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मोदी वही कर रहे हैं जो नेहरू होते तो करते

राष्ट्र के निर्माण को लेकर प्रथम प्रधानमंत्री की भूमिका संबंधी आधारहीन धारणाएं और वास्तविकता

Dainik Bhaskar

Feb 14, 2018, 07:59 AM IST
्रीतीश नंदी वरिष्ठ पत्रकार व फिल्म निर्माता ्रीतीश नंदी वरिष्ठ पत्रकार व फिल्म निर्माता

भारत में पिछले सत्तर वर्षों के दौरान 14 प्रधानमंत्री हुए हैं। पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को मैंने तब किसी हीरो की तरह पूजे जाते हुए देखा था, जब मैं बहुत छोटा था। इसका ठोस कारण भी था। जब भारत ने स्वतंत्रता हासिल की तो हमारे सामने स्पष्ट रूप से दो रास्ते थे। एक महात्मा का : वह रास्ता जो हमें हमारे भूतकाल में ले जाता था और निराले तरीके से भविष्य से भी जोड़ता था। यही रास्ता हमें विभाजन के पीड़ादायक दौर से नए साहसी राष्ट्र के निर्माण तक ले गया। दूसरा रास्ता जवाहरलाल का था, जिनका चुनाव गांधीजी ने हमें नेतृत्व देने के लिए किया था।


महात्मा का रास्ता वह रास्ता था, जिसने हमें स्वतंत्रता दिलाई। किंतु वे भी जानते थे कि नए राष्ट्र का आगे का रास्ता अलग होना चाहिए, उससे बिल्कुल अलग, जिसे उन्होंने चुना था। इसलिए उन्होंने ऐसा उत्तराधिकारी चुना, जो उनसे उससे अधिक अलग नहीं हो सकता था, जितने नेहरू थे। नेहरू हमें उस राह पर ले गए और नए भारत, आधुनिक भारत का निर्माण किया। ऐसा भारत जो अपने भविष्य से सामना करने के िलए बेहतर ढंग से तैयार था। नेहरू को भारत के लिए समाजवादी आर्थिक मॉडल में भरोसा था, यह बिल्कुल अलग मामला है। यह भी तथ्य है कि उन्होंने कई विचार सोवियत मॉडल से लिए। मसलन, पांच वर्षीय योजनाएं और अर्थव्यवस्था में सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका। ये विचार आज कालबाह्य लगती होंगे लेकिन, उस वक्त भारत के लिए अच्छी लगती थीं। और संभवत: वे अच्छी थीं भी, यदि आप निरपेक्ष दृष्टि से उन्हें देखें।


नेहरू अपने काम में इतने अच्छे थे कि कोई कल्पना ही नहीं कर पाता था कि उनके जाने के बाद की स्थिति से भारत कैसे निपट पाएगा। उन दिनों, खासतौर पर चीनी हमले के बाद लगातार यही पूछा जाता था कि नेहरू के बाद कौन? आज पांच दशकों और 13 प्रधानमंत्रियों के बाद यह प्रश्न निरर्थक लगता है। वास्तव में मेरे जैसे लोगों के दिलों-दिमाग में नेहरू की प्रासंगिकता अब भी है, जो साठ के दशक में पले-बढ़े और देश को एक रखने में नेहरू द्वारा निभाई भूमिका को जानते हैं। मैं प्राय: नई सहस्राब्दी में पैदा पीढ़ी को पूछते देखता हूं कि जवाहरलाल कौन थे? क्या वाकई वे इतने तिरस्कार योग्य हैं, जितने बताए जाते हैं?


यदि मैं उन्हें बताता हूं कि वे राहुल के परदादा थे तो वे कहते हैं, अच्छा, इसी से सब स्पष्ट हो जाता है! राहुल के परदादा भारत के प्रधानमंत्री थे। उनकी दादी इंदिरा गांधी भी प्रधानमंत्री थीं और उनके पिता राजीव, इंदिरा के पुत्र भी प्रधानमंत्री थे। और अब राहुल अगले प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं! लगभग तत्काल मोदी का आरोप निशाने पर लग जाता है- एक ही परिवार ने देश को तीन प्रधानमंत्री दिए और एक इंतजार कर रहा है। कोई अचरज नहीं है कि वंशवाद का आरोप इतना सच लगता है। किंतु जो जवाहरलाल पर भारत पर वंशवाद थोपने का आरोप लगाते हैं वे उनकी असली भूमिका भूल जाते हैं। वे असंदिग्ध रूप से हमारे स्वतंत्रता संघर्ष के महानतम नेताओं में से एक थे और वे ही थे जिन्हें नौ बार जेल में डाला गया और उन्होंने कुल 3,359 दिन जेल में बिताएं। उन नौ वर्षों में उन्होंने उल्लेखनीय किताबें लिखी, जिन्हें आज मैं ज्यादा पढ़ा जाते नहीं देखता। इसके बाद भी छवि यह बनाई गई कि नेहरू विशेष वर्ग के ऐसे व्यक्ति थे, जिन्हें गांधी की बदौलत प्रधानमंत्री पद तश्तरी पर रखा मिल गया, जबकि पटेल और बोस जैसे अधिक हकदार लोग इससे वंचित रखे गए।


