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क्या मेवाणी कांशीराम जैसे नेता बन सकेंगे?

बसपा के संस्थापक पंजाब के दलित कौटिल्य थे, जिन्होंने उत्तर प्रदेश में मजबूत दलित राजनीति खड़ी की।

Dainik Bhaskar

Jan 09, 2018, 08:15 AM IST
sekhar gupta column on  jignesh mewani Political career

क्या हमारी राष्ट्रीय राजनीति में एक नया दलित फैक्टर उभर रहा है? इससे भी बड़ी बात क्या जिग्नेश मेवाणी इस नए फैक्टर के प्रतीक-पुरुष हैं? वे नए कांशी राम हैं अथवा महेंद्र सिंह टिकैत या कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला (रिटायर्ड) जैसी तात्कालिक सनसनी? कांशीराम ने हिंदी हृदय प्रदेश में बहुत गहरा असर डाला। अन्य दो जाट गुर्जर समुदाय में समर्थन के बाद भी पृष्ठभूमि में चले गए। भारतीय मतदाता वर्ग में दलित मोटेतौर पर 16.6 फीसदी हैं। इससे वे मुस्लिमों की तुलना में अधिक शक्तिशाली वोटबैंक हैं।

जैसा पिछड़ी जातियों और मुस्लिमों के मामले में हुआ 1989 के बाद कांग्रेस इनके वोट भी गंवाने लगी। मुस्लिमों के विपरीत दलितों ने कभी रणनीतिक रूप से अथवा किसी पार्टी को चुनने अथवा अन्य को सत्ता से बाहर रखने के एकमात्र उद्‌देश्य से वोट नहीं दिए। इससे भाजपा के उदय में मदद मिली। फिर मुस्लिम से अलग दलित वोट इतना बिखरा हुआ है कि उत्तर प्रदेश छोड़कर कहीं पर चुनावी भाग्य बदलने की क्षमता इसमें नहीं है। कागज पर दलित वोटर का प्रतिशत सर्वाधिक पंजाब (32 फीसदी) में है लेकिन, उस द्विदलीय राज्य में राजनीतिक द्वंद्व जाति के आधार पर नहीं होता। यदि थोक में ये वोट किसी भी राज्य में किसी एक के पक्ष में झुक जाए तो संतुलन बदल जाता है। इसलिए सवाल एक ही है : क्या आज का दलित उभार और इसका नेतृत्व खासतौर मेवाणी दलितों में एकजुटता ला सकेंगे?
मेवाणी में राज्यव्यापी आकर्षण के साथ करिश्माई नेता होने की जरूरी खासियत है। चूंकि दलित फैले हुए हैं, उन्हें एकजुट करने वाला नेता चाहिए होता है। 70 के दशक के मध्य तक बाबू जगजीवन राम ने कांग्रेस के लिए यही किया। उसके बाद से दलित नेता तैयार करने में कांग्रेस की नाकामी इसकी सबसे बड़ी नाकामी है। इस मामले में भाजपा ने तो और भी कमजोर प्रदर्शन किया है। भारत में अभी रोचक स्थिति है, जब अल्पसंख्यक, दलित और अनुसूचित जनजातियों के पास कोई महत्वपूर्ण केंद्रीय मंत्रालय या मुुख्यमंत्री पद नहीं है। इसी से मेवाणी के लिए अवसर पैदा होता है। गुजरात के विधायक के रूप में उनका और भी महत्व है। इससे उन्हें अपना संदेश अन्य राज्यों में ले जाने की वैधता दी। उन्होंने इस हफ्ते से महाराष्ट्र से शुरुआत की।


