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चुनाव के परे जीवन में संतुलन लाने का साहस हो

समाज में बढ़ते अकेलेपने के कारण आत्महत्या और डिप्रेशन के बढ़ते मामलों से आंखें मूंद लेने की प्रवृत्ति

प्रीतीश नंदी | Last Modified - Feb 07, 2018, 06:20 AM IST

  • चुनाव के परे जीवन में संतुलन लाने का साहस हो
    प्रीतीश नंदी वरिष्ठ पत्रकार व फिल्म निर्माता

    पिछले दिनों ब्रिटेन ने लोनलीनेस (अकेलेपन) के लिए मंत्री नियुक्त किया। इस खबर ने मुझे याद दिलाया कि बरसों पहले जब मैं पत्रकारिता में कॅरिअर शुरू कर रहा था तो मैंने राजनीतिक साप्ताहिक ‘संडे’ के लिए लोनलीनेस पर एक आवरण कथा लिखी थी। इस पत्रिका के संपादक थे मौजूदा विदेश राज्यमंत्री एमजे अकबर। उसमें मैंने जो प्रश्न उठाए थे उनमें एक यह था कि हम इसकी मौजूदगी से इतनी शर्मिंदगी क्यों महसूस करते हैं? हम सब इससे इनकार में क्यों जीते हैं? यह चालीस साल पहले की बात है।


    अब ब्रिटेन इस समस्या से सीधा सामना करने वाला पहला देश है। यदि आप आंकड़ों पर गौर करें तो 1970 के दशक के उस लेख के बाद से यह समस्या कई गुना बढ़ गई है। दर्ज की गई आत्महत्या की घटनाएं कम से कम दस गुना बढ़ गई हैं (याद रहे कि आज भी आत्मघात के मामले दुर्घटना की तरह लिए जाते हैं और विवाद से बचने के लिए जांच बंद कर दी जाती है)। डिप्रेशन के मामले तो 40 गुना बढ़ गए हैं लेकिन, वह इसलिए भी कि उन दिनों लोग अकेलेपन और डिप्रेशन को स्वीकारने से घबराते थे, क्योंकि उन्हें आशंका रहती थी कि उनके रिश्तेदार उन्हें तत्काल मनोचिकित्सालय में भर्ती करके उनकी जायदाद पर कब्जा कर लेंगे। इसलिए शिजोफ्रेनिया और बायपोलरिटी जैसे सबसे आम मनोरोग कालीन के नीचे धकेल दिए जाते थे, इस उम्मीद से कि वे अपने आप ही चले जाएंगे।


    मुझे याद है जब मैं बहुत छोटा था तो मेरे परिवार में मेरे सहित हर कोई मानता था कि मेरी दादी कुछ सनकी किस्म की हैं। इसकी बजाय कि हम उनके मूड के उतार-चढ़ाव समझते, हम उनके साथ हमेशा बुरा व्यवहार करते और आज पीछे मुड़कर देखता हूं तो मुझे संदेह होता है कि हमने इस तरह व्यवहार करके उनकी हालत और भी खराब कर दी। अपनी किशोर अवस्था में जिस लड़की से मैंने विवाह किया, उसके एक अंकल थे जिन्हें प्राय: महीनों तक चैन से बांधकर रखा जाता था। जिन लोगों पर मानसिक रूप से अस्थिर होने का संदेह होता, उन पर भीड़ सिर्फ मजे के लिए पत्थर फेंकती, उनकी पिटाई करती।


