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कल्पेश याग्निक का कॉलम: 2017 की सीख- किसी और से नहीं, ख़ुद से ही टूटते हैं हम

कल्पेश याग्निक | Last Modified - Dec 30, 2017, 09:14 AM IST

‘हमें पता नहीं होता कि हम समय का क्या करें? गंवाते रहते हैं - किन्तु फिर भी और समय चाहते हैं!’
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    कल्पेश याग्निक ।

    ‘हमें पता नहीं होता कि हम समय का क्या करें? गंवाते रहते हैं - किन्तु फिर भी और समय चाहते हैं!’
    - अनातोल फ्रांस, 1844 में जन्मे फ्रेंच उपन्यासकार

    ‘समय अपने आने की कोई घोषणा नहीं करता। अन्यथा नववर्ष पर कोई भीषण गगनभेदी गर्जना होती।’
    - थॉमस मैन, 1875 में जन्मे जर्मन उपन्यासकार

    पीछे मुड़कर न देखना बहुत अच्छा है। किन्तु हम साधारण मनुष्य हैं। देखते ही हैं।

    कोई कारण तो होगा। अन्यथा सभी पीछे क्यों देखते? बीती बातें, बीत चुकी होती हैं। उनका आगे कुछ नहीं किया जा सकता। किन्तु सीख छिपी होती है हरेक घटना में।

    बीत रहे 2017 की ऐसी ही कुछ सीख- सबक ये हो सकते हैं :

    1. यदि करना ही है तो कर डालिए -ख़ुद को ‘कैसे-क्यों...’ से निकालना होगा :

    जिस काम को लेकर हम स्वयं विश्वस्त नहीं हैं कि करना चाहते भी हैं या नहीं, वो तो फिर क्या होगा, कैसे करेंगे, क्यों सब स्वीकार करेंगे, हो सकेगा या नहीं -की जांच से गुजरेगा। आगे-पीछे सोचना पड़ेगा। जिसे ‘काॅस्ट-बेनिफिट रेशो’ कहते हैं- वह देखना पड़ेगा। किन्तु जो करना ही है - उसे तो भिड़कर, कर ही डालिए। गुड्स एंड सर्विसेज़ टैक्स (जीएसटी) ऐसे ही तो लागू हुआ। बरसों से बातें चल रही थीं। नहीं ला पाए। इतनी गड़बड़ियों के साथ नरेन्द्र मोदी सरकार ले ही आई।

    एक बार हो जाता है, तो हो ही जाता है।

    जीवन में भी।

    बीते बरस में मैंने कितनी ही अच्छी चीजें करनी चाहीं। किन्तु वही - दोहराता हूं - ‘महत्वाकांक्षा ने चूहे की भांति बिल से मुंह बाहर निकाला और बिल्ली की पदचाप सुनकर वापस।’

    किन्तु, मैं अपने भीतर जब झांककर देख रहा हूं - तो पा रहा हूं कि बिल्ली की पदचाप को मैंने अपनी अकर्मण्यता की चुप्पी पर लाद लिया था। निश्चित ही मेरी महत्वाकांक्षा, मात्र एक वैचारिक आकांक्षा थी। धड़ाम से गिरना ही था।

    2. अत्याचार का अंत करना है -तो ख़ुद को लड़ना होगा :

    मानव जाति के जन्म के साथ ही शासक और शासित श्रेणियां बन गईं। किसने बनाईं? प्रकृति ने सभी को समान बनाया। मनुष्य ने अपनी शक्ति, बुद्धि और स्वार्थ से शोषण करना शुरू कर दिया। शोषितों ने शोषण स्वीकार कर लिया। इसी से शोषक पनप गए।

    तलाक़, तलाक़, तलाक़ एक झटके में कहने वाले एेसे ही थे। सदियों से सह रही थीं निर्दोष महिलाएं। किन्तु वे ही साहस कर आगे आईं। लड़ीं। और संयोग हो सकता है कि मौजूदा सरकार को उसमें एक राजनीतिक फायदा दिख गया हो। तो वो कानून भी ले आई। किन्तु सुप्रीम कोर्ट में तो एेसे संयोग न होते हैं। न चलते हैं।

