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पहचान की नहीं, नतीजों की राजनीति चलेगी

2018 में भारतीय राजनीति में विपक्षी एकता के साथ सकारात्मकता देखने को मिलेगी

Danik Bhaskar | Jan 10, 2018, 05:05 AM IST
शशि थरूर, विदेश मामलों की संसदीय समिति के चेयरमैन और पूर्व केंद्रीय मंत्री शशि थरूर, विदेश मामलों की संसदीय समिति के चेयरमैन और पूर्व केंद्रीय मंत्री
क्रिस्टल बॉल में यानी भविष्य में झांकना कभी आसान नहीं होता खासतौर पर इसलिए कि इन दिनों छवि कुछ अनपेक्षित तरीके से धुंधली होने की संभावना रहती है। पिछले साल इसी समय किसने भरोसा किया होता कि राहुल गांधी सबसे मजबूत और विश्वसनीय राष्ट्रीय नेता के रूप में वापसी करके 2017 की सबसे बड़ी राजनीतिक खबर बनेंगे? आज यही हकीकत है। 2018 के आने के साथ व्यक्ति पिछले साल की घटनाओं के आधार पर अगले साल का पूर्वानुमान लगाने का जुआ खेलने लगता है। इसके बाद भी मैं नए साल में भारतीय राजनीति में ये प्रमुख ट्रेंड उभरते देखता हूं :

