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देश में पारदर्शी शासन सोनिया गांधी की विरासत

Shashi Tharoor | Last Modified - Dec 14, 2017, 04:05 AM IST

विकासशील देशों के इतिहास में पहली बार भोजन, काम, शिक्षा व सूचना के अधिकार को कानूनी रूप।
  • देश में पारदर्शी शासन सोनिया गांधी की विरासत

    सोनिया गांधी की कहानी कहना चाह रहे उपन्यासकार को कथा में परी-कथा देखने के लिए शायद माफ कर दिया जाए। एक सुंदर विदेशी युवती अजनबी, नए देश में आती है और एक हैंडसम युवराज से विवाह करती है। दोनों बरसों पारिवारिक जीवन का लुत्फ उठाते हैं। फिर त्रासद परिस्थितियों में युवराज को राज्य के सूत्र संभालने पड़ते हैं और उसे शासन की कटु वास्तविकताओं से दो-चार होना पड़ता है। इसकी चरम परिणति उसकी खुद की हत्या की त्रासदी है। रानी शोक में डूब जाती हैं, जब तक कि के बार-बार किया अनुरोध उन्हें शोक से उबरकर राज्य की नियति को अपने हाथों में लेने पर मजबूर नहीं कर देता। एक क्लासिक कहानी लगती है : मुझे इन शब्दों से शुरू करना चाहिए था – ‘एक बार की बात है।’


    और फिर भी- कहानी में एक मोड़ है। रानी को तश्तरी में रखकर राज मुकुट पेश किया गया था पर वे ठुकरा देती हैं। वे आम लोगों के साथ चलती हैं, उन्हें एकजुट करती हैं लेकिन, सत्ता पके बालों वाले वजीरों को सौंप देती हैं। वे ऐसी परीकथा नहीं लिखते, उस महिला के िलए भी नहीं, जिन्हें किसी कठोर पर्यवेक्षक ने ‘सिन्ड्रेला ऑफ ओर्बासानो’ कहा था। किंतु सोनिया गांधी की कोई कौन-सी कहानी कहें? उस इटालियन नारी की जो एक अरब भारतीयों की भूमि पर सर्वाधिक प्रभावशाली शख्सियत बनकर उभरीं? उस निर्लिप्त राजनेता की, जिसने अपनी पार्टी का नेतृत्व कर 2004 में उसे ऐसी असाधारण जीत दिलाई, जिसका अनुमान उनकी पार्टी के प्रशंसक भी नहीं लगा सकते थे? ऐसी संसदीय लीडर की बात करें, जिसने अपनाए गए देश में सर्वोच्च पद ठुकरा दिया, जो उन्होंने अपने कठोर श्रम और अपने राजनीतिक साहस से अर्जित किया था? उस सिद्धांतवादी महिला की कहानी कहें, जिसने दिखा दिया कि सनक और पाखंड से ग्रस्त पेशे में भी उचित मूल्यों के लिए खड़ा हुआ जा सकता है?


    इस पहेली को सुलझाने के कई प्रयास हुए। स्पेन के उपन्यासकार जेवियर मोरो के सनसनीखेज ‘द रेड सारी’ से कांग्रेस के राजनेता केवी थामस के ‘सोनिया प्रियंकारी’ तक सोनिया गांधी की कहानी है लेकिन, इससे भी अधिक बहुत कुछ है। किसी को उनके विदेशी होने पर हुए विवाद से हिचकना नहीं चाहिए। यह मुद्‌दा 1990 के दशक के मध्य से उत्तरार्ध तक चला और 2004 में फिर उठाया गया। यह विवाद कई पहलुओं से रोचक था अौर खासतौर पर तब जब इसका संबंध उस भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से है, जिसकी स्थापना स्काटलैंड में जन्मे पहले अध्यक्ष एलन अॉक्टोवियन ह्यूम ने 1885 में की थी और इसके सबसे माननीय नेताओं (और निर्वाचित अध्यक्षों) में मक्का में जन्मे मौलाना अबुल कलाम आजाद, आयरिश महिला एनी बेसेंट और अंग्रेज विलयम बेडरबर्न और नेली सेनगुप्ता शामिल हैं। इससे भी विचित्र बात तो यह है कि इसमें कांग्रेस के महानतम नेता महात्मा गांधी के दृष्टिकोण का खंडन है, जिन्होंने पार्टी को उस भारत का छोटा प्रातिनिधिक स्वरूप देने का प्रयास किया, जिसमें उन्होंने विभिन्न विचारों का श्रेष्ठतम स्वरूप देखा। सोनिया गांधी ने खुद पार्टी नेतृत्व संभालते हुए अपना पक्ष रखते हुए ध्यान दिलाया था, ‘मैं विदेश में जन्मी पर भारत को मैंने अपना देश चुना है। मैं भारतीय हूं और अंतिम सांस तक यही रहूंगी। भारत मेरी मातृभूमि है और यह मुझे अपनी ज़िंदगी से भी अधिक प्रिय है।’ लेकिन, असली मुद्‌दा तो यह था कि कौन प्रामाणिक भारतीय है इसका फैसला हमें दलों के नेताओं पर छोड़ना चाहिए या व्यापक मतदातावर्ग को करने देना चाहिए? ‘हम’ और ‘वे’ पर जोर देना निकृष्टतम किस्म की सोच है, जो राष्ट्रीय मानस को विषैला बना सकती है। कांग्रेस के नेतृत्व में भारत ने हमेशा ‘एकता में अनेकता’ का घोष किया है। यह भूमि अपने नागरिकों पर कोई संकुचित मर्यादाएं नहीं थोपती। आप गोरे हो सकते हैं, साड़ी पहन सकते हैं, इतालवी भाषी हो सकते हैं और पल्लकड़ में रह रही मेरी दादी के लिए आप उससे ज्यादा विदेशी नहीं होंगे, जो पंजाबी बोलती है, सलवार कमीज पहनती है और गेहूंए रंग की है। देश इन दोनों प्रकारों को समायोजित कर लेता है।