    कुछ उन्हें मादक पदार्थ के आदी समझते। कुछ लोगों को पीट-पीटकर मार डाला जाता, क्योंकि उन दिनों लोग सोचते कि यदि पागल आदमी काट ले तो आपको रैबीज भी हो सकता है। आज मैं अपनी कुछ लहरी आदतें सुलझाने के लिए किसी मनोचिकित्सक के पास जाने में खुशी महसूस करूंगा। मेरे दोस्तों में करीब 40 फीसदी ने किसी न किसी स्तर पर मानसिक चिकित्सक से परामर्श लिया है। हमेशा इसलिए नहीं कि वे बीमार या अस्थिर हैं बल्कि यह देखने के लिए कि कैसे वे अपनी ज़िदगी बेहतर बना सकते हैं। हम सब में कोई न कोई खब्त या सनक होती है। इनमें से कई इस तथ्य से पैदा होती है कि मोटेतौर पर हम पहले वाली पीढ़ियों की तुलना में अकेलेपन की ज़िदगी गुजारते हैं और हममें से मेरे जैसे कुछ लोग, जिन्हें अकेलापन अच्छा लगता है वे हमसे बात करने की इच्छा रखने वालों को अत्यधिक दवाब में रखते हैं। अकेलापन तो वास्तविक में मेरी पीढ़ी को परिभाषित करने वाली खासियत है। मेरी कविताएं लगातार उसका जश्न मनातीं। मेरे सबसे लोकप्रिय काव्य संकलन का नाम था ‘लोन सॉन्ग स्ट्रीट।’ इसमें लगभग हर कविता अकेलेपन के जादू व रहस्य पकड़ने का प्रयास करती, जबकि किताब को प्रेम कविताओं की किताब समझा जाता था। हर कोई अकेलेपन से उतना प्यार नहीं करता, जितना मैं करता हूं। कई लोगों ने इसे खुद पर थोप रखा है। उन्हें ऐेसा कोई चाहिए, जो उनसे कहे कि आज हर तीन में से एक व्यक्ति को प्रेम, देखभाल, थैरेपी चाहिए जिसकी तलाश में वे हैं। यदि हम उन्हें इतना दे पाएं तो हमारी कई सामाजिक समस्याएं गायब हो जाएंगी। इतना दुख-दर्द जो कई ज़िंदगियों को सालता रहता है उसे खत्म किया जा सकता है।


    आज अर्थव्यवस्था, कृषि, विदेशी मामले, लोकस्वास्थ्य, सूचना व प्रसारण जैसे मामले देखने के लिए असंख्य मंत्री हैं। यहां तक कि स्टील, खनन, टैक्सटाइस व कोयले के अपने मंत्री हैं तो सड़क व हाईवे, नदी और नागरिक विमानन के अपने मंत्री हैं। हम कभी अपना अकेलेपन का मंत्रालय बनाने के बारे में क्यों नहीं सोचते? या यदि इसे अधिक सकारात्मक ध्वनि देकर कहें कि हम खुशियों का मंत्रालय बनाने के बारे में क्यों नहीं सोचते? हर साल आत्महत्याओं की संख्या बढ़ती जा रही है और हम उन्हें सिर्फ एक दुर्घटना के रूप में बताते नहीं रह सकते। आंकड़े बताते हैं के अधिकतम आत्महत्याएं अधिक शिक्षित लोगों में होती हैं और वह भी बड़े शहरों में। जैसे डेविड रीज़मैन अपनी किताब ‘लोनली क्राउड’ में कहते हैं, जैसा अल्बर्ट कामू ने बार-बार कहा है अकेलापन तब प्रहार करता है जब आप बहुत से लोगों से घिरे हो, ऐसे लोगों से जिनसे आप रिश्ता न जोड़ पाते हों।


    धनी और प्रभावशाली लोग भी उतने ही अकेले होते हैं, जितने गरीब और बेघर। इस कठिन वक्त में तनाव किसी को नहीं बख्शता। जैसे ब्रिटिश प्रधानमंत्री थेरेसा मे ने नए मंत्रालय की घोषणा करते हुए कहा, ‘बहुत सारे लोगों के लिए अकेलापन आधुनिक ज़िंदगी की दुखद वास्तविकता है।’ रेडक्रास अकेलेपन और अलथ-थलग रहने को ‘छिपी हुई महामारी’ बताता है, जो सारे आयु वर्गों को सेवानिवृत्ति, किसी की मृत्यु या किसी से अलग होने के भिन्न क्षणों में प्रभावित करती है।


    ब्रिटेन में लोनलीनेस मिनिस्ट्री एक समिति की सिफारिशों के बाद लेबर सांसद जो कॉक्स की याद में बनाया गया है, जिनकी ब्रेग्जिट जनमतसंग्रह के ठीक पहले धुरदक्षिण पंथियों ने हत्या कर दी थी। उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी ऐसे लोगों की सहायता करते हुए गुजारी थी, जिन्हें दिल तोड़ देने वाले अकेलेपन से सामना करना पड़ रहा होता था। चूंकि हमारे यहां धुर दक्षिणपंती अतिवादियों की कोई कमी नहीं है, जिनमें से कुछ साफतौर पर ट्रिगर दबाकर खुश होने वाले भी हैं तो शायद ऐेसे किसी व्यक्ति को खोजने का यह वक्त है, जिसमें चुनाव जीतने की तत्कालिक बाध्यता तथा आर्थिक वृद्धि को रफ्तार देने के परे देखने का साहस और विज़न हो। वह हमारी ज़िंदगी में फिर संतुलन लाए ताकि हम आज की वास्तविकताओं से निपट सकें। (ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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