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इस चुनाव से शायद राजनीति की भाषा बदले

पार्टी के लिए 19 राज्यों में जीत कोई छोटी उपलब्धि नहीं है, जिसके पास 1984 में सिर्फ दो सांसद थे।

Dainik Bhaskar

Dec 20, 2017, 07:27 AM IST
प्रीतीश नंदी प्रीतीश नंदी

ये मजेदार चुनाव थे। दोनों पक्ष एक ही समय जीते भी और हारे भी। भाजपा जीती। इसने दोनों चुनाव जीते। आंकड़े स्पष्ट रूप से यह बताते हैं। हिमाचल प्रदेश में इसकी जीत ज्यादा यकीन दिलाने वाली थी और शायद गुजरात में जीत उतनी मुकम्मल नहीं है। वहां पार्टी का 150 सीटों का महत्वाकांक्षी मिशन न सिर्फ अधूरा रहा बल्कि अंतिम आंकड़ा 99, इसके आसपास भी नहीं है। लेकिन, बेशक जीत इसी की हुई है। अब भगवा रंग भारत के लगभग पूरे नक्शे पर छा गया है। उस पार्टी के लिए 19 राज्यों में जीत कोई छोटी उपलब्धि नहीं है, जिसके पास 1984 में सिर्फ दो सांसद थे। किसी ने कभी सोचा नहीं था कि इसका अतिवादी राष्ट्रवाद और बांटने वाली विचारधारा इस पैमाने पर सफलता दिलाएगी और इतने कम समय में इतना विस्तार देगी।


लेकिन, फिर आप जब आसपास देखते हैं तो पाएंगे कि हाल के वर्षों में दुनिया ने विभिन्न प्रकारों की विभाजनकारी विचारधाराओं का खुले हाथों से स्वागत किया है। आज कोई विचारधारा जितनी विभाजक होगी उतनी ही जल्दी इसके सत्ता में आने के अवसर ज्यादा होंगे। अतिवाद की तरफ ज्यादा से ज्यादा लोग आकर्षित हो रहे हैं। कोई शक नहीं कि भारत या कम से कम इसका काफी बड़ा हिस्सा एक ऐसी पार्टी के प्रबल सम्मोहन में आ गया है, जिसके बारे में किसी ने सोचा नहीं था कि वह यहां तक पहुंच जाएगी। लेकिन, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने आलोचकों के सामने एक इंच भी झुके बिना यह करके दिखाया। गुजरात के चुनाव ने फिर इसकी पुष्टि की है। चुनाव जीतना प्रधानमंत्री की अकेली सबसे बड़ी उपलब्धि हो गई है। वे लगभग 13 साल तक लगातार गुजरात के मुख्यमंत्री रहे। जब से वे 2014 में भारत के 15वें प्रधानमंत्री बने हैं, तो मोटेतौर पर उन्होंने लगभग वे सारे चुनाव जीते, जिनके लिए उन्होंने प्रचार किया था। इसलिए कोई आश्चर्य नहीं कि वे इन दोनों चुनावों में भी विजयी रहे।


किंतु, हर बार, हर चुनाव में प्रधानमंत्री को आगे आकर अधिक कठोर, अधिक लंबे समय तक चुनाव अभियान चलाना पड़ता है। उन्हें मतदाताओं को यह यकीन दिलाने के नए तरीके और साधन खोजने पड़ते हैं कि वे (और वे ही) भारत को कगार से खींचकर वापस ला सकते हैं (जबकि वे सिर्फ एक प्रादेशिक चुनाव जीतने का प्रयास कर रहे होते हैं)। उन्हें कोई नया विमर्श खोजना पड़ता है, जो अनूठा दिखे और प्राय: हम-आप के लिए मजेदार हो लेकिन, साफ है कि इसे स्वीकारने वाले बहुत हैं। जैसे-जैसे हम एक से दूसरे चुनाव की ओर बढ़ रहे हैं तो पाकिस्तान की खलनायक वाली भूमिका गहराती जा रही है। हर बार अल्पसंख्यकों की भूमिका को गौण बना दिया जाता है, क्योंकि भाजपा उन्हें विकास की चर्चा में लाने की परवाह किए बिना जीत जाती है। हर दृष्टि से देखेें तो अल्पसंख्यकों का भारत की मुख्यधारा के राजनीतिक विमर्श में वजूद खत्म हो गया है। गुजरात में तो कांग्रेस भी उनसे दूर ही रही। राहुल 15 मंदिरों में गए लेकिन, एक भी मुस्लिम घर में नहीं गए।


