संपादकीय

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सूचनाओं के इस हमाम में दलों की नैतिकता

डाटा माइनिंग और राजनीतिक सलाह देने वाली कंपनी कैंब्रिज एनालिटिका की स्थापना व्हाइट हाउस के पूर्व सलाहकार ने की थी।

Danik Bhaskar

Mar 28, 2018, 11:35 PM IST
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कांग्रेस और भाजपा के बीच आंकड़ों की चोरी और दुरुपयोग के बहाने छिड़ी जंग को कैंब्रिज एनालिटिका कंपनी के पूर्व कर्मचारी क्रिस्टोफर वाइली ने ब्रिटिश संसद के समक्ष अपने इकबालिया बयान से रोचक बना दिया है। उनके यह कहने के बाद कि कांग्रेस उनकी कंपनी की ग्राहक थी सत्तारूढ़ भाजपा की बांछें खिल गई हैं और उसने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से माफी की मांग शुरू कर दी है। इससे पहले कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने कहा था कि कैंब्रिज एनालिटिका कंपनी से उनका कोई वास्ता नहीं है। कैंब्रिज एनालिटिका डाटा माइनिंग और राजनीतिक सलाह देने वाली ऐसी कंपनी है, जिसकी स्थापना व्हाइट हाउस के पूर्व सलाहकार स्टीव बैनन ने की थी। यह कंपनी राजनीतिक दलों और नेताओं के पक्ष में पासा पलटने में उस्ताद मानी जाती है और इसके खाते में 2016 की डोनाल्ड ट्रम्प की जीत तो है ही 2010 में लालू प्रसाद को हराकर नीतीश कुमार को सत्ता दिलाने का श्रेय भी है। आंकड़ों की चोरी और राजनीतिक जनमत को प्रभावित करने की यह श्रृंखला फेसबुक से शुरू होकर ग्लोबल साइंस रिसर्च जैसी संदेहास्पद साख वाली कंपनी से होते हुए कैंब्रिज एनालिटिका तक जाती है। ग्लोबल साइंस रिसर्च चोरी किए गए आंकड़े कैंब्रिज को उपलब्ध कराती थी। वाइली ने ब्रिटिश संसद की समिति के समक्ष यह कहकर यूरोप में हंगामा मचा दिया है कि ब्रिटेन का यूरोपीय संघ से अलग होने का पूरा काम भी धोखाधड़ी का ही था। एक तरफ इस कंपनी की सेवाएं लेने वालों में कांग्रेस का नाम है तो दूसरी तरफ नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल(यू) का नाम भी आ रहा है। अगर कांग्रेस पार्टी केंद्र में शासन कर रही भाजपा की प्रतिद्वंद्वी है तो जद (यू) भाजपा की सहयोगी दल। सूचनाओं के इस हमाम में यूरोप और अमेरिका से लेकर भारत तक बहुत सारे राजनीतिक दल निर्वस्त्र खड़े हैं। वाइली ने पूरा ब्योरा न देते हुए कहा है कि भारत में कई तरह की सेवाएं ली जाती थीं जिनमें कुछ क्षेत्रीय स्तर पर भी होती थीं। डाटा माइनिंग करने वाली यह कंपनियां पहले पोस्ट-ट्रुथ का उत्पाद करती हैं और फिर उसके माध्यम से जनमत में तोड़फोड़ करती हैं। इन स्थितियों ने आधुनिक लोकतंत्र के समक्ष बड़ी चुनौती पैदा की है। देखना है कि राज्य नामक संस्था इससे निपटने में कामयाब होती है या सूचना और लोकतंत्र की कोई नई पारिस्थितिकी उभरती है।
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