    महिलाएं वहां भी जीतीं।

    जीवन में भी कोई और अत्याचार, अन्याय या अराजकता फैलाने का दोषी नहीं है।

    मैंने सोचकर देखा, और शर्मिन्दा हुआ कि पिछले कई वर्षों में मैंने अन्याय सहे। और किसी और को दोषी मानता रहा। अत्याचार सहने वाले पर ही किए जाते हैं। लड़ाई कोई भी हो - लम्बी ही होती है।

    इराक-सीरिया में क्या हो रहा है? वही। चूंकि विद्रोह वैसा नहीं है। और लड़ाई बहुत, बहुत, बहुत ही लम्बी है।

    फिर भी। आज इस्लामिक स्टेट नामक हत्यारों की मंडली में कितनी ताक़त बची है? कश्मीर में जिस दिन से सेना प्रमुख ने खुलकर घोषणा की कि ‘कोई हमारे जवानों को मारता रहेगा और सब सोचेंगे कि हम चुप रहेंेगे -तो भूल जाइए।’ लड़ाई अनेक प्रकार की होती है। इसलिए पता नहीं चलता। किन्तु जब हम स्वयं खड़े होते हैं- तो मर जाने का भी अपना अदांज़ होता है।

    ग़ज़ब होता है।

    3. हार-जीत से ऊपर उठना है - तो ख़ुद को वैसा बनाना होगा :

    हमें बचपन से ही सफल होने के लिए क्यों सिखाया जाता है? यह आज तक समझ में नहीं आया। जबकि विफलता ही जीवन भर ज्यादा होती है और जुड़ी रहती है। विफलता को, विफल को हेय दृष्टि से देखा जाता है। तो हम बचपन से बड़े होने तक घबराते रहते हैं।

    हमें कोई सिर्फ लड़ते रहने के लिए क्यों नहीं समझाता? खेल में जीत किसी एक ही की होगी- इसलिए खेलने का आनंद क्यों नहीं उठाने दिया जाता? क्या हार-जीत से ऊपर वास्तव में उठा जा सकता है? या केवल यह हारने वालों को सांत्वना देने वाली निरर्थक, झूठी, उपदेशात्मक बात है?

    दुनिया के सबसे तेज़ दौड़ने वाले उसैन बोल्ट अपनी ज़िंदगी की आखिरी अधिकृत घोषित रेस इसी साल हार गए। किन्तु मुझे एक भी खेल प्रेमी ऐसा नहीं मिला - जिसने इसे ‘हार’ जैसा कुछ बताया हो। किसी खेल संपादक ने इस पर बोल्ट की कमियां नहीं गिनाईं। रोचक और अर्थपूर्ण आलेख ही लिखे। बोल्ट के पक्ष में व्यर्थ तर्क भी नहीं लाए, न ही उनके ‘हैंगिग द बूट्स’ पर कोई सहानुभूति दिखाई। क्योंकि बोल्ट ने स्वयं को वैसा ही जिंदादिल बना लिया है। 9.58 सेकंड के रेकॉर्ड के अलावा भी।

    यूं भी, दौड़ने वाले को भला कोई रोक पाया है?

    4. हारने का दोष किसी पर मत थोपिए -ख़ुद को ही तैयार करना होगा :

    हारने के कारणों का पता लगाने की परम्परा मनुष्य की मूल प्रवृत्ति है। जीत की समीक्षा नहीं होती। उत्सव होते हैं। और हारने वालों के पास बड़े अच्छे और महत्वपूर्ण बिन्दु होते हैं कि किसके दोष से वे हारे।

    यह वर्ष इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) को हार का दोषी बताने के लिए चर्चित रहा/रहेगा। ईवीएम घोटाले के सच्चे-झूठे किस्सों-सबूतों से भरा रहा। सुधार-परीक्षण भी हुए।

    किन्तु लाख कुछ होने-न होने पर भी एक तथ्य उभरकर आया कि देश के नागरिकों ने इसे कतई गंभीरता से नहीं लिया।

    क्योंकि हार का दोष पूर्णत: स्वयं पर ही है। सारे कारण बहाने हैं। झूठे हैं।

    हम मनुष्यों की क्या हैसियत, जब प्लूटो को प्लैनेट मानने से इंकार कर दिया गया - तो एक वैज्ञानिक ने रोचक किन्तु सारगर्भित टिप्पणी की थी:' जब से उसे ग्रह के रूप में मान्यता दी गई थी, तब से आज अमान्य होने तक भी प्लूटो सूर्य का एक चक्कर भी पूरा नहीं लगा पाया। बाहर तो होना ही था।'

