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विज्ञान विरोधी रवैया महाशक्ति नहीं बना सकता

संदर्भ: भाजपा नेताओं और मंत्रियों द्वारा अवैज्ञानिक बातों को महत्व देना हिंदुत्व के प्रोजेक्ट का ही हिस्सा

Danik Bhaskar | Mar 09, 2018, 08:00 AM IST

देश के कनिष्ठ शिक्षा मंत्री सत्यपाल सिंह ने हाल ही में कहा कि डार्विन का मानव विकास के प्राकृतिक चयन का सिद्धांत इस आधार पर ‘अवैज्ञानिक’ है कि ‘हमारे पूर्वजों सहित किसी ने भी यह नहीं कहा अथवा लिखा कि उन्होंने कभी किसी वानर को मानव बनते देखा है।’ यह चौंकाने वाला बयान था और विज्ञान पर मौजूदा सरकार की ओर से किया गया ताज़ा हमला है।


भारत के संविधान के अनुसार ‘वैज्ञानिक तेवर, मानवतावाद और जिज्ञासा व सुधार की भावना’ का विकास हर नागरिक का कर्तव्य है और निहितार्थ में यह राज्य की भी जिम्मेदारी है। भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि ‘असहिष्णुता, आस्था, अंधविश्वास, भावनात्मकता, अतार्किकता और निर्भर व अस्वतंत्र व्यक्ति के तेवर’ पैदा करने वाले धर्म के विपरीत वैज्ञानिक तेवर ‘एक स्वतंत्र व्यक्ति के तेवर होते हैं।’


फिर भी भारत के सत्तारूढ़ दल भाजपा के लिए ऐसे विचार अब चलन में नहीं हैं। इसके नेता व समर्थक स्कूली बच्चों को यह पढ़ाना चाहते हैं कि विकासवाद का सिद्धांत जीवन की उत्पत्ति की परिकल्पना भर है, जो धार्मिक कथनों के समतुल्य है। उनका लक्ष्य तो इसे पूरी तरह स्कूल के पाठ्यक्रम से बाहर रखना है। डार्विन ही निशाने पर नहीं हैं। इसके पहले राजस्थान के शिक्षा मंत्री व भाजपा के एक और दिग्गज नेता वासुदेव देवनानी ने दावा किया था कि गाय ही एकमात्र ऐसी प्राणी है, जो ऑक्सीजन लेती है और ऑक्सीजन ही छोड़ती है। गाय की वंदना का भाजपा और इसके समर्थकों को जुनून-सा है, जिन्होंने इसके संरक्षण के नाम पर मानवों पर हमले किए हैं। लेकिन यह तो भाजपा से सहानुभूति रखने वाले कई लोगों के लिए भी दूर की कौड़ी थी। दोनों, सिंह और देवनानी शिक्षित व्यक्ति हैं : सिंह के पास केमिस्ट्री में डिग्री है और देवनानी तो प्रशिक्षित इंजीनियर हैं। फिर भी न तो ज्ञान और न नेतृत्व अज्ञान को बढ़ावा देने की प्रवृत्ति को हतोत्साहित करने के लिए पर्याप्त साबित हुआ। राजस्थान हाईकोर्ट के पूर्व जज जस्टिस महेश चंद्र शर्मा के बारे में भी यही सच है। बताया जाता है कि वे भी साइंस ग्रेजुएट हैं। पिछले साल उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा कि भारत का राष्ट्रीय पक्षी मोर ‘आजीवन ब्रह्मचारी’ रहता है और अपने आंसू से मोरनी को गर्भवती बनाता है। उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण द्वारा मोर पंख के इस्तेमाल को इसके ब्रह्मचर्य का सबूत बताया।


यहां तक कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी विज्ञान पर हमलों में शामिल हो गए। मोदी को खुद को टेक्नोलॉजी सेवी 21वीं सदी के नेता के रूप में वर्णित किया जाना पसंद है। लेकिन, अक्टूबर 2014 में मुंबई के एक अस्पताल के उद्‌घाटन समारोह में उन्होंने दावा किया कि हाथी के सिर वाले देवता गणेश इस बात का सबूत है कि प्राचीन भारत में प्लास्टिक सर्जरी का ज्ञान था। फिर उन्होंने प्राचीन महाकाव्य महाभारत के हवाले से कहा कि तब के लोगों को जेनेटिक्स का पता था। जाहिर है मोदी ने यह नहीं सोचा कि छोटे से छोटे हाथी का सिर भी बड़े से बड़े मानव की गर्दन पर नहीं लगाया जा सकता।


