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गुजरात में कोई भी जीते, अभी तो हार लोकतंत्र की है

प्रधानमंत्री मोदी को बताना चाहिए कि बहुसंख्यक को अल्पसंख्यक से क्यों डरना चाहिए ?

Danik Bhaskar | Dec 13, 2017, 06:52 AM IST

भारतीय राजनीति में लगातार बेलगाम आचार-विचार से देश की राजनीतिक शुचिता खतरे में है। प्रधानमंत्री के स्तर पर सतही बयानों से देश की जनता हतप्रभ है। यकीनन इस प्रकार की शब्दावली का इस्तेमाल समाज में साम्प्रदायिक विभाजन करने के लिए किया जा रहा है। सवाल है कि गुजरात चुनाव में भाजपा को बाबर और खिलजी की जरूरत क्यों पड़ी? उसे तो व्यापारियों के गढ़ गुजरात में जीएसटी और नोटबंदी के नफे-नुकसान पर स्वस्थ चर्चा करनी चाहिए थी लेकिन, यह काम कांग्रेस के नेता राहुल गांधी कर रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी को बताना चाहिए कि बहुसंख्यक को अल्पसंख्यक से क्यों डरना चाहिए? मोदी तो खुद को विकास का सबसे बड़ा पैरोकार बताते हैं फिर उन्हें सांप्रदायिक मुद्‌दों के सहारे की जरूरत क्यों पड़ी?


विडंबना तो देखिए कि गुजरात के चुनाव में राज्य के मसलों की, वहां हुए विकास की चर्चा होनी चाहिए पर उसकी जगह प्रधानमंत्री पाकिस्तान, चीन और जापान की चर्चा कर रहे हैं। दरअसल, भाजपा को अपने 22 साल के शासनकाल की उपलब्धियों को जनता के समक्ष रखना चाहिए था। गुजरात में कृषि संकट और बढ़ती बेरोजगारी पर बात होनी चाहिए थी। उम्मीद थी कि पटेल आरक्षण के लिए सनसनी फैलाने वाले आंदोलन को ध्यान में रखकर आरक्षण पर खूब बहस होगी। लेकिन, अफसोस की बात है कि ये सभी जायज मुद्‌दे पृष्ठभूमि में चले गए हैं और वोटों के ध्रुवीकरण के लिए नफरत की राजनीति हावी हो गई। सतही मुद्‌दे बहस के केंद्र में हैं।


सवाल है कि ध्रुवीकरण की राजनीति से लोकतंत्र कब तक शर्मसार होता रहेगा? सियासी दल यह क्यों नहीं समझते कि नफरत फैलाकर सिर्फ चुनाव जीता सकता है, देश कभी भी वैभव के शिखर पर नहीं पहुंच सकता। वे लोगों के प्रतिनिधि होते हैं। उनके रहनुमा होते हैं। उन्हें अपने आचरण-व्यवहार से समाज के सामने आदर्श उपस्थित करना चाहिए पर उल्टा ही हो रहा है। लिहाजा, इस प्रकार के चुनाव प्रचार के बाद जीत चाहे किसी भी पार्टी की हो, हार अंततः लोकतंत्र की होने वाली है।