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मोदी और राहुल दोनों जानते ही होंगे : प्रशंसा वो शराब है, जो कानों से पी जाती है

वर्ष 2017 का अंत भाजपा के लिए अत्यधिक सुखद होगा। किन्तु कांग्रेस के लिए भी कोई नया दु:ख न होने का सुख होगा।

Danik Bhaskar | Dec 16, 2017, 05:17 AM IST
कल्पेश याग्निक दैनिक भास्कर के ग्रुप एडिटर हैं। कल्पेश याग्निक दैनिक भास्कर के ग्रुप एडिटर हैं।

‘नेता और जादूगर में एक समानता होती है- दोनों ही आप का ध्यान उस काम से हटाना चाहते हैं जो वे वास्तव में कर रहे होते हैं।’- एक विद्वान लेखक, संभवत: जिनका नाम वोटर लिस्ट में नहीं मिला होगा।

वर्ष 2017 का अंत भाजपा के लिए अत्यधिक सुखद होगा। किन्तु कांग्रेस के लिए भी कोई नया दु:ख न होने का सुख होगा। अतिरिक्त सुख होगा नए अध्यक्ष के रूप में राहुल गांधी को पाना।

जैसे कि अनुमान लगाए जा रहे हैं कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी गुजरात पुन: पा लेंगे और उन्हें हिमाचल कांग्रेस से छीन लेने का गर्व होगा।

इसी तरह कांग्रेस को हर प्रकार की पराजय के पश्चात एक नए तौर-तरीके से काम करने का अवसर मिलेगा। चूंकि कांग्रेस के पास खोने को कुछ नहीं होगा - इसलिए वह जो भी करेगी, वह पाना ही माना जाएगा।
मोदी-केन्द्रित भाजपा के पास आज 18 राज्य हैं, जहां उनकी या उनके सहयोगी के साथ मिली सरकारें हैं। हिमाचल मिलने पर 19 हो जाएंगी।

देश की 70% जनसंख्या जहां रहती है, वहां मोदी-आधारित सरकारें हो जाएंगी। जबकि कर्नाटक को छोड़ दें तो कांग्रेस मेघालय, मिजोरम, पुडुचेरी जैसे लघु और राजनीतिक रूप से कम महत्व वाले राज्यों में सिमट चुकी है। किन्तु पंजाब की विजय उसे उत्साहित बनाए हुए है।

