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सार्वजनिक क्षेत्र की फार्मा इकाइयां पुनर्जीवित करें

जनेरिक दवाओं की उपलब्धता व गुणवत्ता उसी से तय होगी

Danik Bhaskar | Feb 01, 2018, 07:00 AM IST
मुरलीधरन नायर मुरलीधरन नायर

कुछ माह पूर्व जारी की गई इस सरकार की राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति से सरकार का यह इरादा व्यक्त होता है कि वह 70 फीसदी आबादी की स्वास्थ्य रक्षा जरूरतों के लिए भुगतान करना या सेवाएं मुहैया कराना चाहती है। लेकिन, इसके लिए सरकार का कुल आवंटन स्वास्थ्य पर कुल खर्च का मात्र 25 फीसदी है। इसलिए यह अनिवार्य है कि कुल आवंटन (केंद्र सरकार का हिस्सा) में कम से कम 30 फीसदी वृद्धि तो दिखे। यदि आवंटन नहीं बढ़ा तो मामूली राशि से बड़ा उद्‌देश्य साधना मुश्किल होगा। खासतौर पर हम देखना चाहेंगे कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना (आरएसबीवाई) की राशि 30 हजार रुपए से बढ़ाकर 1 लाख रुपए की जाए और गरीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) की पात्रता के लिए आय सीमा मौजूदा 1 लाख रुपए से बढ़ाकर 2 लाख रुपए की जाए। तभी स्वास्थ्य रक्षा का दायरा बढ़ेगा।


स्वास्थ्य नीति में प्राथमिक देखभाल पर खासतौर पर फोकस है। गैर-संक्रामक रोगों (एनसीडी) यानी जीवनशैली से जुड़े रोगों के बढ़ते बोझ के संदर्भ में यह खासतौर पर बहुत ही महत्वपूर्ण जरूरत है। इस एजेंडे पर सरकार कितना आवंटन करती है इस ओर तथा विशेष रूप से एनसीडी का पता लगाने वाले जांच और प्राथमिक, द्वितीयक और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों के प्रभावी संचालन के लिए दिए जाने वाले धन पर ध्यान रहेगा। स्वास्थ्य रक्षा की दृष्टि से ये अहम क्षेत्र हैं। मैं गंभीरता से चाहता हूं कि बजट में किसी नए अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) की घोषणा न हो। इसकी बजाय मौजूदा आयुर्विज्ञान संस्थानों का अधिकतम संभव उपयोग सुनिश्चित करने में संसाधन लगाए जाएं। इससे देश में मजबूत स्वास्थ्य रक्षा तंत्र होगा।


यदि सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र की फार्मा इकाइयों को पुनर्जीवित करने में निवेश किया तो मुझे खुशी होगी, क्योंकि गुणवत्तापूर्ण जनेरिक दवाइयों की सप्लाई सुनिश्चित करने में उनकी भूमिका निर्णायक होगी। खासतौर पर जन औषधि केंद्रों के माध्यम से। ये केंद्र फार्मा उत्पादों तक लोगों की पहुंच और उसे किफायती बनाने की दिशा में सरकारी पहल के मुख्य माध्यम हैं। बजट के माध्यम से इसे करना होगा। इस प्रयास में गुणवत्ता प्रमुख मुद्‌दा है।


मेडिकल उपकरणों के क्षेत्र में सरकार के मेक इन इंडिया के तहत किए गए प्रयासों में ज्यादा सफलता नहीं मिली है। इस क्षेत्र में निवेश को प्रोत्साहित करने वाले विशेष कदमों की उम्मीद है, क्योंकि इस क्षेत्र में आयात पर अत्यधिक निर्भरता है (विभिन्न श्रेणियों में 50 से 80 फीसदी)।


किसी भी दवा में उपचार करने वाले तत्व यानी एपीआई (एक्टिव फार्मास्यूटिकल इनग्रेडिएंट) की रणनीतिक क्षमता निर्मित करने के लिए सतत प्रयासों की आवश्यकता है, जो इतने बरसों में बुरी तरह आयात पर निर्भर हो गई है। इसमें भी अधिकांश आयात चीन से होता है। यह दीर्घावधि प्रभाव का मामला है और इस पर बहुत पहले ही कदम उठाया जाना चाहिए था। इसलिए उम्मीद है बजट में देश में एपीआई क्षमता निर्मित करने के क्षेत्र में निवेश में तेजी लाने के कदम उठाए जाएंगे।


भारतीय फार्मा उद्योग का भविष्य दो पहलुओं पर निर्णायक रूप से निर्भर है

तकनीकी विशेषताओं वाले नई उत्पाद विकसित करने के लिए इनोवेशन पर फोकस। सिर्फ किफायत नहीं, गुणवत्ता पर फोकस रखना होगा यानी वैश्विक विश्वसनीयता प्राप्त करने के लिए कैपेबिलिटी और कल्चर दोनों चाहिए। कंपनी विशेष की कोई चुनौतियां नहीं हैं पर व्यापक उद्योग के मुद्‌दों पर सरकार का संघन सहयोग वक्त की मांग है। रिसर्च और मुकम्मल क्वालिटी सिस्टम निर्माण की क्षमता में निवेश को प्रोत्साहन देने के लिए इंसेन्टिव (टैक्स ब्रेक, ग्रांट आदि) देना चाहिए। निजी हैल्थकेयर (अस्पताल) की वित्तीय हालत अच्छी नहीं है और रोगी के खर्च वहन करने की क्षमता पर बढ़ते फोकस और बढ़ती लागत के कारण मार्जिन कम हो रहा है। इससे यह खतरा मंडरा रहा है कि हैल्थकेयर में निवेशक आकर्षण खो दें। अपनी सेवाओं की कीमतें तय करते समय निजी क्षेत्र से व्यापक लोक हित को ध्यान में रखने की अपेक्षा को देखते हुए यह अपरिहार्य है कि उसे सरकार से सस्ती पूंजी और पूंजीगत खर्च में शुल्क संबंधी लाभ दिए जाए, क्योंकि अस्पताल अत्यधिक पूंजी और वित्तीय साधनों से चलने वाला व्यवसाय है। उम्मीद है कि बजट में इस ज्वलंत आवश्यकता पर गौर किया जाएगा और उचित समाधान खोजा जाएगा।


अाखिर में उम्मीद है कि फार्मा प्रोडक्ट्स पर जीएसटी घटाकर 5 फीसदी कर दिया जाएगा और कैंसर उपचार संबंधी उत्पादों पर इस कर को पूरी तरह हटा दिया जाएगा ताकि उपचार किफायती हो सके।