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जीने की राह की राह: गलत कामों से भीतर प्रकाश घटता जाता है

जीने की राह कॉलम पं. विजयशंकर मेहता जी की आवाज में मोबाइल पर सुनने के लिए टाइप करें JKR और भेजें 9200001164 पर।

Dainik Bhaskar

Mar 13, 2018, 06:35 AM IST
jeene ki rah column pt vijayshankar mehta

दीपक जब बुझता है तो लोग समझते हैं कि उसने आत्महत्या कर ली। लेकिन थोड़ी तसल्ली से दीपक के पास जाकर देखें तो कत्ल का इरादा लिए हवा के निशान मिल जाएंगे। ऐसी दार्शनिक बात हमारे द्वारा किए उन कार्यों के लिए की जाती है, जो गलत होते हैं पर हम मानते नहीं। आदमी जब भीतर का प्रकाश बुझता है तब गलत काम करता है, पर इसका उल्टा भी होता है।

जब आप गलत काम करने पर उतर आते हैं तो भीतर का प्रकाश धीरे-धीरे मंद होने लगता है। इस जगह को चित्त कहा गया है। चित्त का शास्त्रों में शाब्दिक अर्थ है स्वयं प्रकाश। यदि आप भीतर से प्रकाशमान यानी क्लीयर हैं, अपनी गतिविधि के प्रति स्पष्ट हैं तो बाहर गलत काम नहीं करेंगे। अंगद रावण को समझा रहे थे उसी समय उन्हें हनुमान याद आ गए।

हनुमानजी ने लंका से लौटकर रावण के बारे में जो टिप्पणी की थी उसमें कहा था कि वह इतना अधिक गलत काम करने पर उतर आया है कि न तो उसमें लाज बची है, न पराजित होने पर उसमें क्रोध पनपता है और न ही गलत बातों के प्रति उसे चिढ़ है। तुलसीदासजी ने इस पर लिखा है, ‘देखेउॅ आइ जो कछु कपि भाषा। तुम्हरें लाज न रोष न माखा।। अर्थात अंगद रावण से कहते हैं- हनुमान ने तुम्हारे बारे में जो-जो कहा था, आज मैंने प्रत्यक्ष देख लिया है। सचमुच न तो तुम्हें लज्जा है, न क्रोध और न ही चिढ़ है। जब किसी को अपने किए गलत आचरण पर न लज्जा रहे, न गुस्सा या चिढ़ आए, फिर उसके पतन को कौन रोक सकता है?

जीने की राह

पं. विजयशंकर मेहता
humarehanuman@gmail.com

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