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इक्कीसवीं सदी में झांकते प्राचीन भारत के सिद्धांत

राष्ट्र अपना अहंकार छोड़ें, पूंजीपति लाभ के कटघरे तोड़ें और नागरिक जाति और धर्म की संकीर्णता।

Dainik Bhaskar

Jan 25, 2018, 05:24 AM IST

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दावोस में 21वीं सदी की चुनौतियों को प्राचीन भारत के दर्शन से हल करने का जो आह्वान किया है उसे दुनिया कितना अपनाएगी यह कह पाना कठिन है। दुनियाभर की कंपनियों के प्रमुखों को संबोधित करते हुए उन्होंने आधुनिक प्रौद्योगिकी और डेटा की ताकत को रेखांकित किया। लेकिन, विखंडित होते विश्व को प्राचीन ज्ञान के आधार पर जोड़ने का जो नुस्खा पेश किया उससे दुनिया अपरिचित है ऐसा नहीं कहा जा सकता। गांधी तो 20वीं सदी की परिघटना हैं और उनसे उनके जीवन में ही यूरोप परिचित हो गया था लेकिन, उपनिषदों के वचन और बुद्ध की शिक्षाएं यूरोप में मैक्समुलर जैसे विद्वानों ने 19वीं सदी के ब्रिटेन में भारतीय विषयों के अध्ययन केंद्र स्थापित करके पहुंचानी शुरू कर दी थीं।

उन शिक्षाओं के बावजूद यूरोप में राष्ट्रवाद का उन्माद पनपा और उसने न सिर्फ दुनिया को गुलाम बनाया बल्कि दो विश्वयुद्धों के माध्यम से विश्व को विनाश की कगार पर लाकर खड़ा कर दिया। भले ही युद्ध से पीड़ित विश्व ने शांति और समृद्धि के लिए संयुक्त राष्ट्र और उसकी रचनात्मक संस्थाओं का निर्माण कर लिया लेकिन, देश उनकी बात मानने को तैयार नहीं हैं। इसलिए भारत के प्राचीन श्रेष्ठ विचारों का स्मरण भले आकर्षक लगे लेकिन,मौजूदा जटिल विश्व उनमें झांकने को तैयार नहीं है। मुक्त व्यापार और वैश्वीकरण के नाम पर उत्पन्न संस्थाओं ने संयुक्त राष्ट्र के मूल उद्‌देश्यों को ही नहीं छला है बल्कि दुनिया को जोड़ने के बहाने तोड़ने का काम किया है। वे भूल गए कि भयानक गैर-बराबरी और विपन्नता के होते हुए शांति और समृद्धि कायम करना कठिन काम है।

मोदी ने दुनियाभर के कंपनी प्रमुखों को भारत में व्यवसाय के लिए आमंत्रित किया है और बताया है कि पिछले बीस वर्षों में छह गुना आर्थिक शक्ति हासिल करके एक नया भारत उभरा है। दुनिया के चालीस बड़े कंपनी मालिकों को यह बात अच्छी लगी होगी कि अब भारत में व्यवसाय करना आसान हो गया है और भारत का मतलब व्यवसाय या काम करने से है। उन्हें सरकार से टकराव घटते जाने की बात भी ठीक लगी होगी लेकिन, एक बेहतर दुनिया का सपना सिर्फ इतने से साकार नहीं होगा। वह तभी पूरा होगा जब राष्ट्र अपना अहंकार छोड़ें, पूंजीपति लाभ के कटघरे तोड़ें और नागरिक जाति और धर्म की संकीर्णता।

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