की कांग्रेस बनानी होगी

धर्मनिरपेक्षता, समाजवाद और सामाजिक न्याय की विरासत पर भाजपा से मुकाबले की चुनौती।

jaishankar gupta | Last Modified - Dec 13, 2017, 06:44 AM IST

  • राहुल को अपनी सोच की कांग्रेस बनानी होगी

    अब 132 साल पुरानी कांग्रेस की कमान 47 वर्षीय राहुल गांधी के हाथों में आ गई है। हालांकि पार्टी के उपाध्यक्ष और पिछले 19 वर्षां से कांग्रेस की कमान संभाल रहीं सोनिया गांधी के पुत्र राहुल का अध्यक्ष बनना औपचारिकता भर ही रह रह गई थी, क्योंकि हाल के दिनों में खासतौर उपाध्यक्ष बनने और सोनिया के अस्वस्थ रहने के बाद से कांग्रेस का कामकाज वही संभाल रहे थे। इंतजार था तो बस उस घड़ी का जब उन्हें नेहरू-गांधी परिवार के छठे सदस्य के रूप में कांग्रेस का 60वां अध्यक्ष चुना जाना था। राहुल गांधी ने संभवतः जानबूझकर ऐसी घड़ी चुनी जब वे गुजरात विधानसभा के चुनाव मैदान में राजनीतिक जंग एक तरह से अकेले दम पर लड़ रहे हैं। उन्होंने अपने पदभार ग्रहण की तिथि भी 16 दिसंबर की चुनी है, जिसके दो दिन बाद ही हिमाचल प्रदेश और गुजरात विधानसभा के चुनावी नतीजे सामने आ जाएंगे।


    गुजरात के चुनाव अभियान में अपने सौम्य मगर आक्रामक तेवरों के जरिये पहली बार राहुल और कांग्रेस ने प्रधानमंत्री मोदी और उनके राजनीतिक सिपहसालारों को गुजरात में पिछले 22 वर्षों के भाजपा शासन की उपलब्धियों, गुजरात मॉडल और विकास के मुद्दों पर निरुत्तर कर दिया। गुजरात के नतीजे चाहे जो हों, कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में राहुल गांधी की चुनौतियां कम नहीं हो जाएंगी। कुछ ही महीनों बाद उन्हें कर्नाटक, मेघालय, मिजोरम, नगालैंड और फिर राजस्थान, मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में चुनावों का सामना भी करना पड़ेगा। फिर विधानसभा और लोकसभा चुनाव साथ करवाने की भी चर्चा है। ऐसे में अगले कुछ महीनों के भीतर ही राहुल को एक ऐसा कांग्रेस संगठन खड़ा करना पड़ेगा, जो पिछले लोकसभा चुनाव में 44 सीटों तक सिमट चुकी और कई राज्य गंवा चुकी कांग्रेस भाजपा को कड़ी राजनीतिक चुनौती दे सके। इसके लिए उन्हें कांग्रेस संगठन में आमूलचूल परिवर्तन कर अपनी सोच और समझ की कांग्रेस बनानी होगी, जिसमें अनुभव और युवा उत्साह का समन्वय आवश्यक होगा।


