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स्वतंत्र न्यायपालिका लोकतंत्र की अनिवार्य आवश्यकता

अगर स्वतंत्र और निष्पक्ष न्यायपालिका नहीं रहेगी तो देश में उदार लोकतंत्र नहीं रहेगा।

Dainik Bhaskar

Jan 24, 2018, 04:57 AM IST

दस दिनों पहले देश के मुख्य न्यायाधीश के विरुद्ध प्रेस कॉन्फ्रेंस करने वाले न्यायमूर्ति जे. चेलमेश्वर ने एक पुस्तक विमोचन के कार्यक्रम में न्यायपालिका की आज़ादी की याद दिलाकर यह बताने की कोशिश की है कि वे अपने दृष्टिकोण पर कायम हैं। उन्होंने जिन दो बातों की ओर संकेत दिया है उनमें से एक है उदार लोकतंत्र में न्यायपालिका का स्थान और दूसरी बात है लंबित मुकदमों के बढ़ते बोझ का खतरा। उन्होंने देश के नागरिकों को आगाह किया है कि अगर स्वतंत्र और निष्पक्ष न्यायपालिका नहीं रहेगी तो देश में उदार लोकतंत्र नहीं रहेगा।

संयोग से दूसरे ही दिन पद्‌मावत और हादिया के मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने अपनी निर्भीकता और निष्पक्षता प्रदर्शित करके यह संदेश दे दिया है। उनकी दूसरी बात भी पहली बात से ही जुड़ी हुई है और उसका मतलब है कि न्यायपालिका की निष्पक्षता और स्वतंत्रता को खतरा लंबित मुकदमों से है। अगर 50 से 60,000 मुकदमे लंबित पड़े रहेंगे तो सुप्रीम कोर्ट की प्रासंगिकता सवालों के घेरे में होगी। उनका यह भी कहना था कि लोगों को लगातार इस संस्था पर निगरानी रखनी चाहिए कि वह कैसे काम कर रही है। न्यायमूर्ति चेलमेश्वर की बात ऐसे समय आ रही है जब उनकी तरफ से प्रेस कांफ्रेंस के बाद संस्था की साख दांव पर लगी हुई है। हालांकि कार्यपालिका ने स्पष्ट तौर पर कहा है कि यह मामला न्यायपालिका का आंतरिक है और इसमें बाहरी हस्तक्षेप के बिना उन्हें ही निपटाने देना चाहिए। लेकिन, आशंका होती है कि सुप्रीम कोर्ट में न्यायमूर्तियों की नियुक्ति के लिए बनी कोलेजियम प्रणाली को निशाने पर लिया जाएगा।

इसे सुप्रीम कोर्ट ने अपनी स्वायत्तता के लिए ईजाद किया है। न्यायालय के समक्ष चुनौती सिर्फ धारणागत ही नहीं व्यावहारिक भी है। संविधान साफ कहता है कि कार्यपालिका न्यायपालिका के फैसले का सम्मान करेगी लेकिन कई मामलों में इसके विपरीत आचरण देखा गया है। कार्यपालिका अपने मकसद को साधने के लिए या तो बार-बार अपील करती है या फिर राज्येतर संगठनों द्वारा ऐसे दबाव पैदा करती है कि अदालत लाचार हो जाए। इसके अलावा मामला नागरिकों के भीतर वह लोकतांत्रिक भावना पैदा किए जाने का भी है जिसके तहत अदालत के निर्णय का सम्मान होना जरूरी है। अगर वह भावना कमजोर होगी तो अदालत के साथ लोकतंत्र भी कमजोर होगा।

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