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सच का सामना करने की कला फिर सीखनी होगी

देश की आर्थिक तरक्की को लेकर गढ़े गए आंकड़ों की बजाय हकीकत की गहराई में जाना होगा

Dainik Bhaskar

Jan 17, 2018, 05:15 AM IST
प्रीतीश नंदी वरिष्ठ पत्रकार एवं फिल्म निर्माता प्रीतीश नंदी वरिष्ठ पत्रकार एवं फिल्म निर्माता

भारत के साथ कई चीजें गलत हैं। ईमानदारी से कहें तो दुनिया के ज्यादातर देशों के साथ कई चीजें गलत हैं खासतौर पर वे जो बहुत धनी या बहुत गरीब हैं। सच कहूं तो मैं नहीं जानता कि भारत को किस श्रेणी में रखूं, क्योंकि कई तरह से तो हम अत्यधिक धनी हैं और फिर भी कई अन्य मामलों में बहुत गरीब हैं। असली प्रश्न यह है : क्या इन तीन वर्षों में हम उन क्षेत्रों में अधिक धनी हुए हैं जिनमें हम धनी थे और उनमें अधिक गरीब हुए हैं, जिनमें हम गरीब थे? या वाकई हमने दिशा पलटी है और उन क्षेत्रों में धनी हुए हैं, जिनमें हम गरीब थे और (समाजवादी दोमुंहपन की महान परम्परा में) उन क्षेत्रों में गरीब हुए हैं, जिनमें हम समृद्ध थे?


किसी राष्ट्र के लिए बैलेंस शीट लिखना कठिन होता है, क्योंकि सारी सत्ताएं आंकड़ों में हेरा-फेरी करती हैं। मीडिया इतना अात्ममुग्ध है कि उसके पास तथ्यों की पड़ताल करने का वक्त नहीं है। हर कोई दूसरे को डेडलाइन में मात देना चाहता है। इससे हमेशा अचूक होना असंभव हो जाता है। ज्यादातर मीडिया वालों को खुद की रिसर्च करने की बजाय घालमेल वाले आंकड़े और धूर्ततापूर्ण न्यूज़प्लांट ही सुविधाजनक लगते हैं। इससे भी कम तो वे लोग हैं, जो सरकारी मशीनरी द्वारा प्रचारित तथ्यों को झूठा बताने की हिम्मत दिखा सकें। कोई आश्चर्य नहीं कि सही को गलत से अलग, तथ्य को कल्पना, सत्य को उपहास से अलग करना कठिन होता जा रहा है। ये अधकचरी बातें कई बार इतनी अच्छी होती हैं कि कई बार जो जानते हैं कि ये धोखेबाजी से ज्यादा कुछ नहीं है, उनके सहित हर कोई उन पर भरोसा कर लेता है।


आइए, हम वास्तविक खामियों की ओर देखें। यही कारण है कि मेरे जैसे पुरानी शैली के पत्रकार विलुप्त होने की कगार पर हैं। गरीबी का प्रतिशत थोड़ा गिरा होगा लेकिन, गरीब लोगों की संख्या अधिक नहीं भी हुई हो तो उतनी ही ऊंची है, जितनी हमेशा से रही है। अर्थात यह तब होगा जब आप गरीबी को दैनिक मजदूरी से जोड़ने की बजाय न्यूनतम गुणवत्तापूर्ण ज़िंदगी जीने की भी अक्षमता से जोड़ें। उस तरह से आपको अधिक अचूक आंकड़े मिल सकते हैं। स्कूलों की संख्या कागज पर तो बढ़ सकती है लेकिन, जिस गुणवत्ता की शिक्षा वहां दी जाती है वह संदेहास्पद है, जब सरकारी आदेश से ही हल्दीघाटी की लड़ाई का नतीजा उसी राज्य में बदल दिया जाता है, जहां वह लड़ाई हुई थी।


यदि आप शिक्षा को इस तरह परिभाषित करें कि जो आपकी ज़िंदगी को बढ़ा देती है और आपको अच्छी आजीविका के साधन तोहफे में देती है तो कहना होगा कि हमेशा ऐसा नहीं हो रहा है। कोचिंग क्लासेस बढ़ गई होंगी पर स्कूल छोड़ने वाले बढ़ते जा रहे हैं, क्योंकि बच्चों को पता चलता है कि वे जो पढ़ रहे हैं उसका वास्तविक दुनिया से कोई संबंध नहीं है। इसे देखिए: राजस्थान विधानसभा सचिवालय में चपरासी के जॉब के लिए जिन 12,453 लोगों का इंटरव्यू लिया गया उनमें 129 इंजीनियर, 23 वकील, एक चार्टर्ड अकाउंटेंट और 393 पोस्ट ग्रेजुएट थे। सच यह है कि डिग्री लेने के बाद भी जॉब पाना आसान नहीं है। वे जॉब नहीं, जिन्हें पाने की उन्हें हसरत होती है। इसलिए वे जो मिलता है वह ले लेते हैं। दूसरी तरफ नौकरी देने वालों से पूछिए कि रिक्त पद भरने लायक योग्य व्यक्ति पाना कितना कठिन है। दोनों छोर पर हताशा है। और बेरोजगारों की संख्या बढ़ती जा रही है। जिसके बारे में कोई बात नहीं करता वह कमरे में मौजूद हाथी है अंडर-एम्प्लायमेंट यानी पर्याप्त रोजगार न मिलना। यह बेरोजगारी के आंकड़ों में कभी नहीं होता।


