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भारी पड़ सकती है साइबर सुरक्षा के प्रति हमारी उदासीनता

भारत में एक ओर डिजिटलीकरण को बढ़ावा दिया जा रहा है, तो दूसरी ओर साइबर सुरक्षा पर संकट के बादल मंडराते रहे हैं।

Dainik Bhaskar

Jan 19, 2018, 05:44 AM IST
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भारत में एक ओर डिजिटलीकरण को बढ़ावा दिया जा रहा है, तो दूसरी ओर साइबर सुरक्षा पर संकट के बादल मंडराते रहे हैं। आधार को लेकर भी साइबर सुरक्षा चर्चा में है। पिछले 10 वर्षों में भारत में साइबर अपराधों में 19 गुना वृद्धि हुई है। करोड़ों खर्च करने के बावजूद सरकार खुद भी इसका शिकार बनती रहती है। साइबर अपराध के अंतर्गत ऐसे गैर-कानूनी कार्यों को सम्मिलित किया जाता है, जिनमें कंप्यूटर प्रणाली को हथियार के रूप में इस्तेमाल करके अन्य कंप्यूटरों को निशाना बनाया जाता है, जैसे- हैकिंग, सलामी हमला,पासवर्ड क्रैकिंग इत्यादि।


यदि अपराध में बढ़ोतरी हो रही है तो अपराध के प्रति जागरूकता तथा इससे बचने के कारगर उपाय में भी बढ़ोतरी करनी पड़ेंगी। साइबर सुरक्षा को लेकर भारत की उदासीनता बेहद चिंताजनक है। यह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी भारी पड़ सकती है। तुलनात्मक रूप से भारत में साइबर सुरक्षा के जानकारों की संख्या कम है। सरकारी अनुमान के अनुसार साइबर हमलों तथा साइबर आतंकवाद से निपटने के लिए भारत को पांच लाख से अधिक साइबर विशेषज्ञों की आवश्यकता है। बेशक, सरकार ने कुछ कदम उठाए हैं,लेकिन इसे पर्याप्त नहीं कहा जा सकता है। इन अपराधों से निपटने के लिए केंद्र ने साइबर सुरक्षा नीति 2013 की घोषणा की है। इसके तहत राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय नोडल एजेंसी होगी, जो साइबर सुरक्षा से जुड़े सभी मामलों की निगरानी करेगी। भारतीय कंप्यूटर आपातकालीन प्रतिक्रिया टीम (सर्ट-इन) की स्थापना भी हुई है, जो साइबर सुरक्षा से जुड़ी दुर्घटनाओं से निपटने के साथ ही सरकारी सूचना नेटवर्क, संचार तथा इंटरनेट को सुरक्षात्मक कवच मुहैया कराएगी।

सुरक्षा के अभाव में डिजिटलीकरण जितनी तीव्र गति से बढ़ेगा उतनी ही तीव्र गति से साइबर अपराध की आशंका बढ़ेगी। आवश्यकता है कि केंद्र तथा राज्य सरकारें परस्पर सहयोग से जिला स्तर पर साइबर विशेषज्ञों की टीम गठित करें। देश के सभी पुलिस स्टेशनों पर साइबर दारोगा की नियुक्ति हो। साथ ही व्यापक स्तर पर सूचना, सुरक्षा तथा जागरूकता के कार्यक्रमों का आयोजन किया जाना चाहिए।


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रजनीश भगत, 22
बिहार विश्वविद्यालय
मुजफ्फरपुर
rajnishmuz23@gmail.com

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