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टेक्नोलॉजी के जरिये निर्माण अवधि का जोखिम घटाएं

केलकर समिति के अनुसार पीपीपी मॉडल को वापस लाएं

मनीष अग्रवाल | Last Modified - Feb 01, 2018, 07:01 AM IST

  • टेक्नोलॉजी के जरिये निर्माण अवधि का जोखिम घटाएं
    मनीष अग्रवाल पार्टनर एंड लीडर, इन्फ्रास्ट्रक्चर पीडब्ल्यूसी इंडिया

    वैश्विक स्तर पर इन्फ्रास्ट्रक्चर निवेश की सबसे आकर्षक श्रेणी में रहा है। 2016 में वैश्विक स्तर पर 140 अरब डॉलर (8820 अरब रुपए) से अधिक का इन्फ्रास्ट्रक्चर फंड उपलब्ध था। भारत को इसका बड़ा हिस्सा आकर्षित करने में सीमित सफलता ही मिली। कारण था जोखिम व रिटर्न में विसंगति। ऐसा कोई भी कदम जो वित्तीय स्थिति और सुधारे, देश की क्रेडिट रेटिंग सुधरे तो जोखिम का अहसास कम होकर विसंगति घट सकती है।

    2015 के बजट भाषण में वित्त मंत्री ने ऐसे कई कदमों की चर्चा की थी। इसमें जोखिम में संतुलित भागीदारी के साथ पीपीपी मॉडल को नया रूप देने, प्रोजेक्ट की प्लग एंड प्ले तैयारी, विवाद निराकरण प्रक्रिया में सुधार, नियामक सुधार तथा रेलवे व एयरपोर्ट जैसे सेक्टर में निजी निवेश जैसे कदम शामिल थे। मैं चार बिंदुओं पर तरक्की का सार पेश करता हूं, जिनमें उक्त कदम भी शामिल हैं।


    एक, सरकार ने बुनियादी ढांचे पर खर्च बढ़ाकर निर्माण चक्र सफलतापूर्वक शुरू कर दिया है। यही इस बजट की भी थीम रहेगी पर संभव है इसके लिए सोशल सेक्टर में खर्च और वित्तीय घाटे में समझौता किया जाए। मध्यम अवधि में वित्तीय अनुशासन का क्रेडिट रेटिंग पर और इसलिए विदेशी निवेश की लागत पर असर महत्वपूर्ण हो सकता है।


    दो, दिवालिया कानून के माध्यम से बुनियादी ढांचे संबंधी प्रोजेक्ट में वित्तीय दबाव पर ध्यान देने की प्रक्रिया ने कुछ तरक्की की है। शायद बजट में बुनियादी ढांचे के प्रोजेक्ट को तेजी देने के लिए कोई विशेष पहल नज़र आए। जब निर्माणाधीन प्रोजेक्ट पूरे होंगे (जमीन तथा मंजूरी के मुद्‌दों पर सरकारी प्रयासों से) तो उनमें से कुछ के लिए संचालन अवधि के दौरान कर्ज भुगतान में आमदनी कम पड़ सकती है। इसमें प्रक्रियागत समाधान की उम्मीद भावी पीपीपी प्रोजेक्ट में बैंकों की वापसी करने में मददगार होगी।


    तीन,भावी पीपीपी प्रोजेक्ट की जोखिम को संतुलित करने के लिए हायब्रिड एन्यूइटी मॉडल,एचएएम (निश्चित अंतराल पर आय का मॉडल) से रोड सेक्टर में अच्छी तरक्की की गई है। भीतरी जलमार्गों के लिए सेंट्रल रोड फंड का एक हिस्सा अलग रखने से अब यह सेक्टर एचएएम के जरिये निजी डेवलपरों को आकर्षित कर सकेगा। रेलवे और एयरपोर्ट में निजी निवेश के ज्यादा अवसर नहीं है लेकिन, दीर्घावधि के निवेशक दोनों सेक्टरों में बहुत रुचि दिखा रहे हैं। रोड में टोल की तरह इन सेक्टरों में मौजूदा नकदी प्रवाह का फायदा निवेशकों को आकर्षित करने में लिया जा सकता है। स्मार्ट सिटी प्रोग्राम और किफायती आवास की परियोजनाओं में इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपरों को आकर्षित करने के लिए इनोवेटिव एप्रोच की जरूरत है। आखिर में, बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में डिजिटल टेक्नोलॉजी के लिए बड़े कदम की जरूरत है। ई-टोलिंग और सार्वजनिक परिवहन के लिए एकीकृत टिकट प्रणाली में कुछ प्रगति दिख रही है लेकिन, प्रोजेक्ट कंस्ट्रक्शन में महत्वपूर्ण संभावनाओं का दोहन होना है। निर्माण की लागत, समय और गुणवत्ता में सुधार के अलावा डिजिटल टेक्नोलॉजी विवाद में उल्लेखनीय कमी ला सकती है और इस तरह निर्माण अवधि से जुड़ा जोखिम कम होगा। जहां ये (और अन्य) पूरी तरह बजट के मुद्‌दे नहीं हैं, पर बजट का इस्तेमाल बड़ी नीतिगत घोषणाओं के लिए होता है इसलिए यहां उल्लेखित मुद्‌दों को प्रभावित करने वाली पहल इस सेक्टर पर सकारात्मक प्रभाव डालेगी। इस पृष्ठभूमि में बुनियादी ढांचा क्षेत्र की मांग यह है ।


    बुनियादी ढांचा क्षेत्र में वित्तीय कठिनाई से जुड़े मुद्‌दे हल करने में तेजी लाने के लिए प्रणाली। इसमें प्रोजेक्ट और संबंधित प्राधिकरण के बीच विवाद में फंसी बड़ी राशि के मामले भी शामिल होने चाहिए।
    वित्तीय कठिनाई पर गौर करने से द्वितीयक बाजार के लेन-देन में भी तेजी आएगी, जिसमें कई विदेशी पेंशन और बीमा फंड की गहरी रुचि है। नेशलन इनवेस्टमेंट एंड इन्फ्रास्ट्रक्चर फंड द्वितीयक बाजार में उत्प्रेरक की भूमिका निभा सकता है। साथ ही यह निजी निवेश के लिए नए अवसर भी निर्मित कर सकता है। हाईवे प्रोजेक्ट में मंजूरी और रेवेन्यू रिकॉर्ड डिजिटाइजेशन के लिए एकल खिड़की व्यवस्था। प्रोजेक्ट टेंडर जारी करने की तैयारी में इससे सुधार आएगा। यूज़र चार्जेस इकट्‌ठा करने, प्रदर्शन पर निगाह रखने और विवाद न्यूनतम रखने के लिए टेक्नोलॉजी का उपयोग बढ़ाना होगा। केलकर समिति की सिफारिशों के अनुरूप पीपीपी (पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप) को पुनर्जीवित करना तथा नए सेक्टर खोलना। मजबूत काउंटर-पार्टी के साथ एचएएम मॉडल का इस्तेमाल,जहां यूज़र चार्जेस का अनुमान लगाया जा सकता हो वहां मौजूदा नकद प्रवाह का फायदा लेना।

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