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सियासत और इंसानियत के बीच समाज सुधार का कदम

सजा मुस्लिम महिलाओं के साथ इस देश की धर्मनिरपेक्ष राजनीति भुगत रही है।

Dainik Bhaskar

Dec 30, 2017, 07:54 AM IST
Politics and humane

अच्छा हुआ कि विपक्ष के दिखावटी विरोध को दरकिनार करते हुए तलाक-ए-बिद्‌दत को संज्ञेय और गैर-जमानती अपराध बनाने वाला मुस्लिम महिला विधेयक लोकसभा से पास हो गया और इस पर राजनीति की संभावना घट गई। अभी इसे राज्यसभा से पास होना है लेकिन, लोकसभा में तकरीबन 150 की ताकत रखने वाले विपक्ष ने संशोधन के पक्ष में महज चार वोट दिए इसलिए उसके समक्ष वहां भी बाधा पैदा होने की गुंजाइश नहीं है।

शाहबानो मामले के दूध की जली कांग्रेस ने शायरा बानो के मामले से निकले इस छाछ को फूंकना भी उचित नहीं समझा और राजद, तृणमूल, अन्नाद्रमुक, बीजद और वाममोर्चा ने भी क्षेत्रीय मजबूरियों के बावजूद प्रतीकात्मक विरोध से आगे कदम नहीं बढ़ाया।

यह न सिर्फ सुप्रीम कोर्ट के फैसले को देखते हुए लोकतांत्रिक संस्था के आदर का प्रश्न बना बल्कि कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद के शब्दों में सियासत से ज्यादा इंसानियत और स्त्रियों के अधिकार व सम्मान का मसला था। अब जो इस कानून का विरोध कर रहे हैं उनके भीतर या तो अल्पसंख्यक असुरक्षा की ग्रंथि है या फिर कानून के तकनीकी पहलू को लेकर कुछ दिक्कतें। अल्पसंख्यक पहचान का मसला जरूर है और उसे ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने विरोध का आधार बना रखा है। अब यह सरकार और विपक्ष दोनों की जिम्मेदारी है कि इन आशंकाओं को दूर किया जाए। क्योंकि भारत के राजनीतिक दलों ने कभी तुष्टीकरण तो कभी सांप्रदायिकता के माध्यम से मुस्लिम समुदाय के भीतर अल्पसंख्यक ग्रंथि पैदा की है।

वरना कोई वजह नहीं है कि जो तीन तलाक पाकिस्तान, बांग्लादेश, मिस्र, ट्यूनीशिया समेत कई इस्लामी व अरब देशों में प्रतिबंधित और दंडनीय है और जिसके बारे में भारत की सर्वोच्च अदालत ने 32 साल पहले भी प्रतिकूल टिप्पणियां की थीं उस पर संसद के कानून बनने में इतनी देर होती। अगर यह काम 32 साल पहले 1985 में उस समय कर दिया गया होता जब शाहबानो के मुआवजे के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला दिया था तो आज स्थिति कुछ और ही होती। दुर्भाग्य है कि उस समय की सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी मुस्लिम समाज के पुरुषवादी और कट्‌टरपंथी तबके से दब गई और न्यायालय के फैसले को पलटने वाला कानून पास कर बैठी, जिसकी सजा मुस्लिम महिलाओं के साथ इस देश की धर्मनिरपेक्ष राजनीति भुगत रही है।

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