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शेखर गुप्ता का कॉलम: भारतीय आर्थिक विचार पर लेनिन अब भी हावी

संदर्भ: वामपंथ चाहे राजनीतिक ढलान पर हो पर नरेंद्र मोदी इसके आर्थिक विचार के नवीनतम झंडाबरदार।

Danik Bhaskar | Mar 13, 2018, 06:25 AM IST
शेखर गुप्ता एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’ शेखर गुप्ता एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’

वर्ष 1975 में जब मैं पत्रकारिता का छात्र था तो एक कॉमरेड से इस बात पर दस रुपए की शर्त हार गया था कि ईएमएस नंबुदिरीपाद ज़िंदा हंै या गुजर चुके हैं। मैंने सोचा वे नहीं रहे। काफी बाद में जब मैं केरल में एक स्टोरी कर रहा था, तो मेरा सामना ईएमएस से हुआ, जो तब सीपीआई (एम) के महासचिव थे। मैंने उन्हें शर्त हारने की बात बताई। उन्होंने हाथ बढ़ाते हुए कहा, ‘आप मेरी नब्ज़ क्यों नहीं देख लेते? हो सकता है आप सही हों और आपको पैसे वापस मिल जाए।’ इसके बाद वहां हंसी का ठहाका फूट पड़ा।


भारतीय राजनीतिक वामपंथ को मैंने पत्रकार के रूप में जॉब के दौरान जाना। मैं वामपंथ का खासतौर पर इसकी आर्थिक विचारधारा और सामाजिक-राजनीतिक पाखंड का कड़ा आलोचक बना। तानाशाही से ताकत लेने वाली विचारधारा ‘लेफ्ट डेमोक्रेटिक’ या इससे बदतर ‘लेफ्ट लिबरल’ कैसे हो सकती है? और कैसे ज्यादातर भद्रलोक (विदेश में या देश के सर्वोत्तम संस्थानों में पढ़ा) से नियंत्रित नेतृत्व लगातार समानता व कमजोर तबकों की बात कर सकता है? मैं इनके बौद्धिक व दार्शनिक अहंकार का भी विरोधी था- कि यदि आप हमारे साथ नहीं हैं तो पूंजीवादियों के तलवे चाटने वाले अनैतिक व्यक्ति हैं।

जब 1989 और 1993 के बीच पंजाब में आतंकवाद का तीसरा और सबसे खूनी दौर चल रहा था तो कम्युनिस्ट पार्टियों के कार्यकर्ता उन सीमावर्ती गांवों में रुककर लड़ने और बलिदान करने को राजी थे, आतंकवादी जिनके ‘मुक्त’ होने का दावा करते थे। एक राज्य में एक दौर छोड़कर मैंने वामपंथ में उत्साहजनक कुछ नहीं पाया। जब परमाणु करार पर मनमोहन सिंह विश्वास मत जीते तो मुझे खुशी हुई, जबकि इसके लिए वामपंथ ने भाजपा सहित ऐसी सभी ताकतों से हाथ मिलाया था, जिनका वे सांप्रदायिक और प्रतिक्रियावादी कहकर तिरस्कार करते थे।


उनके बारे में एक अच्छी बात मैं कहूंगा कि भारत में वामपंथ ने व्यक्तिगत अर्थ में सबसे अधिक मिलनसार, खुले और बड़े दिलवाले प्यारे नेता दिए- ईएमएस से लेकर हरकिशन सिंह सुरजीत व अब सीताराम येचुरी और प्रकाश करात व बंगाल से सभी नेताओं तक। माणिक सरकार हमारे सबसे शानदार समकालीन नेताओं में से हैं। लेकिन, इससे आप मुझसे लेनिन की प्रतिमा तोड़ने का विरोध करने की अपेक्षा नहीं रख सकते। मैं इसका विरोध करता हूं, क्योंकि भारत में हर किसी को अपने देवता चुनने का अधिकार है और किसी को भी दूसरे के देवताओं का तिरस्कार करने का हक नहीं है।

अस्सी के उत्तरार्ध में सोवियत संघ ढहने की दिशा में बढ़ रहा था, गोर्बाचेव पेरिस्त्रोइका और ग्लासनोस्त ले आए थे। चीन में देंग खुल रहे थे। मैंने कोलकाता में तब सीपीएम महासचिव सरोज मुखर्जी से पूछा,‘गोर्बाचेव और देंग बदल रहे हैं सर, आप क्यों नहीं बदल रहे हैं?’ पूरे यकीन के साथ भुजाएं उठाकर उन्होंने कहा, ‘क्योंकि मेरा साम्यवाद देंग और गोर्बाचेव से ज्यादा शुद्ध है।’


