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देश की राजनीति में बदलाव और संघर्ष का दौर

दलितों और बहुजनों के हितों की अनदेखी किए बगैर नए प्रभावी गुटों को समायोजित करने की चुनौती

rajdeep sardesai | Last Modified - Jan 11, 2018, 07:21 AM IST

  • देश की राजनीति में बदलाव और संघर्ष का दौर
    राजदीप सरदेसाई, वरिष्ठ पत्रकार

    जातिगत प्रसंग हमारे कई स्तरों वाले समाज की भीतरी खामियां उजागर करते हैं और आसानी से विवाद भड़का सकते हैं। हाल ही में जब भाजपा के हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशी के रूप में जयराम ठाकुर को चुना गया तो मैंने ट्वीट किया कि कैसे भाजपा के 11 मुख्यमंत्रियों (पूर्वोत्तर छोड़कर) में से नौ ऊंची जाति के हैं। अनुमान के मुताबिक विरोध का तूफान आ गया। चूंकि ट्वीटर पर सार्थक बहस के लिए पर्याप्त गुंजाइश नहीं होती, इसलिए मैंने ट्वीट डिलीट कर दिए। पांच बार के विधायक और राजगीर व किसान के बेटे ठाकुर हो सकता है उचित चयन हो लेकिन, उन्हें हिमाचल के ‘ठाकुर वाद’ के प्रभुत्व का फायदा भी मिला, जहां सत्तारूढ़ दल के करीब आधे विधायक इस समुदाय के हैं। मेरा मूल विचार यही है कि स्वतंत्रता के 70 साल बाद अधिक ‘समावेशी’ राजनीति पर जोर देने के बाद हम अब भी ऊंची जाति के नेतृत्व वाले पोलिटी हैं।


    जब नरेन्द्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बने तो इसे नए युग की शुरुआत का पल माना गया,जो वाकई सत्ता के पिरामिड में असली बदलाव लाएगा। तब इस पद पर ऊंची जातियों का प्रभुत्व रहा है (अपवाद कर्नाटक के वोक्कालिंगा तबके के देवेगौड़ा थे)। मोदी ने बहुत चतुराई से अपनी ओबीसी पहचान को 2014 के चुनाव अभियान में इस्तेमाल किया खासतौर पर जाति की राजनीति वाले उत्तरी भारत में। मणिशंकर अय्यर की तिरस्कारपूर्व की गई ‘चायवाला’ टिप्पणी से मोदी को खुद को ऐसे व्यक्ति के रूप में पेश करने का मौका मिल गया, जो निचली जाति व कम आय वर्ग से ब्राह्मणवादी श्रेष्ठि वर्ग को चुनौती देने के लिए ऊपर उठा है।


    तीन साल बाद वह श्रेष्ठिवर्ग सत्ता में बना हुअा है। केंद्रीय मंत्रिमंडल में ही वरिष्ठ मंत्रियों को देखें। सर्वशक्तिमान सुरक्षा मामलों की कैबिनेट समिति में ब्राह्मणों व ठाकुरों का एकाधिकार है। वरिष्ठ स्तरीय नौकरशाही में भी ऊंची जातियों का प्रभुत्व है। विपक्ष का नेतृत्व जनेऊधारी हिंदू कर रहा है, जैसा कि हमें गुजरात चुनाव में कांग्रेस ने याद दिलाया। सच है कि राष्ट्रपति दलित हैं लेकिन, क्या किसी को गंभीरता से यकीन है कि रामनाथ कोविंद की नियुक्ति राजनीतिक प्रतीकवाद से बढ़कर कुछ है? राष्ट्रपति भवन में उनके कार्यकाल से दलितों का अधिक सशक्तिकरण हो जाएगा। ठीक वैसे जैसे प्रतिभा पाटिल के राष्ट्रपति रहने से महिलाओं के उत्थान को शायद ही कोई बढ़ावा मिला।

