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फेसबुकिया नायिका के नाम

फेसबुक खोलकर बैठे हैं, हमेशा की तरह ऑनलाइन हैं, तुम दिखो और झट से रसिया गा दें।

शरद उपाध्याय | Last Modified - Mar 01, 2018, 12:58 AM IST

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    शरद उपाध्याय

    प्रिये,
    अब मन बिल्कुल बदल गया है। बरसाने की होली बहुत हो ली। मथुरा की गलियों की गुलाल भी अब मन को फीकी ही लग रही है। लाख बंबइया होली कोई दिखाए, हीरो-हीरोइन के रंग भी मन को नहीं सुहा रहे। बस बार-बार फेसबुक पर चिपका हुआ तुम्हारा गुलाबी चेहरा याद आ रहा है। होली आ चुकी है। चारों ओर रंग ही रंग बिखरा पड़ा है, कल्पनाएं हिलोरें ले रही हैं। तुम ऑफलाइन’ हो, पर बार-बार दूसरों की वाल पर ‘कमेंट’ की पिचकारियां फेंकती फिर रही हो। यह ठीक नहीं है। यह हमारे शाश्वत प्रेम के खिलाफ है। इससे न जाने कितने रंग भरे गुब्बारे मेरे सीने पर फूटने लगे हैं। तुम्हारे लिए मैंने क्या-क्या नहीं किया।

    तुम्हारे लिए ही एक पुराना ‘रंगीन’ फोटू, जिसमें बीवी भी नहीं पहचान पाती, फेसबुक पर चिपका रखा है। इसी के सहारे साल भर से रसिया गा रहे हैं, बहुत कोशिश में लगे है, तुम्हारा सुंदर मुखड़ा देखा, झट से लाइक कर देते हैं, और बिना पढ़े ही अच्छा सा कमेंट कर बैठते है, अब इतने सुंदर चेहरे को देखकर भला कहाँ कुछ पढ़ने-लिखने का मन करता है। अब तुम भी जरा सोचो। इतने दिनों से ऑफलाइन हो। अब होली के अवसर पर थोड़ा सा डिस्काउंट तो दे दो। चंद पलों के लिए तो ऑनलाइन हो जाओ। प्रेम भरी पिचकारी के कुछ रंग मेरे जीवन में भी बिखेर जाओ। देखो मैंने तुम्हारे लिए कितना त्याग किया है।

    लाख डिसलाइक की स्थिति होने पर भी सैकड़ों-हजारों बार लाइक किया। न जाने कितनी बार सिर नोंचने वाली स्थिति के बाद भी लाख पसंद होने का कमेंट किया। कचरे में फेंकने वाली रचनाओं को कालिदास से भी उच्च कोटि का बताया। यही सोचकर कि अब तो कुछ तुम्हारी तरफ से अबीर उड़ेगा। कभी तो तुम मेरे साथ फाग गाओगी। बाहर टोली आवाज दे रही है। बीवी बार-बार कह रही है। पर मन है बाहर जाने को कर ही नहीं रहा। फेसबुक खोलकर बैठे हैं, हमेशा की तरह ऑनलाइन हैं, तुम दिखो और झट से रसिया गा दें।


    अभी-अभी तुमने होली पर जो प्रेम का रसिया वाल पर डाला है, दसवीं कक्षा के गद्य-पद्य संग्रह से नकल करने के बाद भी अच्छा है। हालाँकि उसमें मात्राओं की कई गलतियां है, पर कोई बात नहींं। ये सारी बातें रंगीन भावनाओं के कारण क्षम्य है। पर एक बात सच-सच बताओ। ये जो तुमने ‘स्टेट्स’ ‘सिंगल’ डाल रखा है, वो सच तो है ना। नही तो मैं बेकार ही काल्पनिक फाग गाकर होली न निकाल दूं।


    अब चारों ओर होली की गुलाल उड़ रही है। मेरा मन भी कर रहा है कि तुम्हारे गोरे गालों पर थोड़ा सा अबीर मल दू। पर एक बात का डर लगता है तुमने फेसबुक पर जो सुंदर फोटो डाल रखा है, वो तुम्हारा ही तो है ना। देखो, ऐसा अनर्थ मत करना। तुम्हारे इस सुंदर फोटो पर विश्वास करके ही होली की धूम को छोड़कर नेट पर बैठा हूं। गुगल प्लस पर तुमने फोटो की जगह ‘फूल’ डाल रखा है। कहीं तुम मुझे ‘फूल’ तो नहीं बना रही। ट्विटर पर भी तुम न जाने किनको ‘फॉलो’ करती नजर आती हो। अब ये बातें सोचता हूं। तो दिल बैठ जाता है। एक बार तुमने कमेंट लिखने में ‘जेंडर-मिस्टेक’ कर दी तब ऐसा लगा था कि कहीं तुम्हारी आई डी ‘डिसलाईक’ तो नहींं है।


    पर भगवान से यही प्रार्थना करता हूं कि ऐसा नही हो। मेरा विश्वास है कि ऐसा नहीं होगा। इसीलिए तो बाहर उड़ती हुई गुलाल को छोड़कर मन की पिचकारी लिए ऑनलाइन बैठा तुम्हारा इंतजार कर रहा हूं। ये ऑफलाइन की लंबी अंधेरी रात कब खत्म होगी। बस आ भी जाओ। किसी बात का बुरा मत मानना। फूल का फोटो भी यदि प्यार में डाल रखा है। तो मुझे स्वीकार है। पर इस सूने जीवन में होली का रंग तो बिखेर दो। मैं कबसे नेट खोलकर बैठा हूं। बस एक बार.... तुम्हें होली की कसम।

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Web Title: Sharad Upadhyay Artical On Holi
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