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अछूते विषय ही दर्शकों के मन तक पहुंच पाएंगे

कन्टेंट वाली फिल्में आज हिंदी सिनेमा के केंद्र में

Dainik Bhaskar

Dec 30, 2017, 07:50 AM IST
पीयूष मिश्रा लेखक, गीतकार, निर्देशक और अभिनेता पीयूष मिश्रा लेखक, गीतकार, निर्देशक और अभिनेता

आज सिनेमा का एक ही मतलब है - कन्टेंट। कन्टेंट नहीं तो फिल्म नहीं! हां, यह सच है कि सुपर स्टार्स की फिल्में सफल हो रही हैं, उनका क्रेज बना हुआ है, लेकिन देखिए तो - वे भी खुद को बदल रहे हैं। अक्षय कुमार कितनी बढ़िया फिल्में कर रहे हैं – ‘टॉयलेट एक प्रेमकथा’ और ‘पैडमैन’ वगैरह। ये सब कन्टेंट वाली फिल्में हैं और फिर, सितारों की रूटीन फिल्मों से अलग, हिंदी सिनेमा का चेहरा बहुत तेजी से बदल रहा है। दस साल पहले कन्टेंट वाली फिल्मों का नामलेवा नहीं था, आज ऐसी फिल्में सिनेमा उद्योग के केंद्र में हैं। यह बहुत अच्छी शुरुआत है। नया दौर है। दरअसल, हम चिंता बहुत करते हैं। गहरे उतरें तो देखेंगे कि फ्रेंचायजी, सीक्वल, मसाला, स्टार पावर के अलग दर्शक और समर्थक हैं।


दो साल पहले आई ‘मसान’ सिनेमा में बदलाव का बड़ा संकेत है। सामान्य दर्शकों, आलोचकों और पत्रकारों - सबने ‘मसान’ को पसंद किया। ये एक ऐसी फिल्म है, जिसने कहानी सुनाने, दिखाने और देखने के तरीके और नज़रिये में बदलाव लाने की जरूरत पर जोर दिया। गौर कीजिए ‘मसान’ में किसी पारम्परिक ढंग का अनुसरण नहीं किया गया है। कोई स्ट्रेट लाइन नहीं है, कोई फर्स्ट या सेकंड ड्राफ्ट या वर्जन नहीं है, न कहानी में झूठ-मूठ का चमत्कार और जादू दिखाया गया है। एक छोटे शहर के आम आदमी की ज़िंदगी कैसी होती है - यही सब कुछ दर्शक जानना-समझना और उसमें शामिल होना चाहता था, इसलिए ‘मसान’ सफल रही। ‘मसान’, ‘बैंडिट क्वीन’ की राह पर चलती हुई फिल्म थी। सीधे जीवन से उठाई हुई फिल्म। अब हम यथार्थ का सामना करने में सक्षम हैं।


‘आंखों देखी’ उससे भी पहले आ गई थी। इन फिल्मों का स्टार कौन है - कहानी ही तो! कहानी स्टार हो जाए तो फिल्म कुछ अलग ही होती है। स्टार उसे चार चांद लगा देते हैं। इन दिनों मैं खुद एक ऐतिहासिक, लेकिन मौजूं फिल्म (लव स्टोरी) की कहानी, संवाद और गीत लिख रहा हूं। ये फिल्म मौजूदा मुद्‌दे पर है, यानी इतिहास से जुड़े होने के बावजूद प्रासंगिक है। प्रासंगिकता भी मुझे लगता है हिंदी सिनेमा का नया चरित्र है। वैसे यथार्थ ही प्रासंगिकता देता है। मुझे पूरा विश्वास है कि भविष्य में अछूते विषय ही दर्शकों के मन तक पहुंच पाएंगे।


बीते साल चार-पांच बड़ी फिल्में फ्लॉप हो गईं। शाहरुख खान की फिल्म नहीं चली, सलमान खान को भी असफलता का सामना करना पड़ा। इसका मुझे दुख है, क्योंकि फिल्में न चलना एक कलाकार के तौर पर आहत करता है, लेकिन हम कुछ कर नहीं सकते। एक बार फिर वही बात कहूंगा कि बगैर कन्टेंट के फिल्में देर तक नहीं चल सकेंगी। यह भारत के आम सिनेमा दर्शक के परिपक्व होने का संकेत है। वैसे, कन्टेंट के साथ-साथ हमें और ज्यादा समझदार और अनुशासित होना पड़ेगा। तब सिनेमा और बदलेगा। कुछ लोग स्टूडियोज के आने पर सवाल उठा रहे हैं, उन्हें बता दूं कि जहां पैसा होता है, स्टूडियो भी वहीं आते हैं। ये हमारे नज़रिये पर है कि हम उनके साथ मिलकर अच्छी फिल्में बनाएं।


हालांकि उलझाव, निराशा और विचार-विमर्श के बीच, बहुत उम्मीद है। नए कलाकारों में रणबीर कपूर मुझे पसंद है। वे संजय दत्त की बायोपिक कर रहे हैं, जो एक तरह की चुनौती है। बायोपिक हमेशा चुनौती रहते हैं, क्योंकि मुख्य किरदार को दर्शन पहले से जानते हैं और कलाकार को भी जानते हैं। खुद को भुलाकर किरदार को साकार करना सचमुच चुनौती है। राजकुमार राव, नवाजुद्‌दीन मेहनत कर रहे हैं। विकी कौशल में बड़ी संभावना है। कृति सेनन अच्छा काम कर रही हैं। ‘बरेली की बर्फी’ में वे कितनी सहज और स्वाभाविक दिखी हैं। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के छात्र अभिनेता और लेखक पल्लव और छात्रा स्नेहलता में चमक दिखाई देती है। मुकेश छाबड़ा
के साथ एक युवा लेखक अविनाश तोमर कार्यरत हैं। ये सब युवा हमारा भविष्य हैं।


नए साल में जिन निर्देशकों की फिल्मों से मुझे उम्मीद है, उनमें इम्तियाज अली, विशाल भारद्वाज, अनुराग कश्यप शामिल हैं। अनुराग की नई फिल्म- ‘मुक्काबाज’ देखिए, कितनी ताज़गी भरी कथा है। विशाल भारद्वाज नई कहानियां तलाश रहे हैं। सच यही है कि बहुत-से फिल्मकार अलहदा ढंग से सोच रहे हैं। 15 साल पहले से तुलना करें तो आज की फिल्में ज्यादा ताज़गी भरी, सोच के हिसाब से अनूठी और प्रोग्रेसिव हैं। सर्वाधिक सुखद बात है कि लोग अलहदा कन्टेंट में रुचि ले रहे हैं, सिनेमाघर तक जाकर, टिकट खरीदकर ऐसी फिल्में देख रहे हैं। नई सोच का सिनेमा बनाने वालों को जल्दी हार नहीं माननी चाहिए। राह अलग चुनी है तो चुनौतियां भी नए ढंग की होंगी। 2018 में इन चुनौतियों के लिए समाधान और अलग तरीके की फिल्मों के लिए सफलता के नए रास्ते खुलेंगे। आमीन!

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पीयूष मिश्रा लेखक, गीतकार, निर्देशक और अभिनेतापीयूष मिश्रा लेखक, गीतकार, निर्देशक और अभिनेता
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