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कल्पेश याग्निक का कॉलम : क्यों हम सभी को बजट पर बहस करनी ही चाहिए

कल्पेश याग्निक | Last Modified - Feb 03, 2018, 07:20 AM IST

नवोदय जैसे एकलव्य बना दिए। और ऐसी ‘शैक्षणिक क्रांति’ 2022 तक होगी!
कल्पेश याग्निक का कॉलम : क्यों हम सभी को बजट पर बहस करनी ही चाहिए

‘दो पुराने शिक्षा अभियानों को मिला दिया। ब्लैकबोर्ड को डिजिटलबोर्ड कह दिया। नवोदय जैसे एकलव्य बना दिए। और ऐसी ‘शैक्षणिक क्रांति’ 2022 तक होगी!

सपनों को विस्फारित आंखों से दिखाना ही बजट है।’

-बजट 2018-19 पर एक निरर्थक विचार

स्थान : कॉफी हाउस। समय : दोपहर। माहौल : गर्म और ग़र्मजोशी भरा।

प्रोफ़ेसर : पता नहीं मोदी सरकार को मिडिल क्लास से क्यों चिढ़ हो गई है?
वकील : मैं तो शुरू से कह रहा हूं। भाजपा शहरों से वोट लेती है। गांवों को नोट देती है।
सप्लायर : लेकिन आप तो कांग्रेसी ठहरे!
पत्रकार : यहां बजट की बात हो रही है। कांग्रेस-भाजपा की नहीं। जो मध्यमवर्गीय लोगों को छला गया है, वो न अच्छी इकनॉमिक्स है, न ही अच्छी पॉलिटिक्स।
कारोबारी : मैं तो मोदीजी का प्रशंसक हूं। लेकिन मुझे समझ में ही नहीं आता कि वित्त मंत्री अरुण जेटली हर बजट में एेसा कुछ न कुछ क्यों कर जाते हैं कि एक बड़ा तबका मोदीजी से ही नाराज़ हो जाता है?
वकील (रोकते हुए) : जी, नहीं। मोदीजी के रहते जेटली क्या कर सकते हैं? कोई भी क्या कर सकता है? सब डरते हैं। चुपचाप वही करते हैं - जो आदेश होता है! गुजरात में हार से बस बचे थे। इसलिए अब गांव-ग़रीब याद आए।


पत्रकार : बजट में सबकुछ बुरा ही नहीं हुआ। 5 साल का ग़रीबों का बीमा तो मास्टर स्ट्रोक है। कोई ऐसा बिग आइडिया पहले नहीं ला पाया। बस, चक्कर यही है कि ये लागू कैसे होगा?
छात्र : आप पत्रकारों को देखा है मैंने कि प्रशंसा भी बड़ी शंका के साथ करते हैं। इतना बड़ा काम किया है - तो इलाज भी करवाएंगे ही। क्यों नहीं करवाएंगे?
प्रोफ़ेसर : कैसे करवाएंगे? पैसे कहां हैं? पढ़ा है न कि सिर्फ़ 10% लोग भी पूरे बीमा कवरेज के बराबर का इलाज करवाएंगे - तो ढाई लाख करोड़ रु. चाहिए। कहां से आएंगे?
वृद्ध : (कड़क आवाज़ में) सब आ जाएंगे। सरकार चलाना जानते हैं मोदीजी। आप से पूछने की जरूरत नहीं हैं उन्हें। कोई मनमोहन सिंह तो हैं नहीं वे, कि पूछकर करना पड़े...
वकील : दादा, आप ग़लत बात कर रहे हैं। मनमोहन सिंह ही लाए थे लिबरलाइज़ेशन। देख लीजिए, आपके चश्मे, घड़ी, जूते। सभी विदेशी। लेकिन यहीं मिल गए। वाज़िब दामों पर।
छात्र : पर ये तो शुरू से मिलते थे। मेरी नानी कहती है कोलगेट विदेशी कंपनी है। लिप्टन चाय उनके भी नानाजी पीते थे। दादू को कोकाकोला का शौक था।
पत्रकार : सच है। इसीलिए तो मैं कहता हू्ं कि इतने देशों में मोदी जाकर एक-एक उद्योगपति से मिल लिए। हर ट्रेड बॉडी से अपील कर ली। कौन आया? जिन्हें आना होगा, वो तो ख़ुद ही आ जाएंगे। जैसे कि कोई लिबरलाइज़ेशन नहीं था, सख्ती थी - फिर भी कैडबरी चॉकलेट से लेकर लेवाइज़ जीन्स तक सबकुछ तब भी आता था।