जहां भाजपा में जयघोष हो रहा है, वहीं कांग्रेस पराजय से परे, अपने नए नेता को लेकर निहाल हो रही है।
नए वर्ष 2018 में राष्ट्र कौतूहल के साथ इन दोनों दलों को, इन दोनों नेताओं को निहारेगा।
समय प्रत्येक परिवर्तन का साक्षी है। समय प्रत्येक परिवर्तन का जनक भी।
ठीक दो वर्ष पहले को लें। मोदी का 2015 बहुत ही बुरा बीता था। दिल्ली में पराजय से वर्ष आरम्भ हुआ था। बिहार में मात खाकर वर्ष का अंत निकाला था।
राहुल गांधी का तो लम्बा समय पराजित होने, भाजपा और सोशल मीडिया से प्रताड़ित होने और साधारण नागरिकों के मध्य भी परिवार के थोपे गए उत्तराधिकारी के रूप में बीता है। जिम्मेदारी से बचते हुए, पलायन के पक्षधर नेता के रूप में चर्चित हुए।
आज, राहुल 2.0 अवतार की बात आ रही है।
चूंकि कारण अलग-अलग हैं, इसलिए भाजपा और कांग्रेस अलग-अलग महोत्सवी मुद्राएं दिखा रही हैं।
अच्छा है। किन्तु डरावना भी।
क्योंकि एक तो सत्ता की खुरदुरी, कठोर और अकल्पनीय मार्ग पर अबाध, आसान और अनंत दौड़, दौड़ पाने में सफल होता जा रहा है। तो दूसरा सवा सौ से अधिक वर्ष पुरानी, वयोवृद्ध-सी थकी-मांदी-सशंकित किन्तु आस लगाए बैठी पार्टी में ‘बढ़े चलो’, ‘करो या मरो’ और ‘युवाओं को जोड़ो’ के साधारण संकेतों से नई लड़ाई लड़ने की ऊर्जा भर रहा है। और ‘ज़बरदस्त’ परिणामों की भरपूर जोशीली बात कर रहा है।
इसलिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी - दोनों की भारी-भरकम प्रशंसा हो रही है। होनी स्वाभाविक है।
श्रेष्ठ कार्यों की प्रशंसा होनी आवश्यक है।
श्रेष्ठ आरम्भ भी प्रशंसा का पात्र है।
श्रेष्ठ परिणाम तो प्रशंसा के पन्ने पर ही लिखा आता है।
किन्तु नेतृत्व कर रहे व्यक्ति को जान लेना चाहिए कि प्रशंसा वो शराब है, जो कानों से पी जाती है।
यदि लक्ष्य स्पष्ट है, मदहोशी, तंद्रा या निद्रा नहीं अपितु सूझबूझ, स्फूर्ति व आंखें खोल कर अपना काम करना है - तो प्रशंसा से परे हटना होगा।
हालांकि मोदी तो आलोचना करने में ही इतने लीन रहते हैं कि प्रशंसा सुनने का समय नहीं, किन्तु फिर भी भारी भीड़, दो-दो-चार-चार लाख जनसमूह की जयजयकार सुनकर किसकी छाती नहीं फूलेगी? कौन अपनी भावनाएं छुपा पाएगा? कौन भाषा, भाव, भंगिमा पर नियंत्रण रख पाएगा?
यही राहुल गांधी को पता है। चाटुकारिता की एक अंधी दौड़ उनके दल को दलदल बना चुकी है। उनके गिर्द इतनी प्रभावशाली, वैभवशाली और शक्तिशाली प्रतिभाएं उनकी ठकुरसुहाती करती रहती हैं - कि श्रेष्ठ होने और निकृष्ट से लड़ने के अपने विचार पर कोई भी आत्म-मुग्ध हो जाए।
जनसभाओं के साथ सोशल मीडिया पर इस तरह के भ्रम सर्वाधिक गहरे ढंग से स्थापित किए जाते हैं।
न जन-सभाओं के पैर होते हैं।
न सोशल मीडिया का कोई पता।
जीवन के पथरीले मार्ग और शुष्क मौसम में प्रत्येक कदम का कोई कारण बताना होता है। जीवन में आधार अनिवार्य है।
प्रत्येक नेतृत्व को अब यह समझना होगा कि अच्छे-बुरे के लिए नागरिक उन्हीं से पूछेंगे। उन्हीं को दोष देंगे। या चुन लेंगे।
बहाने नहीं चलेंगे।
जैसे कि गुजरात में 114 से 121 सीटें निरंतर जीतने वाली भाजपा इससे कम आने पर कोई तर्क नहीं दे सकती। कि पहली बार नरेन्द्र मोदी के मुख्यमंत्री हुए बिना हम लड़े। या पटेल आंदोलन से नुकसान हुआ। या जीएसटी से कम हुई सीटें। या शहरों में तो हम अच्छे रहे ही, गांवों में पिछड़ गए।
चूंकि ऐसा तो पता ही था।
बल्कि पूछा जाएगा कि 150 सीटों वाला अमित शाह का मुखर-प्रखर नारा कहां गया? क्यों नहीं ला पाए?
ठीक ऐसा ही कांग्रेस के साथ होगा। यदि हार गई तो बहाने नहीं चलेंगे कि मणिशंकर अय्यर की ‘नीच’ राजनीति ले डूबी। वरना कांग्रेस तो जीत रही थी। ‘जनेऊ’ मुद्दा बना दिया गया। अन्यथा, लोग तो ‘विकास पागल हो गया है’ से खूब जुड़ रहे थे।
क्योंकि, चुनाव से पहले ही सब कुछ सामने था। 22 वर्ष हो जाएंगे सत्ता से हटे कांग्रेस को।
