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डिजिटल केवाईसी के बाद दस्तावेजों की जरूरत न रहे

डिजिटल क्रिप्टोकरेंसी व उसके व्यापार के लिए नीति बनाएं

Danik Bhaskar | Jan 24, 2018, 06:34 AM IST
नवीन सूर्या चेयरमैन, पेमेंट काउंसिल ऑफ इंडिया नवीन सूर्या चेयरमैन, पेमेंट काउंसिल ऑफ इंडिया

पिछले कुछ वक्त से सरकार के स्तर पर यह विचार रहा है कि डिजिटल पेमेंट का ढांचा बनाने की रफ्तार तेज करने के लिए एक समर्पित फंड बनाया जाए। यह उस व्यापक रणनीति का ही हिस्सा होगा, जिसके तहत नकदी आधारित लेन-देन में कटौती करने और छोटे व्यापारियों को इलेक्ट्रॉनिक पेमेंट इकोसिस्टम पर आने के लिए प्रोत्साहित किया जाना है। उम्मीद है कि बजट में इसकी घोषणा होगी। यदि ऐसा हुआ तो यह एक्सपर्ट पेनल की इस आशय की सिफारिशों के अनुरूप ही होगा। इसके अलावा भी डिजिटल पेमेंट के सेक्टर में कई कदम उठाना समय की मांग है:

डिजिटल प्रक्रिया और भौतिक प्रक्रिया का दोहराव रोकना

पिछले कुछ वर्षों में सरकार और फाइनेंशिल सेक्टर के रेग्यूलेटरों ने गंभीर साहसी कदम उठाए हैं और आधार ई-केवाईसी, डिजिटल सिग्नेचर इत्यादि डिजिटल प्रक्रिया को अनुमति दी है। लेकिन, विभिन्न नियमों के तहत अब भी एक साल के भीतर केवाईसी के लिए भौतिक दस्तावेज ले जाना अनिवार्य है। इसी तरह कुछ नियम और कानूनी अनिवार्यताएं ऐसी हैं कि भौतिक रूप में विभिन्न दस्तावेज पेश करना जरूरी हो जाता है। ऐसे में व्यक्तिगत रूप से भौतिक दस्तावेज रखना अपरिहार्य है। अब वक्त आ गया है कि सरकार और रेग्यूलेटर दोनों डिजिटल प्रक्रिया में शत-प्रतिशत विश्वास दिखाएं और एक साल के भीतर भौतिक दस्तावेज पेश करने की अतिरिक्त आवश्यकता बिल्कुल न रहे।

डिजिटल पेमेंट उपकरणों और नकदी में समानता ताकि केशलेस को अधिक तेजी से अपनाया जा सके

हमारे देश में व्यापारियों अथवा भुगतान करने वाले के लिए 49999 रुपए तक के सारे वाणिज्यिक लेने-देन बिना किसी प्रक्रिया, केवाईसी या अन्य किसी औपचारिकता के करने की मंजूरी है। जबकि सारे डिजिटल पेमेंट यूज़र ट्रांजेक्शन बहुत छोटे मूल्य का ही क्यों न हो पर उसके लिए व्यापक केवाईसी और अन्य प्रक्रियाओं की जरूरत होती है। 50000 रुपए के सारे लेने-देन वालेट जैसे डिजिटल पेमेंट ऑप्शन मुक्त रूप से सबके लिए और न्यूनतम प्रक्रिया के साथ उपलब्ध होने चाहिए अथवा 10,000 रुपए के ऊपर के नकदी लेन-देन पर भी केवाईसी जरूरी होना चाहिए। सरकार को डिजिटल पेमेंट स्वीकार करने वाले व्यापारियों को ओवरऑल इंक्रिमेंटल वैल्यू पर टैक्स में राहत देने पर विचार करना चाहिए खासतौर पर जिनका वार्षिक टर्नओवर 20 लाख रुपए हो जैसा कि आरबीआई एमडीआर गाइडलाइन में प्रस्तावित है। सभी व्यापारियों को 2000 रुपए से नीचे के नि:शुल्क लेन-देन की सुविधा का लाभ केवल बड़े व्यापारियों को मिलेगा और यह करदाता के पैसे का श्रेष्ठतम उपयोग नहीं है। ज्यादातर पांच सितारा कॉफी शॉप के लेन-देन 2000 रुपए से ऊपर के होते हैं और उन्हें फ्री ट्रांजेक्सन सपोर्ट के लिए किसी सरकारी सब्सिडी की जरूरत नहीं हो सकती है।

व्यक्तिगत कर छूट की सीमा

वित्तीय सेवाओं संबंधी निवेश या लागत से जुड़ी व्यक्तिगत कर छूट में यात्रा और मकान किराये में छूट का लाभ मिला है। इसी तरह अब वक्त अा गया है कि जीवन बीमा, मेडिकल बीमा, व्यक्तिगत श्रेणी वाली वैल्यू के म्यूचुअल फंड का कुल यूज़र बेस बढ़ाने और बैंकिंग से परे वित्तीय समा‌वेश को बढ़ावा देने के लिए खर्च व निवेश के बढ़ते मूल्य के लिए छूट का प्रावधान करना होगा। इसका हाउसिंग सेक्टर से जुड़े फायदे व्यापक मध्यवर्ग तक पहुंचाने और किफायती आवास की श्रेणी में एकाधिक फायदे होंगे।

डिजिटल पेमेंट पर एक्सपर्ट समिति की सिफारिशों पर अपडेट की समीक्षा और उसे अमल में लाने की रफ्तार को तेजी देना भी जरूरी है। इस समिति की रिपोर्ट के संबंध में पिछले बजट में की गई घोषणाएं अभी पूरी तरह अमल में लाई जानी हैं।

आखिर में, सरकार को लीगल टेंडर अथवा सरकार समर्थित डिजिटल करंसी पर गंभीर दृष्टिकोण अपनाना होगा ताकि डिजिटल भारत में हम डिजिटल रुपए के साथ प्रवेश करे। इसी तरह निजी स्तर पर जारी की गई डिजिटल क्रिप्टोकरंसी और उनके व्यापार के लिए उचित नीतियां और तत्काल नियामक ढांचा निर्मित करने की जरूरत है। इसके अभाव में ग्राहकों के साथ धोखाधड़ी हो सकती है और जो कानून के मुताबिक काम कर रहे हैं उन्हें पूंजी और निवेश खोने का जोखिम रहेगा। वक्त आ गया है कि सरकार इसे गंभीरता से लेकर उचित कानून बनाए। जहां तक क्रिप्टो करंसी ट्रेडिंग की बात है, सेबी इस बाजार और इससे संबंधित जोखिम को अच्छी तरह मैनेज कर सकता है। लीगल टेंडर करंसी के लिए वित्त मंत्रालय की सहायता से आरबीआई नेतृत्व संभाल सकता है।