प्रोफ़ेसर : हम चुनाव से पहले का बजट लेकर बैठे थे। ग़लत बातों में उलझ गए हैं।
सप्लायर : मोदीजी ने किसानों को डेढ़ गुनी कीमत का वादा कर, उनका मन जीत लिया है।
वकील : लेकिन रबी फ़सलों पर डेढ़ गुना कीमत तो दे चुके हैं न? तो नया क्या दे रहे हैं?
पत्रकार : जी। खरीफ़ में भी देंगे। यह वैसे ही है कि वे घोषणा करते कि ढाई लाख रु. तक की आमदनी पर इस साल कोई टैक्स नहीं लगेगा।
छात्र : ये तो मखौल उड़ाना हुआ। मैं आप सभी जानकारों से बजट समझना चाह रहा था, लेकिन...
सप्लायर : देखिए, दो तरह से फ़ायदे-नुकसान पहुंचते हैं बजट से। एक सीधा फ़ायदा या नुकसान। दूसरा, घुमा फिराकर पहुंचाया फ़ायदा या नुकसान। चूंकि हम शहर में रहने वालों को आदत पड़ गई है कि टैक्स की छूट नहीं मिली तो पूरा बजट खराब। क्योंकि यह हम सभी को सीधा फ़ायदा पहुंचाती है।
प्रोफ़ेसर : ये बात कहां आ गई? डेढ़ फीसदी लोग ही तो टैक्स भरते हैं। वो अग़र सिर्फ छूट चाहते हैं - तो क्यों नहीं देनी चाहिए? आप महंगाई बढ़ा रहे हैं - जीएसटी से 18% टैक्स हर चीज़ पर लग रहा है - तो डिस्पोज़ेबल इनकम बढ़ेगी कैसे?


छात्र :लेकिन बाकी लोग टैक्स क्यों नहीं देते?
पत्रकार : नहीं, हर साल 80-90 हजार टैक्सपेयर बढ़ा रही है मोदी सरकार। लेकिन मोदी हों या मनमोहन, इंदिरा हों या नेहरू - मजाल है अमीर किसानों पर टैक्स लगा सकें?
वकील : देखिए, दिवंगत नेताओं को ऐसा कहना आपत्तिजनक है। आप तो मोदी सरकार की बात कीजिए।
सप्लायर : किसानों की हालत इतनी ख़राब है। वे आत्महत्या कर रहे हैं। लेकिन आपको सूझ रहा है कि उन पर टैक्स लगाया जाए? कोई संवेदना है कि नहीं?
पत्रकार : भई, मैंने तो अमीर किसानों की बात की थी। कोई भी किसान बन जाता है आजकल। और सारा टैक्स माफ़।
वृद्ध : (कुछ ग़र्म होकर) मज़ाक नहीं चल रहा। आपके हीरो अमिताभ पकड़े गए थे। किसान दिखना, खेती की आमदनी दिखाना कोई आसान नहीं है। और यूं भी, हम दलित, आदिवासी कोटा तो ख़त्म कर नहीं पाए, अमीर किसानों के टैक्स की कहां बात?


छात्र : वैसे भी यह बेमानी बात है। पर बिज़नेस के लिए तो अच्छा किया है न?
सप्लायर : बहुत ही अच्छा।
वृद्ध : हां, आपको काफ़ी काम मिल जाएगा। सड़कें, पुल, मकान, बहुत कंस्ट्रक्शन होगा।
प्रोफ़ेसर : 5 लाख करोड़ था इन्फ्रास्ट्रक्चर का बजट। सीधे 6 लाख करोड़ कर दिया!
पत्रकार : सीधा मतलब है भ्रष्टाचार के लिए 1 लाख करोड़ और!
अधेड़ महिला, जो इतनी देर से रुचि लेकर बगल की टेबल से ये बहस सुन रही थीं, अचानक बोल उठीं : सब कुछ हो सकता है, लेकिन मोदीजी भ्रष्टाचार नहीं होने देंगे।
छात्र : अरे, यह आप कैसे कह सकती हैं?
महिला : भरोसा है। एक भी दाग़ बता दो?


सप्लायर : ये देखिए। जनता की आवाज़। महिलाओं का विश्वास। हम निष्पक्ष नहीं हैं।
प्रोफ़ेसर : प्रश्न बजट में मिडिल क्लास को छलने का है। जेटली ने स्टैण्डर्ड डिडक्शन लाकर 40 हजार की छूट की घोषणा की। उसमें सारी पहले से मौजूद 35 हजार की छूट हटा दी। फिर सेस बढ़ा दिया। भाई साहब, ऐसे धोखे किसी जमाने में चलते थे। आज दो मिनट में आदमी गिन लेता है। गूगल कर लेता है। और धोखा नहीं खाता।
सप्लायर : मैं सहमत नहीं। इसमें धोखा क्या है? कोई बिल नहीं देने पड़ेंगे। बड़ी राहत है।
छात्र : क्या बिल नहीं देना बड़ी राहत है?
पत्रकार : जब जेटली ने एेसा कहा था - तब एक पूरी भूमिका बनाई थी। कि कैसे नौकरीपेशा लोगों का योगदान बहुत प्रशंसनीय है। कैसे वे औसतन, कंपनियों से भी ज़्यादा निजी टैक्स दे रहे हैं!


