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अयोध्या विवाद में भावनाओं को नहीं मानने का उचित तर्क

मुख्य न्यायाधीश को यह भी कहना पड़ा कि वे इस मामले की नजाकत को समझते हैं।

Dainik Bhaskar

Feb 10, 2018, 07:44 AM IST
Proper reasoning of not accepting emotions in the Ayodhya dispute

अयोध्या मामले पर भावनाओं के दबाव को मानने से इनकार करके सुप्रीम कोर्ट ने उचित ही किया है। अदालत की यह टिप्पणी संविधानवाद से निकली है कि अयोध्या विवाद मूलतः एक भूमि विवाद है और सुनवाई भावनाओं की नहीं इलाहाबाद हाई कोर्ट के 2010 के फैसले के विरुद्ध की गई अपील की हो रही है। करोड़ों हिंदुओं की भावनाओं का सवाल उठाकर कई और पक्षकार शामिल होना चाहते थे, जिनकी दलीलों को मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्र की तीन सदस्यीय पीठ ने अनसुना कर दिया। अयोध्या भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था का सबसे पेचीदा विवाद है और इसमें अदालती दलीलों, अपीलों और सबूतों के साथ राजनीतिक भावनाओं के जुड़ाव को खारिज करना कठिन है। इसीलिए मुख्य न्यायाधीश को यह भी कहना पड़ा कि वे इस मामले की नजाकत को समझते हैं।

यह भी एक कारण है कि जिसके नाते सुप्रीम कोर्ट इसकी लगातार सुनवाई करना चाहता है। हालांकि संवैधानिक पीठ की तरफ से किसी एक मामले पर इतना ध्यान देने से जरूरतमंदों के दूसरे मामले प्रभावित हो रहे हैं और यह दलील अल्पसंख्यक समुदाय की ओर से पैरवी कर रहे वकील राजीव धवन ने न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत भी की है। इस मसले में सुप्रीम कोर्ट फूंक-फूंक कर कदम रख रहा है। दिसंबर 1992 में भी आरोप लगे थे कि अगर अदालत समय से फैसला दे देती तो शायद वैसी दुर्भाग्यपूर्ण घटना न होती। सही है कि न्यायालय में लंबे समय से जन्मभूमि का विवाद लटका हुआ था लेकिन अगर सुनवाई अदालत अपना फैसला बहुसंख्यक समुदाय के विरुद्ध सुना देती तो क्या वह उसे मानने को तैयार हो जाता?

यही प्रश्न आज भी है जिसका दबाव सुप्रीम कोर्ट पर काम कर रहा होगा। न्यायालय अगर धर्मग्रंथों के आधार पर यह फैसला देने का प्रयास करता है कि भगवान राम का जन्म वहीं हुआ था तो विधिशास्त्र की अवहेलना होगी और अगर वह इस दावे से इनकार करता है तो बहुसंख्यक समाज और उसकी राजनीति से सीधे टकराव लेना होगा। वैसे ही जल्दी में निर्णय देने पर न्याय को दफनाए जाने का तो देर से देने पर न्याय से वंचित करने की मशहूर उक्ति चरितार्थ होती दिख रही है। अदालती निर्णय से राजनीतिक दलों की लाभ-हानि तो होगी लेकिन उससे भी बड़ा सवाल भारतीय लोकतंत्र और उसकी संस्थाओं की लाज का है।

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