    हमारे संस्थापक नेताओं ने अपने सपनों का संविधान लिखा; हमने उनके आदर्शों को मान्य किया। जन्म से भारतीय अथवा स्वाभाविक प्रक्रिया में भारतीय बने व्यक्ति को भारतीयता के विशेषाधिकार से वंचित करना न सिर्फ घातक है बल्कि यह भारतीय राष्ट्रवाद की धारणा का जानबूझकर किया गया अपमान है। ऐसा भारत जो हम में से कुछ को खारिज करता है, उसकी परणति हम सबके खारिज होने में हो सकती है। लेकिन, ये सारे मुद्‌दे अब सिर्फ ऐतिहासिक रुचि के रह गए हैं, क्योंकि कई चुनावों में राष्ट्र ने इसका निराकरण कर दिया है। सोनिया गांधी के पार्टी व गठबंधन के नेतृत्व को स्वीकारा है। अब जब वे पद छोड़ रही हैं तो उनकी विरासत क्या है? उन्होंने विचारों की राष्ट्रीय बहस में कांग्रेस के स्थान को पुनर्परिभाषित किया है। देश की समृद्ध बहुलता व विविधता के लिए अडिग प्रतिबद्धता ने पार्टी को उन दलों से अलग स्थान दिया, जो पहचान, जाति या धर्म के आधार पर विभाजन की राजनीति करते हैं। कांग्रेस ही ऐसी पार्टी बनी हुई है, जिसका सच्चा समावेशी राष्ट्रीय विज़न है।


    दबे-कुचले वर्गों के प्रति सहज सहानुभूति ने विकासशील देशों के इतिहास में पहली बार भोजन, काम, शिक्षा के अधिकार के कानून जैसे दूरगामी कदमों को प्रेरणा दी। सूचना के अधिकार के पीछे लोकतंत्र व सरकार की जवाबदेही के प्रति उनके समर्पण का परिणाम है। इसने भारतीय शासन में अप्रत्याशित स्तर की पारदर्शिता ला दी है। जहां एनडीए ने ‘ इंडिया शाइनिंग’ की बात की बिना खुद से यह पूछे कि भारत किसके लिए चमकेगा और वामपंथ ने प्रगतिशील कदमों का विरोध किया, जो आर्थिक तरक्की को बढ़ावा दे सकते थे। वहीं सोनिया गांधी के नेतृत्व में यूपीए ने आर्थिक वृद्धि और सामाजिक न्याय दोनों के लिए काम किया, जिसे कांग्रेस ने समावेशी तरक्की कहा।
    वर्ष 2014 में सोनिया गांधी ने एक पत्रकार से वार्ता में टिप्पणी की थी कि उनके जीवन की सच्ची कहानी के लिए उनकी किताब का इंतजार करना होगा, जो वे किसी दिन लिखेंगी। अब जब वे 71 वर्ष की हो गई हैं और पद छोड़ रही हैं तो मैं लाखों लोगों के साथ मिलकर यह कहना चाहूंगा कि अब मैं उनके किताब लिखने का और इंतजार नहीं कर सकता। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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Web Title: ShashiTharoor Talking About Sonia Gandhi
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)

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