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कल्पेश याग्निक का कॉलम : क्यों सहते हैं हम ‘ऊंच-नीच’ का डंक, दंभ, कलंक?

राजनीति का शब्दकोश इतना दीन-हीन क्यों है? प्रभावी भाषा का इतना दारिद्रय क्यों है?

कल्पेश याग्निक | Last Modified - Dec 09, 2017, 04:04 AM IST

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    कल्पेश याग्निक दैनिक भास्कर के ग्रुप एडीटर हैं।

    ‘इतिहासकार वर्णन करता है - कि क्या हो चुका है
    कवि वर्णन करता है - कि क्या हो सकता है
    नेता वर्णन करता है - कि क्या नहीं होना चाहिए।’- अज्ञात

    Live Updates - गुजरात विधानसभा चुनाव 2017 वोटिंग जारी

    राजनीति का शब्दकोश इतना दीन-हीन क्यों है? प्रभावी भाषा का इतना दारिद्रय क्यों है? चुनाव प्रचार की व्याकरण इतनी विकृत क्यों है?
    विरोध अनिवार्य है।
    आक्रामक शैली आवश्यक है।
    विरोध में आक्रमण लोकतंत्र का आधार है।
    किन्तु इसके लिए विरोधी भाषा-शैली कुरूप क्यों होनी चाहिए?


