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भीतर सेवाभाव उतारें, संतत्व मिल जाएगा

​संत के पूरे व्यक्तित्व में सेवाभाव होता है। लेकिन जिसके भीतर सेवा उतरे फिर वह स्वत: संत हो जाएगा।

Dainik Bhaskar

Dec 23, 2017, 04:10 AM IST
jeene ki raah by pandit vijay shankar mehta
संत केपूरे व्यक्तित्व में सेवाभाव होता है। लेकिन जिसके भीतर सेवा उतरे फिर वह स्वत: संत हो जाएगा। इन दिनों संत की परिभाषा अलग-अलग ढंग से की जा रही है। परंतु सच तो यह है कि यदि आपके भीतर सेवाभाव उतर गया तो संतत्व अपने आप उतर आएगा। इसके लिए तो अलग से कोई वस्त्र पहनना है, किसी आश्रम में जाना है, शास्त्रों का अध्ययन कर उनके शब्दों को लोगों के बीच उछालना है। सेवा का मतलब है दूसरों की जरूरतों को समझते हुए उनकी पूर्ति करें। इतने सहज और सुविधाजनक हो जाएं कि कोई भी आपके साथ समय बिताने, आपका साथ करने में निश्चिंत हो जाए। मन, वचन और कर्म से इतने भरोसेमंद हो जाएं कि लोग हर पल आपकी, आपके सान्निध्य की आकांक्षा करें। सेवा सौदा नहीं बन सकती। किस क्षेत्र में सेवा करना है, इसकी भी चिंता छोड़िए। बस, प्रेमपूर्ण हो जाएं। इसमें भी दिक्कत हो तो करुणामय होते हुए विचार करें कि जीवन में सजीव या निर्जीव जो भी वस्तु आएगी, उसके प्रति सेवा का भाव रखेेंंगे, उसकी मदद करेंगे। एक सबसे बड़ी सेवा जिसमें धन लगता है, बल की जरूरत होती है, यह होगी कि स्वयं भी खुश रहें और अपने संपर्क में आने वाले सभी लोगों को खुश रखें। खुश रहना एक अभ्यास होगा पर औरों को खुश रखना सेवा हो जाएगी। बिना धन खर्च किए आप मानवता की बहुत बड़ी सेवा कर जाएंगे। जैसे ही हमारे भीतर सेवाभाव उतरा, जिस संतत्व की खोज में बावले हो रहे हैं, वह ईश्वर से भेंट के रूप में मिल जाएगी।
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