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यह नफरत की जगह उम्मीद व प्रेम का वर्ष हो

वर्ष 2017 में दया और करुणा की हमारी मूल भावना के खिलाफ हुई कई शर्मनाक वारदातें

Dainik Bhaskar

Jan 06, 2018, 05:45 AM IST
प्रीतीश नंदी,वरिष्ठ पत्रकार एवं फिल्म निर्माता प्रीतीश नंदी,वरिष्ठ पत्रकार एवं फिल्म निर्माता

पिछले साल ज्यादातर मैं शिकायत करता रहा। नोटबंदी और इसके कारण जिस तरह लाखों लोगों को तकलीफ हुई उसे लेकर। जीएसटी को लागू करने के तरीके पर। किसानों से जिस तरह व्यवहार किया गया उस पर मुझे शिकायत थी। जिस बड़ी संख्या में वे आत्महत्या कर रहे थे उसने मुझे चिंता में डाल दिया था। मैंने सरकार की अजीब प्राथमिकताओं की शिकायत की। लेकिन, इन सबसे बढ़कर मेरी शिकायत विभिन्न बहानों से नफरत फैलाए जाने से थी।


गो संरक्षण पहला बहाना था (चूंकि अपनी ज़िंदगी के ज्यादातर हिस्से में मैंने जानवरों के संरक्षण के लिए काम किया है तो मैं जानता हूं कि मांस उद्योग कितना क्रूर और बेपरवाह है)। लेकिन, मांस उद्योग के छोटे से हिस्से, गरीब प्यादों को मारना-काटना इसका जवाब नहीं है। जिस दिन भारत में मैकडॉनल्ड का प्रवेश हुआ उस दिन से मारे जाने वाले चूजों की संख्या दिन दुगनी रात चौगुनी बढ़ी। हर साल 250 करोड़ पक्षियों को फॉर्म में पैदा करके मार दिया जाता है और पांच साल में यह संख्या दोगुनी होकर 500 करोड़ हो जाएगी। इसलिए जानवरों के प्रति क्रूरता की तो यहां कोई बात ही नहीं है। गोरक्षा के अभियान का इरादा बिल्कुल अलग है। हर अन्य मामले की तरह इस खेल में जबरन वसूली भी आ गई। निशाने पर देश की 4.8 अरब डॉलर की बीफ इंडस्ट्री को नियंत्रित करने वाले नहीं है, जिनमें से कई हिंदू हैं, जो मुस्लिम नामों वाली कंपनियां चलाते हैं। निशाने पर वे लोग हैं जो उन कंपनियों के मालिकों के इशारे पर काम करते हैं। मुस्लिम कसाई और मृत जानवरों की खाल निकालने वाले दलित। ये वे लोग हैं जिनकी बेरहमी से पिटाई की जाती है, हिंसक भीड़ निशाना बनाती है। जबकि भारत दुनिया का सबसे बड़ा बीफ निर्यातक बना रहता है, जो मलेशिया, सऊदी अरब, मिस्र और वियतनाम को 25 लाख टन गोमांस बेचता है, जहां से यह चीन भेजा जाता है। अपने घर में बीफ छिपाकर (जो बाद में गलत साबित हुआ) रखने के संदेह में मोहम्मद अखलाक के मारे जाने के साथ जो शुरू हुआ था, वह बेरोकटोक जारी है और इस हिंसा के 86 फीसदी शिकार मुस्लिम हैं। विदेशी मुद्रा कमाने के लिए अब हम बीफ को कैराबीफ यानी भैंस का मांस कहने लगे हैं। उसकी किसी को परवाह नहीं है।


अगला बहाना राष्ट्रवाद था। इसके तहत सरकार से सवाल पूछने वाला तत्काल गद्‌दार करार दिया जाता। शुरुआती शिकार बुद्धिजीवी, धर्मनिरपेक्षतावादी और कुछ बहादुर रचनात्मक लोग थे, जिन्होंने उनके मुताबिक भिन्न मतों के खिलाफ बढ़ती असहिष्णुता के विरोध में अपने राजकीय पुरस्कार लौटा दिए थे। फिर विद्यार्थियों का नंबर आया। उन्हें देशद्रोही करार दिया गया, क्योंकि वे वामपंथी थे। इसके बाद भी एबीवीपी (भाजपा की छात्र शाखा) ने हाल के यूनिवर्सिटी चुनाव में बहुत अच्छा प्रदर्शन नहीं किया। आखिर में मुस्लिम, जिन्हें बार-बार पाकिस्तान जाने को कहा गया। यह सुविधाजनक रूप से भुला दिया गया कि यही वे मुस्लिम थे, जिन्होंने 1947 मंें भारत में ही रहने का फैसला किया। अब उनके राष्ट्रवाद पर संदेह जताना ठीक नहीं है।