तो भयंकर संघर्ष, भारी सोच-समझ भरे निर्णय, भूलकर भी गंदा-भद्दा न बोलना और केवल गुजरात के हित की बात करते हुए कोई ‘बिग आइडिया’ लाना ही उनका लक्ष्य होना चाहिए था।
88 सीटें खुली पड़ी थी गुजरात में। खुली, अर्थात् कुल 182 सीटों में से 88 सीटें ऐसी हैं - जो कभी भी, किसी तयशुदा पार्टी को विजयी नहीं बनातीं। प्रत्येक चुनाव में परिवर्तनशील।
किसने रोका था कांग्रेस को यहां पूरे पांच वर्ष तक पैठ बनाने, संघर्ष करने से?
भाजपा के लिए भी ऐसा ही है।
कोई 50 सीटें ऐसी हैं जो पिछले चार (कुछ पांच) चुनावों से केवल भाजपा को ही चुनती है।
तो 50 के पश्चात् 88 खुली सीटों पर जुट जाते। पहले से 115 तो थी हीं। फिर लोकसभा में सारी 26 सीटें जीतकर तो वह 100% सीटों पर, समूचे गुजरात राज्य पर हावी हो गई।
टूट पड़ते? किसने रोका था? लाते 150 सीटें। (18 दिसंबर को पता चलेगा, ले आए तो लोग अचंभित रह जाएंगे -समूचा देश प्रशंसा करेगा- हालांकि उससे भी बचना होगा। नहीं ला पाए - तो उलाहना मिलेगा ही।)
पराजय का कारण कोई नहीं सुनना चाहता। क्योंकि कोई न कोई कारण तो आप गिना ही देंगे। ईवीएम तो है ही। हारे, तो धोखाधड़ी से ईवीएम ने हराया। वोटिंग का प्रतिशत ही गिर गया -लोग वोट देने ही नहीं आए- वरना दक्षिण गुजरात से हम ही जीतते। क्या वे 9% वोट आपको ही मिलते? क्या पिछली बार ये ही वोटर थे जिन्होंने आपको चुना था?
हार्दिक पटेल इसलिए कुछ न कर पाए चूंकि प्रत्येक पटेल को नौकरी नहीं चाहिए। पटेल 60% तो कारोबारी हैं। तो क्या चुनाव से पहले सब ऐसा समझते थे कि 100% पटेल नौकरी करते हैं, इसलिए आरक्षण चाहते हैं?
ऐसा ही अल्पेश ठाकोर का है। कि ओबीसी आधे भाजपा के साथ हैं ही। उनसे क्यों मान कर, कांग्रेस में चले जाएंगे? वही जिग्नेश मेवानी का हाल है। जब दलित हैं ही 7% तो क्या ताकत होगी वोटों की सूरत में?
इसलिए इन तीनों नेताओं को अब (या तब भी) कोसने से क्या होगा? तीनों संयोगवश युवा, ऊर्जावान और बड़ी, अति महत्वाकांक्षा लिए हैं। तीनों ने अपना नाम राष्ट्रीय स्तर पर चला लिया। बने रहेंगे।
भीड़ कभी अपनत्व भरे सहयोगी या मित्र नहीं देती। किन्तु राजनीति में शत्रुओं ही नहीं, मित्रों को भी दिखाने के लिए भीड़ आवश्यक है। न इन तीनों नेताओं को वोट कम मिलने या दिलाने का कोई दु:ख होना चाहिए, न ही कांग्रेस को किसी हार का।
क्योंकि, जैसी कि कहावत है ‘अ ड्राउनिंग मैन इज़ नॉट ट्रबल्ड बाय रेन’। वैसे ही इन सबकी हालत दुबले और दो आषाढ़ जैसी है। कोई अंतर नहीं।
चुनाव विश्लेषण के दौरान हमेशा वोट शेयर पर लम्बा, गंभीर और रहस्यमय वाद-विवाद होता है। भारी गणित के साथ।
पूरा व्यर्थ। और झूठ।
क्योंकि हमारी राजनीति का लोकतंत्र ‘फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट’ के फॉर्मूले पर ही होता है- यानी एक वोट की बढ़त ले लीजिए। तो जीत आपकी।
बुद्धिजीवियों, छिद्रान्वेषी पंडितों, राजनीति के जानकारों के बुद्धि-विलास के लिए ही वोट शेयर की गुत्थी उचित है। मैं भी वोटों के बंटवारे को रोचक व मनोरंजक मानकर ही पढ़ता हूं। किन्तु हमारे यहां केवल सीटों के जीतने का महत्व है। यह एक पल भी भूले बग़ैर।
1999 में अटल सरकार बनी थी - कांग्रेस से पौने दो करोड़ वोट कम पाकर। मात्र 24% वोट शेयर से। जबकि 1989 में 40% वोट शेयर लेकर भी राजीव गांधी सत्ता से दूर रह गए थे।
राजनीति बहुत जटिल है। हम लोगों को सरल, सहज राजनीति मिले, असंभव है। किन्तु पानी ही होगी।
क्योंकि जो भी सरल है, उसके पीछे निश्चित ही अथक दैहिक परिश्रम, गहरा मानसिक श्रम किया गया होगा। और जो भी सहज है, नेचुरल है, वह सच्चा होगा।
अहमद मियां को वज़ीर-ए-आलम बनाने की पाकिस्तानी चाल या मोदी ने अपने प्रिय चार उद्योगपतियों को फायदे देकर गुजरात बेच डाला जैसे झूठ नहीं होंगे।
(लेखक दैनिक भास्कर के ग्रुप एडिटर हैं।)