दावा किया कि यदि नेहरू प्रधानमंत्री नहीं होते तो राष्ट्र का इतिहास कुछ और होता, बेहतर होता। नेहरू के आज के आलोचक यही दावा करते हैं। इनमें मोदी भी शामिल हैं, जिन्होंने हाल ही में दलील दी कि यदि सरदार पटेल प्रधानमंत्री होते तो भारत शक्तिशाली, बेहतर राष्ट्र होता और सारा कश्मीर हमारा होता। हम सब जानते हैं कि कश्मीर वाली बात गलत है। विभाजन के समय पटेल पूरा कश्मीर देने को तैयार थे। नेहरू नहीं होते तो वह भी हमारे पास नहीं होता, जो आज है। मुझे नहीं लगता कि कोई भी निष्पक्ष इतिहासकार दावा कर सकता है कि पटेल (या कोई अन्य) बेहतर प्रधानमंत्री होता। सच तो यह है कि ऐसा मानने का कोई कारण नहीं है।


भारत को उस वक्त ऐसा बुद्धिमान, विचारशील नेता चाहिए था, जिसका दुनिया में अत्यधिक सम्मान हो। नेहरू में यह बात थी। वे तब विश्व नेता थे जब भारत को शक्ति के रूप में नहीं देखा जाता था। हम उनके अर्थशास्त्र से सहमत हो अथवा नहीं, हमें यह मानना ही होगा कि उसी मॉडल पर चलते हुए उन्होंने राष्ट्र के सर्वोत्तम संस्थानों का निर्माण किया। जिन सुधारों की आज हम बात करते हैं वे इसलिए संभव हुए। नेहरू पर मोदी क्यों हमला करते हैं इसका कारण सरल सा है : वे नए भारत के उस डीएनए को खारिज करना चाहते हैं, जिसे नेहरू ने निर्मित किया और अपनी सारी खामियों के बाद भी उनकी बेटी इंदिरा गांधी ने आगे बढ़ाया। पहले सुधारों का श्रेय भी एक और कांग्रेसी को है, पीवी नरसिंह राव। जब मोदी कांग्रेस मुक्त भारत की बात करते हैं तो वे राव को भी खारिज करते हैं, जो भारत को उस राह पर ले गए, जिस पर चलने को मोदी इतने बेचैन हैं।


अब जब हम 2019 के निकट जा रहे हैं, जब उन्हें अपने सरकार के जनादेश का नवीनीकरण कराना है, तो उनके कदम उसी की झलक देते हैं, जिसके लिए कांग्रेस कभी जानी जाती थी। नीति आयोग के पूर्व प्रमुख और कभी मोदी के प्रिय अर्थशास्त्री रहे व्यक्ति ने हाल में लिखा है कि इस साल के संरक्षणवादी बजट में कस्टम ड्यूटी में इजाफा वस्तुत: उस कुख्यात लाइसेंस राज की वापसी का संकेत है, जिसे हमेशा नेहरू युग का निकृष्ठतम नतीजा बताया जाता रहा है। मजे की बात है कि महान सुधारों की बड़ी-बड़ी बातों के बावजूद, हम जो देख रहे हैं वह पुराने किस्म के नेहरूवादी अर्थशास्त्र और इंदिरा गांधी के समाजवादी नारों की चुपचाप वापसी है। हो सकता है प्रधानमंत्री वास्तव में उन पर भरोसा न करते हो पर स्वतंत्रता के 70 साल बाद भाजपा और आरएसएस को यह अहसास होता दिखता है कि आर्थिक सुधारों के बारे में हम चाहे जो कहें, चुनाव जीतने का मतलब है किसानों, कामगारों और सरकारी कर्मचारियों की विशाल फौज को पुचकारना। धर्मनिरपेक्षता विरोधी बातों और पूरे देश में नफरत फैलाने को छोड़ दें तो मोदी वहीं कर रहे हैं, जो आज यदि नेहरू मोदी होते तो करते। (ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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्रीतीश नंदी वरिष्ठ पत्रकार व फिल्म निर्माता्रीतीश नंदी वरिष्ठ पत्रकार व फिल्म निर्माता
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