फिर था लव जिहाद। मुस्लिमों पर हिंदू लड़कियों को जेहादी बनाने के इरादे से उनके साथ भागकर शादी करने का आरोप लगाया गया। हिंदू लड़कियों के साथ प्रेम-प्रकरण के संदेह में कई मुस्लिमों को उठाकर निर्दयता से पीटा गया। अदालतों ने भी इन लड़कियों को संरक्षण नहीं दिया जैसाकि हमने 24 साल की हदिया के मामले में देखा। एक कोर्ट ने शादी खत्म कर दी और लड़की को पिता के पास भेज दिया। दूसरी ने उसे कॉलेज भेजकर वहां नया संरक्षक दे दिया। किसी ने उसे उस व्यक्ति के पास भेजने की बात नहीं की जिसके साथ उसने शादी करने का फैसला किया था।


निम्न जाति वालों के साथ भी घृणा का व्यवहार हुआ। 1 जनवरी को ही एक अखबार में खबर थी कि 45 वर्षीय दलित महिला, उसके मजदूरी करने वाले पति अौर अन्य सदस्यों को श्यामली के नोजल गांव में हफ्तेभर पिटाई की गई, दुष्कर्म कर यंत्रणाएं दी गईं। सिर्फ इस संदेह में कि शाहिबाबाद में आजीविका के लिए गया उनका बेटा भिन्न जाति की लड़की के साथ भाग गया है। आखिरकार क्रिसमस के दिन पुलिस ने उन्हें बचाकर बाहर निकाला।
अगला था शरणार्थियों का भय। जब म्यांमार सेना रोहिंग्याओं के जातीय सफाये पर तुल गई तो भारत में रह रहे 40 हजार असहाय रोहिंग्याओं को संभावित आतंकी का लैबल लगा दिया गया। रोहिंग्या अधिकारों से वंचित ऐसे मुस्लिम है, जिन्हें म्यांमार में उनके घरों से भगाया जा रहा है। अब भारत भी उन्हें बाहर भेजना चाहता है। पिछले रविवार की रात को नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्टर के पहले मसौदे में 40 फीसदी के नाम गायब हैं। 3.30 करोड़ लोगों के आवेदनों में से 1.90 करोड़ लोगों के ही नाम मंजूर हुए। शेष बेचारे देश निकाले की आशंका में जी रहे हैं। आत्महत्याएं होने लगी हैं। काशीपुर में पिकअप वैन चलाने वाले 40 वर्षीय हनीफ खान पेड़ से लटकते पाए गए। उनकी पत्नी का कहना है कि एनआरसी को लेकर वे तनाव में थे और जब उनका नाम नहीं आया तो वे गायब हो गए।


मनमोहन सिंह की गलती यह थी कि उन्होंने ऐसी सत्ता का नेतृत्व किया जो असहनीय रूप से अहंकारी व भ्रष्ट थी। वे तब भी चुप रहे, जब उन्हें बोलना चाहिए था। प्रधानमंत्री मोदी भी वही गलती कर रहे हैं जब ऐसे लोगों के साथ अवर्णनीय वारदातें हो रही हैं, जो हाशिये पर मौजूद इन ठगों के खिलाफ खुद का बचाव नहीं कर सकते। इन मामलों उनका बोलना पर्याप्त नहीं है।


हां, वे चुनाव जीतते रहे हैं। व्यापक तबकों में उनकी असंदिग्ध लोकप्रियता है। लेकिन, यदि भारत दया और करुणा की अपनी मूल भावना खो देता है तो इन सारी विजयों की क्या कीमत है? मेरी एकमात्र उम्मीद यही है कि 2018 का साल अलग होगा। नफरत और डर की जगह उम्मीद व प्रेम लेगा। और हां, तब जाकर मेरी शिकायत थमेगी।


(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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