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कांग्रेस को ऑक्सीजन मिली, वापसी अभी दूर है

पार्टी को भाजपा के मुकाबले कृषि, उद्योग रोजगार में विकल्प देने के साथ मजबूत संगठन बनाना होगा।

Dainik Bhaskar

Dec 23, 2017, 03:50 AM IST
Rajdeep Sardesai column on congress party

फिल्मों के जुनूनी देश में चुनावी जीत भी प्राय: ‘फिल्मी’ ढंग से बताई जाती है। इसलिए गुजरात में भाजपा की कम अंतर वाली जीत पर ‘जो जीता वह सिकंदर’ के मेरे घिसे-पिटे जुमले के जवाब में कांग्रेस के एक नेता ने शाहरुख खान की हिट फिल्म ‘बाजीगर’ का डायलाग दोहराया, ‘कभी-कभी जीतने के लिए कुछ हारना भी पड़ता है और हारकर जीतने वाले को बाजीगर कहते हैं!’ तो क्या नरेंद्र मोदी अमित शाह की जोड़ी गुजरात 2017 के ‘सिकंदर’ हैं या राहुल गांधी ‘बाजीगर’ हैं?
गुजरात जैसे कड़े मुकाबले वाले चुनाव में इस प्रश्न का उत्तर इस पर निर्भर है कि राजनीतिक सुविधा के लिए आप कौन-से आंकड़े चुनते हैं। भाजपा दावा कर सकती है कि उसने गुजरात में लगातार छठी बार उल्लेखनीय जीत हासिल की है और इसका वोट प्रतिशत 2012 के चुनाव की तुलना में दो प्रतिशत बढ़कर 49 फीसदी से थोड़ा अधिक रहा। कांग्रेस ध्यान दिला सकती है कि भाजपा की सीटों का आंकड़ा घटकर दो अंकों में रह गया है और 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान वोट प्रतिशत में 27 फीसदी का जबर्दस्त अंतर अब सिर्फ 7 फीसदी रह गया है। 29 विधानसभा क्षेत्रों में जीत का अंतर 3000 हजार वोटों से नीचे जाने का मतलब है, यह चुनाव किसी भी दिशा में जा सकता था। किंतु आंकड़े कभी उस बड़े राजनीति परिदृश्य का पूरा चित्र प्रस्तुत नहीं करेंगे जो गुजरात चुनाव के बाद उभरा है। चुनाव नतीजे आंकड़ों की बात है,जबकि राजनीतिक विमर्श आमतौर पर रसायनशास्त्र के बारे में है। और यहीं पर ऐसा कुछ है जिस पर राहुल गांधी दावा कर सकते हैं। 2017 के पूर्वार्ध में जब भाजपा ने उत्तर प्रदेश में सफाया किया और गोवा मणिपुर कांग्रेस से ले लिए तो इस बारे में संदेह नहीं था कि मोदी-शाह जोड़ी को रोका नहीं जा सकता। जब भाजपा अध्यक्ष ने 182 सदस्यीय गुजरात विधानसभा में ‘मिशन 150’ की शेखी बघारी थी तो शायद ही किसी को संदेह रहा हो। क्योंकि यदि भाजपा देश के सर्वाधिक आबादी वाली जटिल राज्य में तीन-चौथाई जीत हासिल कर सकती है तो निश्चित ही देश के दो सबसे शक्तिशाली लोगों का गृह प्रदेश तो साबरमती रिवर फ्रंट की तफरीह जैसा है। आखिरकार भाजपा के हांफते हुए फिनिशिंग लाइन पर पहुंचना इस बात का सबूत है कि भारतीय राजनीति की भूल-भुलैया में किसी चीज को मानकर नहीं चला जा सकता।