    सच यही है कि भारतीय राजनीति के ‘बहुजनीकरण’ के प्रयोग में जोखिम रहा है और अब इसे अलग-अलग मोर्चों पर चुनौती दी जा रही है। दक्षिण भारत में द्रविड़ दलों का उदय और महाराष्ट्र में दलित-बहुजन उभार के पहले एक सुधारवादी सामाजिक क्रांति हुई थी, जिसने तुलनात्मक रूप से सुगम सत्ता हस्तांतरण सुनिश्चित किया। इसके विपरीत उत्तर भारत में 1980 के उत्तरार्ध में मंडल क्रांति ने चुनावी राजनीति में दलित-ओबीसी का अधिक प्रतिनिधित्व पक्का किया लेकिन, इसके साथ एक भीषण उच्चवर्गीय प्रतिक्रिया भी देखी। आंकड़ें अब बताते हैं कि संसद में ओबीसी का प्रतिनिधित्व पिछले दशक में मंडल पूर्व के करीब 20% तक गिर गया है, जबकि ऊंची जाति का आंकड़ा तेजी से 44 फीसदी तक पहुंच गया है। जिस तरह से हिंदुत्व की लहर ने 2017 में उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी की जाति आधारित संकुचित वफादारी को दरकिनार कर दिया वह भविष्य का संकेत हो सकता है। चुनाव के दौरान गैर-यादव ओबीसी और गैर-दलित जाटवों को लुभाने के प्रयासों के बाद भी भाजपा ने सरकार को नेतृत्व देने के लिए भगवाधारी उच्च वर्गीय ठाकुर को हिंदुत्व का शुभंकर चुना। उत्तर प्रदेश के यादव, बसपा की मायावती और बिहार के लालू व उनके बेटों पर भ्रष्ट, अपने हित में लगीं, पारिवारिक पार्टियां होने की छाप लगने के बाद भाजपा ने मोहभंग से गुजरे मंडल के जमीनी तबके को व्यापक हिंदू धर्म के छाते तले वर्ग व जाति से अलग गठबंधन में समायोजित करने की कोशिश की। कांग्रेस भी गुजरात के जिग्नेश मेवाणी जैसे आक्रामक व अपनी बात रखने में माहिर नई पीढ़ी के दलित-बहुजन नेताओं को साथ लेकर प्रतिद्वंद्वी गठजोड़ बनाने में लगी है, जबकि कर्नाटक में इसने पिछड़े वर्ग के मजबूत नेता सिद्धारमैया के नेतृत्व में लड़ने का फैसला किया है।


    प्रभावी जातिगत हितों का प्राय: शेष वर्ग से टकराव होने के कारण न तो समायोजन और न गठजोड़ हर मामले में सुगम होता है। हाल ही में महाराष्ट्र में एक लड़ाई में पेशवाओं पर जीत की वर्षगांठ मनाने को लेकर ब्राह्मणवादी ताकतों और दलित गुटों में हुआ संघर्ष बताता है कि कैसे पुरानी शत्रुताएं नए ढंग से अभिव्यक्त हो रही हैं। बेशक, भाजपा में ब्राह्मण देवेन्द्र फडणवीस के नेतृत्व वाली सरकार होने से दलित प्रदर्शनकारियों को यह कहने का मौका मिल गया कि सरकार पुणे के पास एक गांव में दलितों पर हमले करने वालों पर कड़ी कार्रवाई करने की इच्छुक नहीं है। यह ऊंची जाति को लेकर पक्षपात का नतीजा है (वास्तव में संघर्ष मराठा बनाम दलित था। इसमें असामाजिक तत्व भी शामिल थे, यह ऐसा तथ्य है जिसे रेखांकित करने की जरूरत है)।


    इसके अलावा बढ़ते ग्रामीण संकट और आर्थिक असमानता के कारण परम्परागत भू-स्वामी वर्गों से निकले प्रभावशाली कृषक जातिगत विरोध प्रदर्शन भी हुए हैं। गुजरात ने हाल के चुनाव में 23 वर्षीय हार्दिक पटेल के मातहत पाटीदार नेतृत्व का उभार देखा। नौकरियों व शिक्षा में पटेलों को आरक्षण देने की हार्दिक पटेल की मांग ने युवा पटेलों को आकर्षित किया है। महाराष्ट्र में प्रभावशील मराठा व हरियाणा में जाट भी आरक्षण में हिस्से के लिए सड़कों पर उतर चुके हैं। व्यापक दलित-बहुजन हितों की अनदेखी किए बगैर इन शक्तिशाली गुटों को समायोजित करना राजनीतिक ताकतों के लिए बड़ी चुनौती है, जो मंडल-बाद की राजनीति का भविष्य तय कर सकती है। इस बीच हमें परिवर्तन व संघर्ष के दौर की अपेक्षा है, जिसमें जाति राजनीतिक नियंत्रण की लड़ाई में प्रमुख भूमिका निभाती रहेगी।


    पुनश्च : जो राजनीति में जातिगत समीकरणों से खफा हो जाते हैं उनके लिए अखबारों के वैवाहिकी के विज्ञापनों का विश्लेषण कैसा रहेगा, जिनमें इतने स्पष्ट रूप से सामाजिक पूर्वग्रह जाहिर होते हैं? जहां तक हम पत्रकारों की बात है तो हमें भी अपने भीतर झांककर यह असुविधाजनक प्रश्न पूछना होगा कि कितने दलित, ओबीसी और आदिवासी संपादक भारतीय न्यूजरूम्स
    में हैं?(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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