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उपचुनाव के नतीजे से अंकुरित होता विपक्षी एकता का बीज

कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने 17 दलों की बैठक की और राष्ट्रीय हित में मतभेद भुलाने की अपील की।

Dainik Bhaskar

Feb 03, 2018, 07:13 AM IST
Rajasthan and West Bengal election

राजस्थान और पश्चिम बंगाल में तीन लोकसभा और दो विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव के नतीजों ने एक राज्य में भाजपा को करारा झटका तो दूसरे में उम्मीद बंधाते हुए विपक्षी एकता का बीज रोप दिया है, हालांकि अभी उसके अंकुरित होने में कई तत्वों की भूमिका रहेगी। ये परिणाम गुजरात चुनाव में अधखिली कांग्रेस के लिए खाद-पानी का काम करेंगे और कांग्रेस और माकपा के रिश्तों के लिए नया माहौल प्रदान करेंगे। गुरुवार को ही कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने 17 दलों की बैठक की और राष्ट्रीय हित में मतभेद भुलाने की अपील की। पश्चिम बंगाल के उपचुनाव के परिणाम तो प्रत्याशित ही रहे हैं और उलूबेरिया की लोकसभा और नोवापाड़ा की विधानसभा सीट तृणमूल कांग्रेस के ही खाते में गई है।

तृणमूल कांग्रेस ने उलूबेरिया में विजय भी चार लाख से ज्यादा वोटों से हासिल की है। विडंबना है कि उस चुनाव में दूसरे स्थान पर रहकर अच्छा वोट पाने वाली भाजपा ज्यादा खुश है, क्योंकि माकपा और कांग्रेस दोनों पार्टियां उससे पीछे चली गई हैं। इन परिणामों ने माकपा को संदेश दिया है कि वह केंद्रीय समिति के कांग्रेस से गठबंधन न करने के फैसले पर विचार करे। भाजपा को करारा झटका और कांग्रेस को सर्वाधिक ताकत मिली है राजस्थान के अजमेर, अलवर की लोकसभा और मंडलगढ़ की विधानसभा सीट पर पार्टी की जीत से। इन सभी सीटों पर अच्छे अंतर के साथ भाजपा को पराजित करके कांग्रेस ने युवा प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट की क्षमताओं को प्रमाणित तो किया ही जयपुर से दिल्ली तक पार्टी के भीतर उत्साह का संचार किया है।

2014 के लोकसभा चुनाव में इस राज्य की सभी 25 सीटों पर भाजपा ने कब्जा जमाया था और विधानसभा में कांग्रेस को महज 21 सीटें हासिल हुई थीं। ऐसे में सत्ता-विरोध का संदेश देने वाला राजस्थान उपचुनाव भाजपा के लिए बड़ा सिरदर्द पैदा करेगा। अब अगर पार्टी साल के अंत में होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए नेतृत्व परिवर्तन करती है तो वसुंधरा की बगावत का खतरा है और अगर नहीं करती है तो वसुंधरा चाह कर भी राजपूतों, किसानों, कर्मचारियों और समाज के अल्पसंख्यक तबके का असंतोष दूर नहीं कर सकतीं। ये उपचुनाव इस बात के संकेत हैं कि भाजपा अपने मजबूत किले में कमजोर हो रही है लेकिन, दूसरे किलों में सेंध लगा रही है।

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