इसके विपरीत राहुल गांधी और कांग्रेस उत्तर प्रदेश में हार के बाद राजनीतिक रूप से पूरी तरह खत्म हो गए थे। राहुल को अ-गंभीर राजनेता के रूप में देखा गया। उनकी सामाजिक छवि वंशवादी ‘पप्पु’ की बन गई और पार्टी को तो आईसीयू रोगी बताकर खारिज कर दिया गया। गुजरात में एक दर्जन से ज्यादा विधायकों ने पाला बदल लिया। राज्य में पार्टी का ‘चेहरा’ शंकरसिंह वाघेला छोड़कर चले गए। सोनिया गांधी के निकटवर्ती अहमद पटेल का राज्यसभा चुनाव जीतने के लिए कांग्रेस विधायकों को बेंगलुरू रिज़ॉर्ट में ले जाना पड़ा। ज्यादातर राजनीतिक पर्यवेक्षकों को अपेक्षा थी कि कांग्रेस एक बार फिर नाकाम रहेगी, क्योंकि नाकामी भी संक्रामक हो सकती है। इसके बाद भी यदि भाजपा ने गुजरात के मतदाताओं को अपने पक्ष में मानकर चलने की गलती की तो कांग्रेस भी यह मानने की उतनी मूर्खता कर बैठी की ग्रामीण गुजरात खासतौर पर सौराष्ट्र में मजबूती यह बताती है कि वह वापसी की राह पर है। गुजरात ने पार्टी को कुछ ताजा ऑक्सीजन दी है लेकिन, रोगी अब भी नाजुक स्थिति में है। गुजरात में गांधी को 22 साल के एकत्रित कर्ज से निपटना था। ये वे साल थे जब कांग्रेस ने भाजपा को राजनीति में एकाधिकार जमाने का मौका दे दिया था। राहुल के पास इस संकट का जवाब था स्थानीय जातियों के लोकप्रिय नेताओं को अपनाना, पूरी ऊर्जा के साथ चुनावी अभियान में खुद को झोंक देना। यह बहुत चतुर रणनीति थी। जिसने लगभग काम दिखा ही दिया था यदि यह स्वतंत्र भारत के इतिहास में सबसे अजेय चुनावी मशीन के खिलाफ नहीं होती, जिसका नेतृत्व ऐसा करिश्माई नेता कर रहा था जिसका अब भी लोगों से भावनात्मक जुड़ाव है।


लेकिन कांग्रेस की गहराई में जड़े जमाने वाली समस्याएं मोदी बनाम राहुल वाली नेतृत्व की लड़ाई से आगे जाती हैं। क्या कांग्रेस कोई ऐसा विज़न दे सकती है, जो शहरी भारत (ध्यान रहे कि भाजपा ने शहरी गुजरात में अच्छे खासे अंतर से जीत हासिल की है) की बढ़ती आकांक्षाओं को आकर्षित कर सके? क्या कांग्रेस अल्पसंख्यक समर्थक की छाप को टालने के लिए मंदिर जाने की कवायद से आगे जाकर धर्मनिरपेक्षता पर अपने रुख को पुनर्परिभाषित करेगी? क्या कांग्रेस किसानों को यह उम्मीद दे सकती है वह संरचनागत संकट से भारतीय कृषि को उबारेगी अथवा छोटे मध्यम उद्योगों को किसी अार्थिक योजना की पेशकश करेगी कि जिससे वे पुनर्जीवित होकर नौकरियां पैदा कर सकें? क्या ऐसी कोई ‘राष्ट्रीय भावना’ है जिसकी पेशकश कांग्रेस ‘भारत प्रथम’ के आलाप पर भाजपा के एकाधिकार के बदले कर सके? और क्या कांग्रेस के पास पर्याप्त प्रतिबद्ध कार्यकर्ता हैं कि वह भाजपा के पन्ना प्रमुखों और कार्यकर्ताओं का जमीन पर मुकाबला कर सके?
गुजरात में कांग्रेस सारे प्रश्नों से बच गई, क्योंकि लंबे शासन के बाद भाजपा को सत्ताविरोधी रुख से निपटना पड़ा। लेकिन, यह यदि खुद को भाजपा के राष्ट्रीय विकल्प के रूप में पेश करना चाहती है तो कांग्रेस को पर्याप्त संख्या में मतदाताओं को यह यकीन दिलाना होगा कि राहुल के नेतृत्व में पार्टी का प्रतिष्ठा खो चुकी पुरानी भ्रष्ट काहिल व्यवस्था से कोई संबंध नहीं है। वह तो वास्तव में अधिक उदार समावेशी भारत बनाना चाहती है, जो भय की बजाय उम्मीद की राजनीति पर आधारित होगा और यह कि उसके पास भाजपा की तुलना में नौकरियों आर्थिक वृद्धि की बेहतर योजना है। गुजरात ने कांग्रेस के लिए अवसरों की खिड़की खोली है लेकिन, यदि यह इसे बनाए नहीं रख पाती तो यह मामला ‘दिल्ली दुर अस्त’ का बना रहेगा।


पुनश्च: चूंकि हमने कॉलम हिंदी फिल्म के डायलॉग से शुरू किया तो शायद एेसा अंत भी बेहतर होगा। गुजरात में मतगणता के एक दिन पहले एक हिंदी न्यूज एंकर ने मुझसे पूछा,‘ क्या गुजरात में मोदी और भाजपा को हराना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है।’ शाहरुख खान की ‘डॉन’ से प्रेरित इस प्रश्न का आशय था कि भाजपा गुजरात में अपराजेय है। जैसा कि गुजरात के वोटर ने दिखाया है अजेय होना मिथक है जिससे भ्रांति और अहंकार पैदा होता है। (येलेखक के अपने विचार हैं।)

राजदीप सरदेसाई
वरिष्ठपत्रकार
rajdeepsardesai52@gmail.com

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