मेवानी के कई मजबूत पक्ष हैं। युवावस्था, अभिव्यक्ति की क्षमता, निर्भीकता, सोशल मीडिया में महारत तथा राजनीतिक और वैचारिक लचीलापन। फिर फोकस भी है जैसे फिलहाल एकमात्र शत्रु के रूप में भाजपा को निशाना बनाना और दूसरों से गठजोड़ करने के लिए उसका इस्तेमाल करना। उनमें कुछ कमजोरियां हैं। वे छोटे राज्य के हैं और उन पर अब भी वामपंथी झुकाव की छाप है, जो जेएनयू और कुछ अन्य केंद्रीय शिक्षा परिसरों के बाहर कभी नहीं चला। लेकिन, छोटे राज्य के ऐसे दलित नेता का उदाहरण है, जिसने सबसे बड़े राज्य में अजेय राजनीति खड़ी की : कांशीराम। पंजाबी (चंडीगढ़ के समीप रूप नगर या रोपड़ जिले के) कांशीराम भी राष्ट्रीय स्तर पर गैरपरम्परागत जगह से आए थे। वे डीआरडीओ प्रयोगशाला में वैज्ञानिक थे, उन्होंने आम्बेडकर को पढ़ना शुरू कर अनुसूचित जाति, पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यक कर्मचारियों का अखिल भारतीय संघ ‘बामसेफ’ खड़ा किया। 1980 के उत्तरार्ध के अस्थिर दौर में वे सिख पृथकतावादियों सहित विविध गुटों को एक साथ लाए। जल्दी ही वे इतने बड़े हो गए कि उन्होंने अन्य गुटों को छोड़ दिया जैसे अरविंद केजरीवाल ने अन्ना हजारे को छोड़ दिया। मेवानी को भी यदि अपनी राजनीति बढ़ानी है तो उन्हें उमर खालिद को छोड़ना होगा।
तो वे और मायावती ने हिंदू धर्म का तिरस्कार किया बौद्ध धर्म अपनाया। वे अपनी बैठकों में कहते थे कि उनकी ‘लड़ाई हिंदू देवताओं से नहीं बल्कि मनुवादियों से हैं,’ जिन्होंने दलितों को इन देवताओं से वंचित किया। वे कहा करते थे, हम अपने देवता उनके पास क्यों छोड़ें, यही तो वे चाहते हैं। उनकी पहली बड़ी राजनीतिक मौजूदगी 1988 की गर्मी में ऐतिहासिक इलाहाबाद उपचुनाव में दिखी। वीपी सिंह राजीव गांधी पर बोफोर्स सौदे में दलाली का आरोप लगाकर उनके मंत्रिमंडल और लोकसभा से इस्तीफा दे चुके थे और उस घोटाले के कारण अमिताभ बच्चन के इस्तीफे से खाली हुई इलाहाबाद सीट से चुनाव लड़ रहे थे। सीधी-सपाट दलित राजनीति से यह हमारा पहला परिचय था। वे कहा करते, ‘आप 40 साल से जानवरों की तरह रह रहे हैं। मैं आपको मानव बनाने आया हूं।’ हालांकि, चुनाव अभियान और बाद में जो राजनीति उन्होंने खड़ी की उसमें तीन चीजें अलग नज़र आई, जिन्होंने उनकी शिष्या मायावती को तीन बार उत्तर प्रदेश की सत्ता सौंपीं। एक, उन्होंने ऐसे हर व्यक्ति को त्याग दिया जो दूर से भी पृथकतावादी दिखता हो सिमरजीत सिंह मान से लेकर सुभाष घिसिंग तक। दो, वे बार-बार अपने परिवार की राष्ट्रवादी और सैन्य विरासत का जिक्र करते : प्रथम विश्वयुद्ध में आठ पूर्वज, द्वितीय विश्वयुद्ध में दो और ऑपरेशन ब्ल्यू स्टार में दो पैरोकमांडो रिश्तेदार मारे गए। उनका अभियान सेना की तर्ज पर तैयार किया गया था। पेटिंग ब्रिगेड, पैम्फलेट ब्रिगेड यहां तक कि एक बेगिंग स्वाड भी था, जिसके सदस्य दलित बस्तियों में जाकर छोटे-मोटे योगदान के रूप में सिक्के इकट्‌ठे करते थे। उन्होंने हमें बताया ‘एक बार सफाईकर्मी हमें एक रुपया दे दे तो वोट के लिए कांग्रेस के दिए हजार रुपए वह ठुकरा देगा।’ तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण था उन्होंने अपना दायरा बढ़ाया और बहुजन समाज की परिभाषा के तहत अन्य गुटों को आकर्षित किया। इसी तरह उन्होंने नारा गढ़ा, ‘वोट हमारा, राज तुम्हारा/नहीं चलेगा, नहीं चलेगा।’ बाद में उन्होंने मायावती को अहसास हुआ कि सत्ता में आने के लिए उन्हें मुस्लिमों और कुछ ऊंची जातियों को भी साथ में लेना होगा।
इसी से वे सत्ता में आए। यह कोई आसान खेल नहीं है लेकिन, असंभव भी नहीं है। कांशीराम एक ही उद्‌देश्य पर केंद्रित रहने वाले राजनीतिक जीनियस थे, एक प्रकार के दलित कौटिल्य और मायावती उनकी चंद्रगुप्त थीं। क्या मेवाणी में उसी प्रकार का कौशल, फोकस और मुख्य प्रदेश में आने की महत्वाकांक्षा है? अभी हम नहीं जानते लेकिन, इससे आपको पता चल जाएगा कि क्यों भाजपा और रूढ़ीवादी हिंदू श्रेष्ठि वर्ग उन्हें लेकर चिंतित है। (येलेखक के अपने विचार हैं।)


शेखर गुप्ता
एडिटर-इन-चीफ,‘द प्रिन्ट’
Twitter@ShekharGupta

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