    ‘...आ मोदी तो नीच जाति नो छे, नीच छे...’ गरजते प्रधानमंत्री कतई नए नहीं लगे। वे तो प्रतीक्षा ही कर रहे थे। कांग्रेस को दैत्याकार धक्का पहुंचाने का इससे अधिक उपयुक्त अवसर क्या हो सकता था? कांग्रेस के वरिष्ठ मणिशंकर अय्यर ‘मोदी नीच किस्म का आदमी है’ कहकर क्या सिद्ध करना चाहते थे - यह तो वे ही जानें, किन्तु वे एक दंभ का प्रतीक निश्चित बनकर उभरे। और कांग्रेस को कलंकित कर गए।
    वैसे कांग्रेस गुजरात में लगातार पराजय की पताका फहराती हुई ही दिख रही है। अय्यर अध्याय से पूर्व भी।
    किन्तु प्रश्न चुनाव में जय-पराजय का नहीं है।
    प्रश्न तो श्रेष्ठ विचारों से वंचित हो चुकी राजनीति पर है। क्रोध तो राजनीतिक दलों के पथभ्रष्ट होने पर है। रोष तो हमारे जनप्रतिनिधियों के आचरण और मानसिकता पर है - जो उनका स्तर गिराती जा रही है।
    और हमारे समस्त राजनीतिक दल इस फिसलन में भागीदार हैं।
    हम भारत के साधारण नागरिक, भी इसके लिए उत्तरदायी हैं।
    क्योंकि सत्तारूढ़ भाजपा हो या कि सत्ता-मुक्त कांग्रेस, हिंसक आंदोलनों से जन्मे वामपंथी हों या कि क्षेत्रीय भावनाओं से पनपे छोटे दल - सभी भद्दा बोलने की स्पर्धा कर रहे हैं। किन्तु हम उन्हें दण्ड नहीं देते।
    गिनाने की आवश्यकता नहीं है - किन्तु इतने वीभत्स, जुगुप्सा जगाने वाले, अमानवीय बोल बोले गए हैं - कि विश्वास नहीं होता। और हमने मतदाता के रूप में फिर भी उन्हें सगर्व-सहर्ष विजयी होने दिया है।
    उत्तरप्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, कर्नाटक, पंजाब और अब गुजरात इसके ज्वलंत उदाहरण हैं।
    उन आपत्तिजनक बोलों को लिखने में स्वयं पर शर्म आती है। न जाने ये नेता ऐसा भरी जनसभाओं में कैसे कर पाते होंगे? मीडिया के दिग्गजों के समक्ष कैसे दु:स्साहस कर पाते होंगे?
    और, भारी हंगामा मचने के बाद भी, पूर्णत: अविचलित हो, दृढ़ता से स्पष्टीकरण देते जाते हैं। संकल्प के साथ स्वयं को निर्दोष घोषित करते जाते हैं। और, क्षमा मांगने की ऐसी अनूठी शैली ले आते हैं - कि क्षमा मांगते हुए भी ऐसा लगता है कि क्षमा कर रहे हों!
    मणिशंकर अय्यर ने ऐसा ही किया। अपेक्षित भी था।
    और भाजपा के सांसदों ने, विशेषकर उत्तर प्रदेश से, उन पर जो अग्नि उगली - वो तो अय्यर को भी कोसों पीछे छोड़ गई।
    मुग़ल यदि किसी रूप में सुन सकते - तो चकित रह जाते। कि गुजरात का चुनाव उनके नाम पर लड़ा जा रहा है। ऊंच-नीच का जो डंक आज कांग्रेस ने मारा है - यदि नरेन्द्र मोदी की बात सही मानें - तो वो मुग़लों का कुकृत्य था। और इसी ‘मुग़लई मानसिकता’ का प्रदर्शन था ‘नीच’ कथन!
    दो पक्ष नहीं हों - तो लड़ाई हो ही नहीं सकती।
    राष्ट्र चकित और क्षुब्ध होकर देख-सुन रहा है।
    संभवत: 16वीं सदी की कहावत है कि केवल इसलिए आप किसी ग़लत बात के पक्ष में न खड़े हो जाएं क्योंकि आपका विरोधी सही बात के पक्ष में खड़ा हो गया है।
    ‘मैं सुन्नी बोर्ड का वकील हूं ही नहीं’ कहकर कपिल सिब्बल ने व्यर्थ, अपनी कानूनी ऊंचाई के विपरीत ग़लत बात कही।
    किन्तु क्या इतने वर्षों के अथक ‘विकास मार्ग’ पर चल चुकने के पश्चात् अब पुन: राम मंदिर-बाबरी मस्जिद पर चुनाव होगा?
    यदि हां,
    तो इससे अधिक दुर्भाग्यपूर्ण पल देश के लिए नहीं होगा।
    यदि हां,
    तो यह बाबरी ढांचा ढहाने जैसा ही उपद्रवी, दुखदायी समय होगा।
    धर्म को राजनीति का सारथी बनाने वाला अधर्म होगा। यह आर्टिफिशियल इंटेलिजेन्स के युग में जनेऊ से विद्वता प्राप्त करने का पाखंड होगा। और राष्ट्र अब और अधिक पाखंड सहन करने को तैयार नहीं है। देश के 65 करोड़ युवा, हमारी सरकारों से, विपक्ष से -समूची राजनीति से- विकास चाहते हैं। किन्तु हमारे नेतृत्व लौट-पिट कर हिन्दू-मुस्लिम ले आए हैं।
    हमारे दल पुन: भड़काऊ राजनीति लाने लगे हैं।
    बांटो - और राज करो।
    अंग्रेज ऐसा चला गए। अब नहीं चलेगा।
    किन्तु विषाक्त वाचाल थम नहीं रहे।
    एक नया तर्क भी चल पड़ा है। कि शब्दों पर मत जाइए।
    शब्दों पर न भी जाएं। आचरण पर भी प्रश्न करें -तब मानें। किन्तु उस ‘पैटर्न’ का क्या करें- जो समाप्त हो ही नहीं रहा।
    जो दो बार हो चुका, संयोग नहीं है। यहां तो बारम्बार, ना-ना प्रकार से होता जा रहा है।
    लड़ाई में खड़े दोनों पक्ष ‘सच’ होने का दावा करते हैं। जबकि सच तो दोनों का दावा रद्द कर देता है। इसीलिए क्रूर और कलुषित भाषा, फूहड़ और कर्कश कोलाहल, निर्लज्ज शैली का उपयोग कर, हावी होने का प्रयास किया जाता है/रहा है।
    शास्त्रों में है कि एक भी बोला हुआ शब्द मिटता नहीं है। ब्रह्मांड में बना रहता है। इसलिए ‘बोलने से पहले सोचो।’
    पहले लगता था कि ऐसा मात्र इसलिए कहा जा रहा है ताकि अच्छा बोलने की प्रेरणा मिले।
    किन्तु अब सरल-साधारण टेक्नोलॉजी ने इसे सिद्ध कर दिया है।
    कम्प्यूटर-मोबाइल पर लिखा प्रत्येक अक्षर अमिट है। हम नष्ट कर चुके हैं, किन्तु सर्वर पर वह बना हुआ है।
    इससे ‘लाख शब्द बोला और एक शब्द लिखा’ वाली कहावत भी मिट गई है। चूंकि बोली गई प्रत्येक बात डिवाइस, क्लाउड, सर्वर या इंटरनेट के किसी अज्ञात-ज्ञात स्टोर में जमा है ही।
    या कि यूं कहें, कि जो नेता कल तक पलट जाया करते थे - उनके वीडियो उनकी भाषा को सजीव दिखाते रहते हैं। भले ही पलटना जारी हो, किन्तु विश्वास टूट चुका है।
    प्रभावी, सही, सधी हुई भाषा-बोली और शैली ही इस विश्वास को लौटा सकती है।
    क्या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से लेकर राहुल गांधी तक यह बचपन से सुनाई बात भूल गए कि दूसरों के लिए वही भाषा बोलो जो आप स्वयं के लिए चाहते हो। मणिशंकर अय्यर को यह याद दिलाना इसलिए व्यर्थ है, चूंकि वे सुुनने को तैयार ही नहीं है।
    और ऐसी दयनीय स्थिति में आने पर भी वे राष्ट्र पर दयाभाव दिखा रहे हैं। कुछ ऊंच-नीच हो जाएगी, इस सहज भय से पूर्णत: परे।
    ऊंच-नीच के दंश से हमारी राजनीति मुक्त हो, असंभव है। किन्तु करनी ही होगी।
    और अब बहुत हो चुका।
    जिन हिपोक्रेट्स नामक पवित्र ग्रीक हस्ती की हमारे डॉक्टर शपथ लेते हैं - उन्होंने अच्छा कहा था :
    जो भी अति है, अप्राकृतिक है!
    बताया गया है न कि मनुष्य रोते हुए पैदा होता है। जीवन भर कराहता-कोसता रहता है। फिर कुढ़ता, कलेश करता, घोर असंतुष्ट हो - अंतत: मृत्यु की ओर बढ़ जाता है।
    इन सभी नकारात्मक भावों के मूल में ‘शब्द’ ही तो हैं। भाषा ही तो है। बोल ही तो हैं।
    कुछ अर्थपूर्ण, सुंदर और उपयोगी बोल बोल लेंगे - तो ये सारा रुदन, समूचा नैराश्य दूर हो जाएगा।
    आशा है, नेता इसे पढ़ेंगे।