अपराधी बढ़ रहे हैं। वही हालत हिंसा, आत्महत्या, दिनदहाड़े हत्या के मामलों की है। लेकिन, जो स्थिति को बदतर बनाती है वह है लोगों की अविश्वसनीय सहानुभूतिहीनता। दुर्घटना होती है तो मरते व्यक्ति को अस्पताल ले जाने की बजाय लोग उसके आसपास खड़े होकर सोशल मीडिया पर डालने के लिए वीडियो बनाने लगते हैं। भीड़भरे इलाकों में खून हो जाते हैं और कोई दखल नहीं देता। कानून लागू करने वाली एजेंसियां इतनी सुस्त हैं कि जब वे आती हैं -यदि आए तो- अपराधी के अलावा गवाह भी भाग चुके होते हैं। मामले बरसों बरस चलते रहते हैं और किसी को अहसास नहीं होता कि देरी में न्याय खो जाता है। दुष्कर्म की शिकार से पूछिए। उनसे पूछें जिनके चेहरों पर एसिड फेंक दिया गया। हर कहानी को कानून व उसे लागू करने वालों की उदासीनता ने ध्वस्त कर दिया।


एक वक्त था जब बुरी चीजें दूरदराज के स्थानों पर होती थी। आज बुरी चीजें अच्छे लोगों के साथ कहीं भी, कभी भी हो जाती है और किसी को परवाह नहीं होती। लापरवाही का नया रूप यह है कि सरकार गुनाह के शिकार लोगों को भुगतान कर देती है और अपराध पर परदा डाल देती है। फिर चाहे वह गांव हो जिसे जला दिया गया हो या कोई व्यक्ति खूनी भीड़ के हत्थे चढ़ गया हो, इलाज एक ही है : टीवी कैमरे के सामने परिजनों का मुंह बंद रखने के लिए चेक ( या चेक का वादा)।


अब दूसरा पक्ष देखिए। अर्थव्यवस्था चुस्त-दुरुस्त दिखती है। भ्रष्टाचार उस तरह बार-बार सुर्खिया नहीं बना रहा है जैसे वह बनाता था। क्या यह भ्रष्टाचार कम होने की वजह से है या कोई इसकी अब परवाह ही नहीं करता? क्या यह विषय कालबाह्य हो गया है? अभी फैसला होना बाकी है कि नोटबंदी और जीएसटी से वादे के मुताबिक फायदे हुए हैं या नहीं। स्पष्ट है कि इससे नुकसान तो बहुत हुआ है लेकिन, इसकी सरकार ने परवाह भी कब की है? वे गरीबों को खुश रखने के लिए परपीड़ा-सुख पर निर्भर हैं। यह समाजवादी प्रणाली का बायप्रोडक्ट है। इस बीच शेयर बाजार सारे रिकॉर्ड तोड़ रहा है। इसका मतलब है मोटेतौर पर कॉर्पोरेट इंडिया खुश है। क्या वाकई?


कहावत है कि किसी साफ दिन कोई व्यक्ति हमेशा के लिए देख सकता है। लेकिन, झूठ, फेक न्यूज और बकवास से भरे इन दिनों में ऐसी स्पष्टता देने वाले दिन हमेशा नहीं आते। मिथेन का आवरण इतना मोटा, इतना दमनकारी है कि हम इसमें से देख नहीं सकते कि हम जा कहां रहे हैं। शायद यह वक्त रुककर सोचने व आकलन करने का है और सत्य को चोट पहुंचाने की बजाय उसका सामना करने की कला फिर सीखने का वक्त है। चूंकि राजनेता ऐसा अफोर्ड नहीं कर सकते, मीडिया को पहल करनी होगी।(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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प्रीतीश नंदी वरिष्ठ पत्रकार एवं फिल्म निर्माताप्रीतीश नंदी वरिष्ठ पत्रकार एवं फिल्म निर्माता
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