फिर हर चुनाव के साथ आमतौर पर हिंसा की घटना हो जाती है और उन्माद बढ़ जाता है। इस बार सिहरन पैदा करने वाला अपराध था मुस्लिम प्रवासी मजदूर की हत्या, जिसे किसी शंभु लाल ने क्रूरता से मारकर लव जेहाद के नाम पर जला दिया। ऐसे में जैसी अपेक्षा होती है इस कृत्य की व्यापक रूप से कोई निंदा (और त्वरित न्याय) नहीं हुई बल्कि कई हलकों से शिकार हुए व्यक्ति के परिवार को नहीं, हत्यारे के परिवार को समर्थन व पैसा मिला। राजनीति आज क्रुद्ध भीड़ को बहकाने की कला हो गई, जिससे भीड़ को उसका बचाव करने के और अधिक कारण मिल जाते हैं, जिसे शायद आप सात्विक क्रोध कहें। क्रोध किस पर? किसी को ठीक-ठीक पता नहीं है। हो सकता है इसका संबंध हमारे इतिहास से हो। यही वजह है कि बार-बार इतिहास फिर लिखने की बात होती है। ताकि नए नायक मिलें, जिनकी विशाल प्रतिमाएं सार्वजनिक स्थलों पर स्थापित की जा सकें। हारी हुई लड़ाई को पाठ्यपुस्तकें लिखकर जीती हुई बताएं जैसा राजस्थान ने हल्दीघाटी की लड़ाई के साथ किया, जिसमें अब राणा प्रताप के हाथों अकबर की हार दिखाई गई है। बाबरी मस्जिद जैसे ढांचे गिराकर अन्य देवताओं के वैकल्पिक स्मारक बनाए जा सकें।


उन पुराने किस्म के राजनीतिक मुद्दों का क्या हुआ, जिनकी हम दशकों तक चिंता करते रहें? नौकरियां निर्मित करने की आवश्यकता, हर किसी की पहुंच में अाने लायक किफायती स्वास्थ्य सेवाएं, हजारों किसानों को आत्महत्या करने से रोकने के तरीके और संसाधन खोजना, महिलाओं के लिए घरों व गलियों को सुरक्षित बनाना, शिक्षा का स्तर ऊंचा करना, पर्यावरण की रक्षा करना, जो लगातार गलत विकास परियोजनाओं के कारण खतरे में है और अर्थव्यवस्था का ऐसा विकास करना कि हर किसी को इसका फायदा हो। इतना कुछ करने की जरूरत है। कीमतें बेकाबू होती जा रही हैं। गरीब और गरीब हो रहे हैं। फिर भी इनमें से कुछ भी चर्चा में नहीं है। वे कभी-कभार चुनावी शोरगुल में आ जाते हैं लेकिन, ज्यादातर तो हम वहीं बातें सुनते रहते हैं भ्रष्टाचार, आतंकवाद, राम मंदिर का निर्माण और गांधी-नेहरू की आलोचना। क्या वाकई किसी अन्य मुद्दे का कोई अर्थ नहीं है? क्या टैक्स इकट्ठा करने के जटिल तरीके खोजना और में उथल-पुथल मचाना ही बदलाव लाने का एकमात्र तरीका है?


कांग्रेस हार गई, सही है। लेकिन, इस हार में इसे अपना नेता मिल गया है। गुजरात में भाजपा का सामना करने वाले (और हारने वाले) राहुल गांधी उस राहुल गांधी से पूरी तरह अलग हैं, जो इतने लंबे समय से चुनाव दर चुनाव हारते रहे हैं। यह हार बिल्कुल अलग है। इसलिए नहीं कि कांग्रेस (और तीन युवा जिन्हें कभी आजमाया नहीं गया अौर जो राहुल के साथ कंधे से कंधे भिड़ाकर लड़े : हार्दिक, अल्पेश और जिग्नेश) कम अंतर से हारी बल्कि इसलिए कि लंबे समय बाद कांग्रेस को नई आवाज मिली है। सबसे भयंकर चुनाव के बीच राहुल के सौम्य भाषणोें ने विरोधियों को भी चौंका दिया। जहां भाजपा लगातार भुजाएं फड़काती रही, उन्होंने नया, परिपक्व और समझदार व्यक्तित्व प्रदर्शित किया।


कौन जानता है। इससे शायद हमारी राजनीति की शब्दावली बदल जाए। अगली बार उन्हें कंधे से कंधे लगाकर लड़ने वाले और लोग मिल सकते हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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