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अब संघर्ष के परिवारवाद की राह पर राहुल गांधी

आज़ादी की लड़ाई लड़ी और संविधानसम्मत भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला रखी लेकिन, आज वह इतिहास की गर्त में जाने की कगार पर है

Danik Bhaskar | Dec 13, 2017, 06:14 AM IST

नेहरू-गांधी परिवार की पांचवीं पीढ़ी के वारिस राहुल गांधी का कांग्रेस पार्टी अध्यक्ष चुना जाना परिवारवाद तो है लेकिन, यह सत्ता नहीं संघर्ष का परिवारवाद है। राहुल को अपने पुरखों की लाज ही नहीं बचानी है बल्कि 132 साल पुरानी उस पार्टी को भी पुनर्जीवित करना है, जिसने इस देश की आज़ादी की लड़ाई लड़ी और संविधानसम्मत भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला रखी लेकिन, आज वह इतिहास की गर्त में जाने की कगार पर है।

कांग्रेस और उसके नेतृत्व पर चार बड़े आरोप हैं। पार्टी में आतंरिक लोकतंत्र खत्म कर परिवारवाद को बढ़ावा देना, दलितों-पिछड़ों की उपेक्षा करना, भारत विभाजन को न रोक पाना और देश का अपेक्षित व भ्रष्टाचारविहीन विकास न कर पाना। कांग्रेस और उसका नेतृत्व अब तक जनता को यह समझाने में कामयाब हो गया था कि विभाजन ऐतिहासिक परिस्थितियों और अंतरराष्ट्रीय साजिश का परिणाम था और विकास की धीमी रफ्तार का जिम्मा पार्टी और नेतृत्व के साथ सरकार के लोकतांत्रिक ढांचे पर भी है, क्योंकि लोकतंत्र में विकास धीमा होता है।

अब यह कहानी तार-तार हो चुकी है। जनअसंतोष चरम पर है और पार्टी की अभिजात्यता के कारण दलित और पिछड़ी जातियों ने उससे किनारा कर लिया। राहुल की असली चुनौती उस ऐतिहासिक आख्यान को नए सिरे से उठाने की है जो बताए कि विभाजन की गुनहगार सिर्फ कांग्रेस ही नहीं है। इसी में भारत-पाकिस्तान की कटुता का समाधान भी है और देश की साम्प्रदायिक समस्या का भी। कांग्रेस की तीसरी चुनौती विकास का नया विमर्श खड़ा करने की है। वह समाजवाद, मिश्रित अर्थव्यवस्था और वैश्वीकरण तीनों पद्धतियों की प्रणेता रही है। कांग्रेस को नीतिगत स्तर पर इस उलझन से निकलने का नया रास्ता बनाना है ताकि समता आधारित भ्रष्टाचार विहीन विकास हो सके। चौथी चुनौती मंडल और आम्बेडकरवादी ताकतों से संवाद करने की है। कांग्रेस को अगर अपने से दूर छिटकी दलित, पिछड़ी और आदिवासी जातियों को साथ लाना है तो उसके नेताओं से अंग्रेजी में नहीं जनता की जुबान में बात करनी होगी और उनकी राजनीतिक भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी। आखिर में राहुल गांधी को सिर्फ मीडिया और भीड़ के लिए ही नहीं पार्टी के बुजुर्ग नेताओं से लेकर सामान्य कार्यकर्ता तक के लिए अपने को उपलब्ध रखना होगा, इसी से पार्टी में प्राण फूंके जा सकेंगे।