संपादकीय

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मालदीव में कार्रवाई करने को लेकर कशमकश में भारत

चीन और सऊदी अरब से टकराव की स्थिति उत्पन्न होती है। अगर नहीं करती है तो भारत के हितों को भारी क्षति पहुंचेगी।

Danik Bhaskar

Feb 08, 2018, 06:23 AM IST

आपातकाल से गुजर रहे मालदीव की राजनीतिक स्थितियों ने भारत को पसोपेश में डाल दिया है। अगर मोदी सरकार वहां के विपक्षी दलों और पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नाशीद की अपील को देखते हुए सैनिक कार्रवाई करती है तो चीन और सऊदी अरब से टकराव की स्थिति उत्पन्न होती है। अगर नहीं करती है तो भारत के हितों को भारी क्षति पहुंचेगी। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के अखबार ‘ग्लोबल टाइम्स’ ने चेतावनी दे दी है कि यह मालदीव का आंतरिक मामला है और इसमें भारत हस्तक्षेप न करे। जबकि मौजूदा राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन ने सुप्रीम कोर्ट का फैसले मानने से इनकार करते हुए न सिर्फ अस्सी वर्षीय पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल गयूम को गिरफ्तार किया है बल्कि उन जजों को भी हिरासत में ले लिया है जिन्होंने नाशीद और दूसरे विपक्षी दलों पर चलाए गए मुदकमों को राजनीति प्रेरित कहा था।

भारत मालदीव का करीबी देश रहा हैं। सन 1988 में जब श्रीलंका से गए आतंकियों ने तत्कालीन राष्ट्रपति गयूम का तख्तापलटने की कोशिश की थी तब राजीव गांधी सरकार ने 1600 सैनिक भेज कर वहां राजनीतिक स्थिरता कायम की थी और पूरी दुनिया से वाहवाही लूटी थी। इसलिए मौजूदा मोदी सरकार के सामने सैन्य हस्तक्षेप की नज़ीर तो है लेकिन स्थितियां बदली हुई हैं। इस बार उसे आतंकियों पर नहीं, सीधे मालदीव की यामीन सरकार पर कार्रवाई करनी होगी। भले ही यह सरकार असंवैधानिक, तानाशाहीपूर्ण और धार्मिक कट्टरता से परिचालित है लेकिन उसके पीछे परोक्ष तौर पर चीन का आर्थिक और राजनयिक हित भी खड़ा हुआ है।

मालदीव चीन, जापान और भारत में होने वाली ऊर्जा की आपूर्ति के गलियारे के सन्निकट होने के कारण रणनीतिक महत्त्व रखता है। चीन ने वहां काफी निवेश भी कर रखा है और उसकी कंपनियों को मालिकाना हक देने के लिए राष्ट्रपति यामीन देश के कानूनों में कई मौलिक बदलाव भी करने पर आमादा हैं। यामीन इस समय चीन के इशारे पर वही भूमिका निभा रहे हैं जो कभी श्रीलंका में राजपक्षे निभा रहे थे। जाहिर है कि भारत मालदीव के इस संकट में हाथ पर हाथ धर कर बैठ नहीं सकता और ऐसी सैन्य कार्रवाई भी नहीं कर सकता जिससे इलाके में गंभीर तनाव हो। मालदीव का संकट यामीन को सत्ता से हटाए बिना दूर होगा नहीं, इसलिए भारत को उस दिशा में दूसरे तरीके अपनाने ही होंगे।

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