विडंबना यह है कि भारत वाकई प्लास्टिक सर्जन का प्रवर्तक था। प्लास्टिक सर्जरी को व्यवहार में लाने वाले पहले ज्ञात व्यक्ति सुश्रुत थे और पुरातत्वविदों को दुनिया के सबसे पुराने सर्जिकल उपकरण (पहली सदी) मिले हैं। प्राचीन अभिलेखों में राइनोप्लास्टी ऑपरेशन के सबूत भी है। इन ऐतिहासिक तथ्यों को हाथी के सिर के प्रत्यारोपण की पौराणिक कथा में आरोपित करना विज्ञान और सम्मान के हकदार उन लोगों के प्रति कृतध्नता है। इसी तरह मोदी ने 2014 में स्कूली बच्चों को बताया कि जलवायु परिवर्तन पर्यावरण की समस्या नहीं है बल्कि समय के साथ बदलने वाले गरमी और ठंड से निपटने की मानव की क्षमता का मामला है। उन्होंने राष्ट्रीय टीवी पर कहा कि ग्लोबल वॉर्मिंग ‘सिर्फ मानसिक अवस्था’ है। सिर्फ भाजपा के हिंदुत्व से प्रोत्साहित राजनेता ही नहीं योग शिक्षक और समलैंगिकता का ‘इलाज’ करने का नुस्खा बेचने वाले आंत्रप्रेन्योर बाबा रामदेव जैसे लोग भी भारत में छद्‌म विज्ञान का प्रचार कर रहे हैं।


इससे धर्म और छद्‌म आध्यात्मिकता को भारत में फायदेमंद बिज़नेस बनाने वाले गुरुओं को और पोषण मिलता है। मसलन, नए युग के ‘सद्‌गुरु’ जग्गी वासुदेव ने 2015 में चंद्रग्रहण के दौरान खाने के खिलाफ चेतावनी दी थी, क्योंकि , ‘पकाए भोजन में चंद्रग्रहण के पहले व बाद में विशेष परिवर्तन होता है और पोषक भोजन विष में बदल जाता है। यदि शरीर में उस समय भोजन होगा तो दो घंटे में आपकी 28 दिनों के बराबर ऊर्जा घट जाएगी।’ कुछ स्तर के आधिकारिक प्रोत्साहन से कई लोग कहते हैं कि जेट हवाई जहाज से लेकर परमाणु हथियारों तक सबकुछ वैदिक काल के दौरान भारत में बनाया जाता था।

अंतर्निहित संदेश यह है कि प्राचीन भारत में सारे जवाब मौजूद थे अौर इस तरह आयातीत आधुनिक विचारों व जीवनशैली की तुलना में परम्परागत और स्वदेशी मान्यता व पद्धतियां बुनियादी रूप से श्रेष्ठ हैं। भाजपा व इससे जुड़े लोग भूतकाल की बुद्धिमत्ता की इसलिए प्रशंसा करते हैं, क्योंकि वे इसे उस आस्था आधारित सांप्रदायिक पहचान को बढ़ावा देने के लिए जरूरी मानते हैं, जो हिंदुत्व प्रोजेक्ट के केंद्र में है। उनके लिए धर्म व्यक्तिगत आस्था का विषय नहीं है बल्कि परम्परागत पहचान की राजनीति का प्रमुख तत्व है। यह सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने, अनुशासन व एकरूपता सुनिश्चित करने और आमूल बदलाव को रोकने का साधन है।


इस तरह की प्रवृत्ति के लिए विज्ञान व तार्किकता खतरा है, क्योंकि वे प्रश्न पूछने को बढ़ावा देते हैं और उन परम्परागत दृष्टिकोण के परीक्षण को प्रोत्साहित करते हैं, जिन्हें बढ़ावा देने के प्रति भाजपा इतनी उत्सुक है। यही वजह है कि जब वह धर्मनिरपेक्ष भारत को हिंदू राज्य बनाना चाहती है तो उसे विज्ञान की भूमिका कमजोर करनी ही होगी। भाजपा जिस तरह का प्रतिगामी राज्य बनाना चाहती है वह वैसा बिल्कुल नहीं होगा, जिसने भारत को प्राचीन युग की वैज्ञानिक महाशक्ति बनाया था। इस पर आंसू ही बहाए जा सकते हैं, उम्मीद है कि आस-पास कोई मोरनी न हो।
(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

शशि थरूर
विदेश मामलों की संसदीय समिति के चेयरमैन और पूर्व केंद्रीय मंत्री
Twitter@ShashiTharoor