    उन्हें कांग्रेस को विरासत में मिली धर्मनिरपेक्षता, समाजवाद और सामाजिक न्याय के पथ पर चलने के साथ ही उनकी ओर आकर्षित हो रहे युवाओं और अपने जनाधार को संदेश देना होगा कि उनकी कथनी और करनी में कोई भेद नहीं होगा। इसके लिए उन्हें बीच-बीच में और खासतौर से महत्वपूर्ण और निर्णायक अवसरों पर विदेश चले जाने की प्रवृत्ति छोड़नी होगी। देश, समाज और कांग्रेसजनों को संदेश देना होगा कि वे फुल टाइम राजनीति के लिए ही मैदान में हैं। हाल के दिनों में, खासतौर से उनकी पिछली अमेरिका यात्रा के बाद से ही उनमें एक परिपक्व राजनीतिज्ञ के अक्स दिखने और महसूस किए जाने लगे हैं। जिस तरह से अध्यक्ष पद का नामांकन होने के बाद उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति और वरिष्ठ कांग्रेस नेता प्रणब मुखर्जी और पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के घर जाकर उनका आशीर्वाद लिया वह उनकी भावी राजनीति में मददगार साबित हो सकता है, खासतौर से दोनों वरिष्ठ और बुजुर्ग कांग्रेस नताओं का अनुभव और सलाह सुझाव उनके लिए कारगर साबित होगा। गुजरात के चुनाव में भी जिस तरह से उन्होंने मणिशंकर अय्यर जैसे फिसलती जुबान के लिए मशहूर नेताओं पर अंकुश लगाया और चुनाव मैदान में मनमोहन सिंह को पेश कर प्रधानमंत्री मोदी को कठघरे में खड़ा करने में कामयाबी हासिल की वह भी उनमें बढ़ती राजनीतिक सूझ-बूझ का ही परिचायक था। लेकिन गुजरात के चुनाव में जिस तरह से उन्हें जनेऊधारी ब्राह्मण के रूप में पेश करने की कोशिश की गई, उसकी जरूरत नहीं थी। देश की राजनीति में शिखर पर पहुंचने के लिए किसी एक धर्म और जाति का होना और उसे प्रचारित करना आवश्यक नहीं है। राहुल गांधी को अपने इर्दगिर्द जमा कुछ बड़े नेताओं, सलाहकारों और उनकी सलाह से मुक्ति पानी होगी, जो समाज के मुखर तबके से आते हैं लेकिन अपने तबकों के बीच उनका अपना कोई आधार नहीं है। वे मानसिक तौर पर राहुल गांधी की भावी राजनीति और विचारों के साथ मेल नहीं खाते।


    कांग्रेस की राजनीति में वंशवाद की बात नई नहीं है। न सिर्फ उनके विरोधी बल्कि पार्टी के भीतर भी कुछ बड़े लोग उन्हें इस आरोप की कसौटी पर घेरने की कोशिश करेंगे। प्रधानमंत्री मोदी ने हाल ही में परोक्ष रूप से ऐसा किया ही था। हालांकि इससे पहले स्वयं राहुल ने भी राजनीति में वंशवाद को गलत करार दिया है। देश के मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में आज इक्का-दुक्का अपवाद छोड़ दें तो शायद ही कोई राजनीतिक दल होगा, जिसमें टिकटों के वितरण से लेकर संगठन और सरकार में पदों के वितरण में पारिवारिक पृष्ठभूमि को महत्व नहीं दिया जा रहा हो।


    देर से ही सही लेकिन राहुल गांधी ने सोशल मीडिया में एक आक्रामक और महत्वाकांक्षी नेता के तौर पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है, जो उनके पुराने और अड़ियल राजनेता की छवि से अलग है। राहुल गांधी को कांग्रेस की अपनी कमजोरियों और उसके कारणों की पहचान भी करनी होगी। उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, झारखंड, आंध्र प्रदेश आदि कई ऐसे राज्य हैं जहां कांग्रेस अकेले अपने बूते भाजपा को चुनौती नहीं दे सकती। ऐसे राज्यों में उसे गैर कांग्रेसवाद की तर्ज पर गैर भाजपावाद की नई रणनीति तैयार करनी होगी।


    अभी तक राजनीतिक युद्ध के मैदान और मुद्‌दे भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही चुनते रहे हैं। पहली बार गुजरात के चुनाव में राहुल गांधी और उनके नेतृत्व में कांग्रेस के लोग मोदी के मायाजाल में फंसे बिना उन्हें ही नोटबंदी से लेकर जीएसटी और गुजरात के विकास के मामले पर उन्हें घेरने और निरुत्तर करने में कामयाब रहे। राहुल गांधी को इस शैली को और परिष्कृत कर अपनी भावी राजनीति को संवारना होगा। आम आदमी की बोलचाल की भाषा में उनके भाषणों को लोग पसंद करने लगे हैं।


    उन्हें प्रधानमंत्री मोदी के विरुद्ध आक्रामक होने के साथ उन पर लगाए जा रहे आरोपों को तथ्यपरक बनाना होगा। उन्हें हमेशा यह ध्यान में रखना होगा कि उनका सामना मोदी जैसे वाकपटु नेता, उनके साथ लगी मजबूत टीम और भाजपा के कार्यकर्ताओं के साथ ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की संगठन शक्ति भी है जबकि कांग्रेस का संगठन केंद्र से लेकर अधिकतर राज्यों में पस्तहाल, लचर और बडबोले नेताओं के कब्जे में हैं।
    (ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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Web Title: Jaishankar Gupta Talking About Rahul Gandhi And Congress
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