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दो बुनियादी सुधारों के बाद उम्मीदों भरा नया साल

ऊंची नौकरियां और निजी निवेश पर ध्यान देना होगा

Danik Bhaskar

Dec 28, 2017, 07:56 AM IST
कुमार मंगलम बिड़ला चेयरमैन, आदित्य बिड़ला समूह कुमार मंगलम बिड़ला चेयरमैन, आदित्य बिड़ला समूह

यदि कोई हमारे आसपास उभर रहे इकोनॉमिक ट्रेंड देखें –वैश्विक स्तर पर और भारत में भी- तो पाएगा कि हवा में किसी उत्सव जैसी उम्मीद है। विकसित अर्थव्यवस्थाएं लंबे समय से प्रतिक्षित वृद्धिगत हलचलों की वापसी देख रही हैं। अमेरिका में बेरोजगारी की दर रिकॉर्ड निम्न स्तर पर है और यूरोपीय जोन में सकारात्मक घटनाक्रमों से मौद्रिक नीति तक में बदलाव हो रहा है। अमेरिका में घोषित नए कर सुधार व कटौती का खुशी से स्वागत हुअा है। चीनी अर्थव्यवस्था का आकार देखते हुए 6.5 फीसदी की वृद्धि दर ठोस प्रदर्शन है। वैश्विक व्यापार धीरे-धीरे बढ़ रहा है। 2017 का साल कई वर्षों में पहला ऐसा साल है जब अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष सहित अग्रणी विश्लेषकों ने वैश्विक आर्थिक वृद्धि के अपने अनुमान की समीक्षा कर ऊपर की ओर जाते ग्राफ का स्पष्ट संकेत दिया है।


बीते साल भारत अपनी चुनौतियों में उलझा रहा, जबकि सरकार प्रमुख संरचनात्मक सुधारों की ओर बढ़ी। अल्पावधि में इसकी तकलीफें थीं लेकिन, वह दौर पीछे छूट गया है। अर्थव्यवस्था आने वाले साल में इन सुधारों की फसल काटने के लिए तैयार है। इस वक्त दो व्यापक रूपांतरणों से देश गुजर रहा है। एक, जीएसटी, नोटबंदी, लेन-देन व रिकॉर्ड का डिजिटल स्वरूप और आधार-लिंकेज के बाद अर्थव्यवस्था के अधिक औपचारिक स्वरूप लेने की प्रक्रिया। यह रूपांतरण निश्चित रूप से लंबा चलेगा लेकिन, इसके प्रभाव दिखने लगे हैं। भारतीय उद्योग की स्पर्धा की क्षमता के साथ सरकारी आमदनी में वृद्धि दोनों पर इसका बहुत अधिक सकारात्मक परिमाण होगा। मान लिया गया है कि सरकार की वित्तीय क्षमता बढा़ने की जरूरत है ताकि सेहत और शिक्षा पर सार्वजनिक खर्च बढ़ाया जा सके। यही यह सुनिश्चित करने की भी कुंजी है कि युवा आबादी का जो लाभ हमें प्राप्त हैं, उसे गंवा न दें। आर्थिक गतिविधियों औपचारिक क्षेत्रों का अंग बनते जाने के साथ जीडीपी की तुलना में सरकार की आमदनी का अनुपात बढ़ेगा, जिसका उपयोग मानव-पूंजी निर्मित करने में किया जा सकेगा।


दो, इसका संबंध विरासत में मिले लंबे अप्रिय मुद्दों के आर्थिक समाधान से है। जब कोई आर्थिक असेट फंस जाती हैं तो उस पर लंबे समय तक कोई फैसला नहीं लिया जाता। इससे न सिर्फ उसका आर्थिक मूल्य खत्म हो जाता है बल्कि पूरी व्यवस्था ही खतरे में पड़ जाती है। बैंकिंग सेक्टर में नॉन परफार्मिंग असेट (एनपीए) यानी फंसा हुआ कर्ज लंबे वक्त में बहुत बड़े और खतरनाक अनुपात में बढ़ गया। मुख्यत: इसलिए कि हमारे पास ऐसी कोई व्यवस्था नहीं थी कि उनका व्यावहारिक समाधान निकाला जा सके। अब दिवालिया कानून लागू होने से इसका समयबद्ध निराकरण हो सकेगा। इसका नतीजा विभिन्न सेक्टरों में मजबूती और फंसे लोन को व्यावहारिक बनाने का प्रयास करने वाले नए मैनेजमेंट की स्थापना में निकलेगा।


एनपीए समाधान का बैंकिंग सेक्टर पर एक बार में जो असर पड़ेगा वह सरकार द्वारा सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के लिए घोषित पुनर्पुंजीकरण की योजना से बेअसर हो जाएगा। हाल के समय में प्रशासनिक निर्णय प्रक्रिया में तेजी और पारदर्शिता लाने के कई अन्य प्रयास हुए हैं। इनमें से एक मंजूरी संबंधी है, जिसमें भूतकाल में कई वर्ष लग जाते थे। पूरी तरह बदलाव लाने वाले इन कदमों की निवेशकों व रेटिंग एजेंसियों ने सराहना की है। मूडीज़ ने पिछले माह भारत की रेटिंग ऊंची की है, पूरे 13 वर्षों बाद। इससे भारत के दीर्घावधि की आर्थिक संभावनाओं में भरोसा जाहिर हुआ है। इससे यह अपेक्षा भी जाहिर हुई है कि सरकार की वित्तीय स्थिति सुधार की राह पर बढ़ती रहेगी। रेटिंग में सुधार भारतीय कंपनियों को विदेशी बाजारों से फंड लेने में सहायक होगा। भारतीय इक्विटी बाजारों ने रफ्तार पकड़ी है और सूचकांक सर्वकालिक ऊंचाई पर हंै, जो फिर से सुधरती स्थिति में निवेशकों के विश्वास का संकेत है। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) में भी उछाल है। इस साल भारत विश्व बैंक की बिज़नेस करने में आसानी की रैंकिंग में भी महत्वपूर्ण ढंग से ऊपर उठा है। यह हमारी दीर्घावधि की वृद्धि की नींव बनाने के लिए अच्छा है।
वैश्विक बिज़नेस की साइकिल रफ्तार पकड़ रही है और हमारे संरचनात्मक सुधारों के नकारात्मक प्रभाव पीछे छूट गए हैं तो भारत 2018 में एक साल पहले की तुलना में अधिक सकारात्मकता से प्रवेश कर रहा है।
कई आर्थिक संकेतक खासतौर पर खपत के मोर्चे पर सकारात्मक हैं। इस संदर्भ में आशा है कि सरकार का फोकस (जो अगले माह केंद्रीय बजट में भी दिख सकता है) दो महत्वपूर्ण पहलुओं पर होगा, जिनमें थोड़े सुधार से ज्यादा कुछ करने की जरूरत है। ऊंची नौकरियां निर्मित करना और निजी क्षेत्र के पूंजी निवेश चक्र को नया जीवन देना। जब ये दोनों बातें हो जाएंगी तो देश के चक्रीय संकेतक बेहतर दिखने लगेंगे। वे वृद्धि की दीर्घावधि की संभावनाओं के अनुकूल हो जाएंगे। इसमें कोई संदेह नहीं है कि एक चमचमाता नया साल हमें पुकार रहा है। भारत लगातार प्रवाह में बना हुआ है।

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