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महिला अधिकारों पर सिर्फ बातें करने से कुछ नहीं होगा

प्रधानमंत्री की ये बातें सुनकर सवाल यही उठता है कि सामाजिक और राजनीतिक परिवेश में महिलाओं की क्या स्थिति है?

Danik Bhaskar | Feb 13, 2018, 06:23 AM IST
महेश तिवारी, 20 माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय, भोपाल महेश तिवारी, 20 माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय, भोपाल

देश में महिलाओं के विषय में बात होना अच्छी बात है। बीते दिनों मन की बात कार्यक्रम में प्रधानमंत्री ने कहा कि महिलाओं का सम्मान करना हमारी संस्कृति में है। आज महिलाएं हर विधा और हर क्षेत्र में नए आयाम छू रही हैं। प्रधानसेवक ने स्कंद पुराण का ज़िक्र करते हुए कहा, एक बेटी दस बेटों के बराबर होती है। अगर आत्मविश्वास है, तो कुछ भी संभव नहीं है।


प्रधानमंत्री की ये बातें सुनकर सवाल यही उठता है कि सामाजिक और राजनीतिक परिवेश में महिलाओं की क्या स्थिति है? यह किसी से छिपी नहीं है। फिर महिलाओं की सुरक्षा और सामाजिक स्थिति में सुधार का व्यापक कदम उठाया क्यों नहीं जाता? सभी क्षेत्रों में महिलाओं को बराबरी का अधिकार दिए जाने की बातें होती हैं, लेकिन उसे अमलीजामा क्यों नहीं दिया जाता? संसद में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण न मिल पाना ही यह साबित करने के लिए काफी है कि शायद राजनीति भी दोमुंही बात करने में ज्यादा यकीन रखती है। जब महिलाओं की सामाजिक स्थिति सुधारनी ही है तो फिर उन्हें राजनीतिक और सामाजिक अधिकार क्यों नहीं दिए जा रहे। देश में स्त्रियों की दशा और दिशा सुधारने की राजनीतिक पहल करने की बात मुखर होती रहती है। फ़िर अगर किसी लड़की के साथ सामाजिक या शारीरिक उत्पीड़न होता है, तो हो सकता है कि मुकदमा दर्ज करने और घटना सुनने वाला कोई पुरुष हो।


पुलिस बल में महिलाओं की बेहतर उपस्थिति सुनिश्चित करने 2009 में मनमोहन सिंह सरकार ने सभी केंद्र शासित प्रदेशों और राज्यों के पुलिस बल में महिलाओं की संख्या कम से कम 33 फीसदी करने के लिए कहा था। पर यह महिलाओं के अधिकार के प्रति अचेतन अवस्था का परिणाम है कि महिला अपराधों में तेजी से वृद्धि हो रही है, लेकिन पुलिस बल में महिलाओं की संख्या में विशेष अजाफा होता नहीं दिख रहा। देश में सिर्फ 586 महिला पुलिस थाने हैं, यानी प्रत्येक जिले में एक भी नहीं। देश में लगभग 641 जिले हैं। यह साबित करता है कि हमारा पितृसत्तात्मक समाज आज भी महिलाओं को उनका अधिकार देने से कतरा रहा है।