    5. आपका समय समाप्त नहीं होगा -खुद को समय से कुछ आगे रखना होगा :

    यह अकल्पनीय है। समय तो हमारा समाप्त होगा ही। किन्तु कुछ हैं, जो उतनी आसानी से अप्रासंगिक नहीं होते। वर्ष 2017 यदि किसी कॉर्पोरेट सौदे के लिए जाना जाएगा तो वह है डिज़्नी का, रुपर्ट मुर्डोक की मिल्कियत वाली ट्वेंटी फर्स्ट सेन्चुरी फॉक्स कंपनी को खरीदना। कोई साढ़े तीन लाख करोड़ के इस सौदे के कारोबारी पहलुओं में मेरी कतई रुचि नहीं है। बल्कि मेरी प्रेरणा हैं बॉब आइगर। डिज़्नी के इस 66 वर्षीय चेयरमैन- सीईओ ने समूचे विश्व के इंटरटेन्मेन्ट-सिनेमा-टीवी ही नहीं, टेक्नोलॉजी सेक्टर को भी हिलाकर रख दिया।

    ठीक ऐसे ही मीडिया मुगल रुपर्ट मुर्डोक ने सबको चकित कर दिया। 86 की उम्र में। बेटों को 21वीं सदी का बना बनाया साम्राज्य न देकर, उसे बेच डाला। क्योंकि उन्हें सिर्फ मीडिया में ही रहना है। लाइव न्यूज़ में। अभी सिर्फ इतना कि आइगर के जाने की कोई 10 बार बात हो चुकी है डिज़्नी में। चार बार तो अधिकृत रिटायरमेंट की। किन्तु हर बार धमाकेदार कुछ कर जाते हैं कि सब उन्हें रोकने लगते हैं। अब वे 2021 तक बने रहेंगे। बॉब आइगर- रुपर्ट मुर्डोक की बातें कभी और विस्तार से करेंगे। समय चाहिए।

    6. कोई भी संकट आपकी दुनिया खत्म नहीं कर सकता - खुद को उठाना होगा :

    संकट जब बढ़ जाते हैं तो हमें अपने अस्तित्व पर ही संदेह होने लगता है। मानवीय दुर्बलता है। किन्तु संकट में ही हमारी सच्ची पहचान होती है। हम नागरिकों ने देश के इतिहास में हुए सबसे बड़े आर्थिक परिवर्तन/सुधार मात्र दो वर्ष में देख लिए। नोटबंदी और जीएसटी ने वही सिद्ध किया कि प्रत्येक परिवर्तन तनाव लाता है। फिर भ्रष्टाचार से ऊबे राष्ट्र ने 2जी महाघोटाले को ‘घोटाला हुआ ही नहीं’ जैसी न्यायिक मुहर लगते देखा। सीबीआई का मान-मर्दन होते देखा।

    किन्तु यह भी तो देखा कि पूरी तरह खारिज की जा चुकी कांग्रेस, और जिन्हें कोई गंभीरता से नहीं लेता, वे राहुल गांधी यकायक परिदृश्य पर लौटे। और ललकारते दिख रहे हैं।

    कोई संकट इतना भयावह नहीं है कि आपको ख़त्म कर सके। उठना होगा। आपको ही।

    मनोबल टूटने के बाद कोई उत्साह से उठ सके, असंभव है। किन्तु उठना ही होगा।

    न चाहे तो भी विवशता है।

    तो चाहकर ही क्यों न उठा जाए?

    वर्ष तो आएंगे। जाएंगे।

    हम क्या करेंगे, बस यही सच है।

    नववर्ष में मैं आपके लिए कुछ नए विचार ला सकूं, कुछ काम कर सकूं, ऐसी शुभकामनाएं आप से पाने का आकांक्षी।

    आपको श्रेष्ठ ही मिले, इसी प्रार्थना के साथ नववर्ष की बधाइयां।

    (लेखक दैनिक भास्कर के ग्रुप एडिटर हैं।)

    (आप अपने सुझाव या फीडबैक 9200012345 पर वाॅट्सएेप कर सकते हैं।)

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    कल्पेश याग्निक दैनिक भास्कर के ग्रुप एडिटर हैं।
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Web Title: Kalpesh Yagnik Column On 2017 Year Lesson
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