करीब दो साल बाद मैं मास्को में था, सोवियत संघ के गणराज्यों को बिखरते देख रहा था। बुखारेस्ट में चाउसेस्कू मारे गए थे और भीड़ उन्हें कोसने व उन पर थूकने के लिए उमड़ रही थी। कुछ हफ्ते पहले ही भारतीय वामपंथी दल रोमानिया की कम्युनिस्ट पार्टी की नेशनल कांग्रेस से लौटा था और इसके कुछ सदस्यों ने ‘द पायोनियर’ में लेख लिखा था कि चाउसेस्कू की क्रूरता और नाकामी की सारी खबरें पश्चिमी दुष्प्रचार है। आठ माह बाद उसी साल मैं फिर मास्को में कम्युनिज्म के दिगग्जों की प्रतिमाएं गिराई जाते देख रहा था।


राजनीतिक रूप से अपने 34 वर्षीय शासन में वामपंथ ने बंगाल की अर्थव्यवस्था को नष्ट कर दिया। यह लोकतंत्र व उदारता की बात करता था पर ठगों व वसूली करने वालों की ऐसी सेना इसने बनाई जो किसी विपक्ष को पनपने ही नहीं देती थी। केरल के सभी दलों में समाजवादी चरित्र था। अदल-बदलकर वाम व कांग्रेस आने से कुछ संतुलन स्थापित हुआ पर उद्योग की दृष्टि से ज्यादा कुछ बचा नहीं। 2004 के चुनाव में 59 सीटों ने वामपंथ को राष्ट्रीय ताकत दी पर उन्होंने गंवा दी। तब से उनकी राजनीतिक ताकत घटती जा रही है। लेकिन, यहीं एक पेच है : जहां राष्ट्रीय राजनीतिक ताकत के रूप में उनका पतन हो गया है, एक क्षेत्र में उनकी जीत मुकम्मल है और लगता है कि यह स्थायी है। यह है भारत के आर्थिक विचार और राजनीतिक अर्थव्यवस्था पर उनकी छाप। आज की ध्रुवीकृत राजनीति में यदि कोई एक चीज है, जिस पर भाजपा व कांग्रेस ही नहीं बल्कि अन्य सारे दल सहमत हैं तो यह कि समाजवादी अर्थशास्त्र और गरीबों वाली राजनीति से ही वे बने रह सकते हैं। वामपंथ मर रहा है, इसके आयकन जेसीबी से गिराए जा रहे हैं लेकिन, इसकी आर्थिक विचारधारा का शासन जारी है। नरेंद्र मोदी इसके नवीनतम झंडाबरदार हैं और इंदिरा गांधी के बाद सबसे शक्तिशाली।


प्राग में, जहां वाक्लेव हावेल की वेलवेट क्रांति के तहत साम्यवाद खत्म हो रहा था, आपका ड्राइवर जॉब गंवा चुका न्यूक्लीयर लेब का कंप्यूटर इंजीनियर भी हो सकता था, जैसा कि मेरा ड्राइवर था। उसने पूछा कि भारत में समाजवाद अब भी इतना लोकप्रिय क्यों है और महत्वपूर्ण राज्यों में वे क्यों चुने जाते हैं? फिर उसने खुद ही कारण बताते हुए कहा आपका समाजवाद हमारे समाजवाद से अलग है। हमारे समाजवाद ने राजनीतिक व आर्थिक स्वतंत्रता ले ली, जबकि आपके संस्करण ने राजनीतिक स्वतंत्रता साबूत रखी। जब आपातकाल में इसे ले लिया गया तो आपने वापस पाने के लिए संघर्ष किया। लेकिन, चूंकि आपने कभी आर्थिक आज़ादियों का स्वाद नहीं चखा है तो आप समझ नहीं सकते कि समाजवाद के कारण आपने क्या गंवा दिया है। और आप इन्हें वापस पाने के लिए कभी लड़े भी नहीं।


वह बिल्कुल सही कह रहा था। अब हम गहराई से जमी फर्जी समाजवादी राजनीतिक अर्थव्यवस्था हैं। यह एकमात्र, वास्तविक राष्ट्रीय विचारधारा है। एक दल वामपंथी गढ़ के ढहने का जश्न मना रहा है और जीत की मदहोशी में इसके कार्यकर्ताओं ने लेनिन की एक प्रतिमा गिरा दी। उन्हें जरा भी अहसास नहीं है कि, जिस तानाशाह से वे इतनी नफरत करते हैं अंतिम जीत उसी की है। लेनिन 1924 में मरे, उनके ही देश ने 1990 में उनकी विचारधारा से निजात पा ली। भारत में यह बदस्तूर जारी है, इसे कहीं से कोई चुनौती नहीं है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

शेखर गुप्ता
एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’
Twitter@ShekharGupta

शेखर गुप्ता एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’ शेखर गुप्ता एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’