राहुल गांधी का नेतृत्व मजबूत होगा: वे दिसंबर में ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष बने हैं। 2018 में हमें अपेक्षा है कि वे पार्टी में अपना नेतृत्व मजबूत करेंगे, महत्वपूर्ण पदों पर प्रमुख सहयोगियों की नियुक्ति करेंगे और इनोवेशन तथा नए कदमों से संगठन की कार्यप्रणाली को रूपांतरित करेंगे। साल के मध्य तक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पर उनकी छाप पड़ चुकी होगी, जो साफतौर पर भूतकाल से अलग होगी।
विपक्ष में एकता के प्रयास : गुजरात में गहराई तक जमीन भाजपा के खिलाफ अभियान में राहुल गांधी के प्रदर्शन से ताज़गी लेकर विपक्ष इस साल एकजुट होने लगेगा। गणितीय समीकरण राजनीतिक तर्क की पुष्टि करता है। भाजपा ने 2014 में सिर्फ 31 फीसदी मत हासल करके भारी जीत हासिल की और 2017 में उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव ने फिर साबित कर दिया कि सत्तारूढ़ दल की सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी है विपक्ष के बीच एकता न होना (यदि मायावती, सपा-कांग्रेस गठबंधन का साथ देतीं तो भाजपा उत्तर प्रदेश की ज्यादातर सीटों पर हार जातीं। इसकी बजाय उनका 20 फीसदी समर्थन आधार बर्बाद हो गया, क्योंकि इससे भाजपा विरोधी वोट विपक्ष से दूर चले गए और भाजपा की जबर्दस्त जीत की पक्की हो गई)।
तर्क चाहे एकदम स्पष्ट हो लेकिन, जरूरी नहीं कि ऐसा होगा ही। क्योंकि विपक्षी दलों के लिए अन्य दलों से उनके मतभेद भाजपा को सत्ता से बाहर करने के उनके साझे हित से भी अधिक महत्वपूर्ण होते हैं। भाजपा खुद विपक्ष के विभाजन को भुनाने का पूरा प्रयास करेगी जैसा इसने बिहार में सफलतापूर्वक किया। 2018 में विपक्ष का महागठबंधन बनाने में सफलता या प्रयासों से यह तय होगा कि अगले आम चुनाव का नतीजा क्या होगा।
अंतरराष्ट्रीय राजनीति का भारत पर बड़ा प्रभाव नहीं पड़ेगा : बड़े वैश्विक मुद्दे जैसे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का अस्थिर किस्म का प्रशासन, चीन का महाशक्ति के रूप में उभरना, चीन-पाकिस्तान कॉरिडोर का तेजी से निर्माण, रूस की चीन के घनिष्ठता और इस कारण पाकिस्तान के साथ गर्मजोशी, मध्यपूर्ण में आईएसआईएस पर स्पष्ट होती जीत और उत्तरी कोरिया के साथ परमाणु तनाव, इन सबका हमारी घरेलू राजनीति पर कोई महत्वपूर्ण प्रभाव नहीं पड़ा है और 2018 में भी इसकी कोई संभावना नहीं है। भारतीय राजनीति एेसे सारे प्रभावों से अन्यों की तुलना में अधिक सुरक्षित है और यही ट्रेंड जारी रहने की संभावना है। केवल दो ही अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम ऐसे हैं जो हमारी राजनीति को महत्वपूर्ण तरीके से प्रभावित कर सकते हैं। खाड़ी के देशों में किसी चिंगारी का भड़कना, जिससे हमारे लाखों कामगार स्वदेशी अर्थव्यवस्था में लौटेंगे जो उन्हें अपने में समायोजित करने में सक्षम नहीं होगी। इसके साथ ही उनके द्वारा भेजे जाने वाले धन का भी देश को नुकसान होगा। दूसरी घटना पाकिस्तान के साथ कोई बड़ा संघर्ष, जिसके साथ हमारे रिश्ते हाल ही के समय में सबसे निचले स्तर पर पहुंच गए हैं। पहला तो हमारे नियंत्रण के बाहर है और दूसरे को केवल कुशल स्टेट्समैनशिप से रोका जा सकता है, जिसका कभी-कभी नई दिल्ली में अभाव दिखता है। पेट्रोल की कीमतों में नाटकीय वृद्धि मतदाताओं को प्रभावित करेगी लेकिन, जहां तक भविष्य में नज़र जाती है उसमें ज्यादा जोखिम दिखाई नहीं देता।
राजनीतिक औजार के रूप में सोशल मीडिया का बढ़ता चलन : 2017 में ही स्पष्ट हो गया था, इतना कि पहले सोशल मीडिया से दूर रहने वाले राहुल गांधी प्राय: ट्वीट करते रहे हैं और वह भी बहुत बुद्धिमत्तापूर्ण। सोशल मीडिया पहले ही अपना संदेश बाहर पहुंचाने के लिए नेताओं का पसंदीदा औजार हो गया है। प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाने की बजाय एक ट्वीट अथवा फेसबुक पोस्ट अधिक आसान है। 4जी कनेक्शन का खर्च किफायती होने और भारतीय मतदाताओं के हाथों में स्मार्ट फोन के प्रसार के कारण यह यकीन करना आसान है कि फेसबुक, ट्विटर और वॉट्सएप राजनीतिक अभियान के पसंदीदा माध्यम होंगे। लेकिन यह रैलियों, पर्यटन और मतदाताओं के घर विजिट जैसे परम्परागत माध्यमों की कीमत पर नहीं होगा। ये तो उसी तरकश में उतने ही अपरिहार्य तीरों की तरह होंगे।
पहचान की राजनीति अपनी सीमा तक पहुंच जाएगी : भाजपा के ध्रुवीकरण की राजनीति और क्षेत्रीय दलों के जातिवाद व क्षेत्रवाद पर जोर देने से भारतीय लोकतंत्र पहचान की राजनीति का बंधक बन गया लेकिन, मुझे लगता है कि निकट भविष्य में यह राजनीति अपनी सीमा को छू लेगी। ‘हिंदू ध्रुवीकरण’ बार-बार भाजपा के लिए उपयोगी रहा है लेकिन जैसा कि गुजरात के विधानसभा चुनाव से साफ हुआ है कि अब यह पर्याप्त नहीं है। एक नए रामजन्मभूमि मंदिर से बेरोजगारों का पेट नहीं भरा जा सकेगा। न ही तेलुगु गौरव कई दरों वाले जीएसटी का क्रियान्वयन आसान बना देगा, न अोबीसी के प्रभुत्व से मैन्यूफैक्चरिंग बढ़ सकेगा। इसी प्रकार न तीन तलाक खत्म होने से रसोई गैस के सिलेंडर की कीमत कम होगी।
तथ्य यह है कि मतदाता पहचान की बजाय इन आर्थिक मुद्दों के आधार पर उत्तरोत्तर अधिक मतदान करेंगे। वे जाति अथवा क्षेत्र के बारे में बहुत जुनूनी भावनाएं रखते होंगे लेकिन, अर्थशास्त्र उनकी जेब पर चोट पहुंचाता है। इसमें हमारे मतदाताओं के बढ़ते अहसास में ही 2018 की यह उम्मीद छिपी है कि भारतीय राजनीति में पहचान की बजाय परफार्मेंस की राजनीति की ओर बदलाव होगा। भय की बजाय उम्मीद बलवती रहेगी। टकराव की बजाय अाकांक्षाएं प्रेरणा देंगी।
(ये लेखक के अपने विचार हैं।)