    क्यों कहा होगा ऐसा : एक कल्पना

    राजनीति तो इस स्तर तक जा सकती है कि ‘नीच’ शब्द का प्रयोग एक भरपूर सोची-समझी रणनीति हो!
    आश्चर्य नहीं उस संदेह पर कि संभावित पराजय को किसी एक व्यक्ति, एक कथन और एक शब्द पर ढोलने की यह कोई चाल हो।
    काल्पनिक ही सही - यह मानना तार्किक लग सकता है कि कांग्रेस ने देशभर में शोर मचा रखा है कि गुजरात में वह ‘पुनर्जीवित’ हो चुकी है। विजय पा लेगी। होने वाले नए अध्यक्ष राहुल गांधी कठोर परिश्रम कर रहे हैं। यदि कांग्रेस अप्रत्याशित रूप से जीत जाती है तो राहुल गांधी को श्रेय। किन्तु यदि हार जाती है तो इस आपत्तिजनक जुमले के कारण हार गए।
    प्रामाणिकता के लिए विद्वान मणिशंकर अय्यर को चुना। जो 2014 के चुनाव में ‘चाय बांटने’ का आमंत्रण देकर चर्चा में आए थे।

    (लेखक दैनिक भास्कर के ग्रुप एडीटर हैं।)
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Web Title: Kalpesh Yagnik Column On Language In Current Political Scenario
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