सप्लायर : देखिए, कितनी अच्छी बात कही उन्होंने।
प्रोफ़ेसर : वही तो पत्रकार महोदय बता रहे हैं कि जब नौकरीपेशा की तारीफ़ कर, उन्होंने ऐसा धोखा दिया - तो बेचारे नौकरीपेशा कम टैक्स दे रहे होते तो क्या अत्याचार न करते!
तीसरी पंक्ति की टेबल पर बैठे एक नौजवान ने जोर से कहा - साहब लोगों, इन्वेस्टर मर गया, आपकी बचत पर डाका डल गया - कोई उसकी बात भी तो कीजिए...
सप्लायर : ऐसा तो कुछ नहीं हुआ।
नौजवान : मैंने म्युचुअल फंड में बचत लगा रखी है। अचानक लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन टैक्स ले आए। क्यों लाए?
प्रोफ़ेसर : सही कहा। बचत तो लूट ही चुकी है ये सरकार। एफडी पर टैक्स घटाकर बमुश्किल 4% बचता है। तो कैसे बचाएं?
वृद्ध : (धीमे से) ये तो बिल्कुल सही कहा।


सप्लायर : लेकिन आपको तो एफडी ब्याज पर छूट दी है।
वृद्ध : 5% के स्लैब से 2500 रु. बचेंगे। तो क्या खुश हों? नाचें?
महिला : ऐसा नहीं है। मोदीजी धीरे-धीरे कर रहे हैं न।
नौजवान : क्या कर रहे हैं? इक्विटी पर ये जो लॉन्ग टर्म टैक्स लगाया, इससे उत्साही मिडिल क्लास की सेविंग्स ख़त्म हो जाएंगी। और देखिए कैसे अंधेरे में रखते हैं - पुराने लॉन्ग टर्म टैक्स की जगह क्या था? सिक्युरिटी ट्रांजेक्शन टैक्स। जब लॉन्ग टर्म वापस ले आए - तो इस ट्रांजेक्शन टैक्स को तो हटाते। दो-दो टैक्स क्यों देगा कोई? इनकम टैक्स के साथ कोई सैलरी टैक्स क्यों देगा?


सप्लायर : स्टॉक-फंड आदि से लोग लाखों कमाते हैं। राष्ट्र निर्माण के लिए दें।
प्रोफ़ेसर : ये वो स्टॉक प्लेयर्स नहीं हैं। ये तो 50 से कम उम्र के परिवार हैं। जो बाकी बचत ख़त्म होने पर बच्चों के भविष्य के लिए पैसा यहां लगाते हैं।
पत्रकार : और तो और, पेंशन स्कीम के 60% निकालने पर टैक्स। पिछली बार पीएफ के लिए ऐसा ही टैक्स लाए थे।
वकील : लेकिन आप सब फिर भी तो मोदीजी को ही जिताते हो!
महिला : जो कुछ भी हो, मैं तो उन्हें ही वोट दूंगी फिर से।
वृद्ध : मोदीजी के लिए अच्छा-सा शब्द पढ़ा था मैंने। हां, ‘नो-प्रॉफिट प्राइम मिनिस्टर।’ चार-पांच बार जीत गए, तो न्यू इंडिया होगा दुनिया में सबसे आगे।
छात्र : एनर्जी ग़जब है मोदीजी मेंं।
पत्रकार : ये हम क्या बात करने लगे? मोदी चुनावी बजट लाए हैं वो बात करो।


सप्लायर : नहीं, अब हम एकदम सही बात कर रहे हैं।
वकील : फिर की ही क्यों हमने बजट की बात? ऐसी सरकार को तो हराना चाहिए।
पत्रकार : कौन हराएगा? मिडिल क्लास। हम मिडिल क्लास किसी काे नहीं हरा सकते। खुद ही हारते हैं।
नौजवान : चलिए, गांव-ग़रीब-किसान को ज़िंदगी में ये हमारा साथ मान लीजिए।
महिला : आज सभी की कॉफी का बिल मेरे बजट से। हालांकि बजट समझ में नहीं आया।
हम बजट समझ सकें - असंभव है। किन्तु समझना ही होगा। क्योंकि यह कोई 25 लाख करोड़ रु. का हिसाब मात्र नहीं है।
यह मेरी-आपकी ज़िंदगी, हमारे बच्चों के भविष्य को किस दिशा में बढ़ना होगा, इन सभी को बताने वाला जटिल दस्तावेज़ है।


देश को बजट पर बात करनी ही चाहिए। (लेखक दैनिक भास्कर के ग्रुप एडिटर हैं।)

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Web Title: klpesh yaaganik ka kolm : kyon hm sbhi ko bjt par bahs karni hi chaahie
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