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2जी घोटाला अदालत में क्यों नहीं टिका ?

राजनीतिकरण के चलते किसी ने जज के सामने एक मजूूबत केस पेश करने का उबाऊ और मेहनती काम करने की परवाह नहीं की।

shekhar gupta | Last Modified - Dec 22, 2017, 05:07 AM IST

  • 2जी घोटाला अदालत में क्यों नहीं टिका ?
    शेखर गुप्ता

    क्या 2जी घोटाले में सारे अभियुक्तों को रिहा करने का मतलब है कि दूरसंचार का कोई घोटाला ही नहीं हुआ? नहीं बिल्कुल नहीं। दूरसंचार घोटाला हुआ था, खुल्लमखुल्ला और बड़ा। बात सिर्फ इतनी है कि राजनीतिकरण के चलते किसी ने जज के सामने एक मजूूबत केस पेश करने का उबाऊ और मेहनती काम करने की परवाह नहीं की। किसी भी अभियोजन खासतौर पर राजनीतिक भ्रष्टाचार के मामले में कुंजी होती है फोकस। आपको बहुत जल्दी यह तय करना होता है कि आपका उद्‌देश्य क्या है। क्या उद्‌देश्य सुर्खिया, शोर, लोगों का रोष है ताकि आप उन पर सवार होकर चुनावी जीत हासिल कर सकें? अथवा दोषी को कटघरे में लाकर वाजिब सजा दिलवाना?


    बार-बार भारतीय राजनीतिक वर्ग दूसरे की बजाय पहले को तरजीह देता रहा है। कोर्ट को भाषण, लीक और ट्वीट नहीं, ठोस सबूत चाहिए। एक क्षेत्रीय दल के कुछ राजनीतिक किरदारों ने स्पेक्ट्रम आवंटन में शायद दसियों करोड़ रुपए कमाए, ऐसा कहने में वह बात कभी नहीं होती जो 1.76 लाख करोड़ रुपए का घोटाला कहने में है। खासतौर पर तब ऐसा माहौल बन गया था कि घोटाले के आंकड़ों में मर्जी मुताबिक जीरो लगाए जाते रहे। इस तरह कोयला 3 लाख करोड़ से ज्यादा का घोटाला तो कॉमनवेल्थ गेम्स 75,000 करोड़ का। ये शून्य लगाने का खेल इतना लुभावना था कि बहुत सतर्क और सही रहने वाले द हिंदू ने भी इसरो-डेवास घोटाले को ‘उजागर’ किया, जिसे इसने कई लाख करोड़ का बताया। जबकि, अंतरिक्ष के मामले में स्पेक्ट्रम मुक्त रूप से इंफीनिटी में उपलब्ध होता है। घोटालों को बढ़ा-चढ़ाकर बताने से नेता चुनाव जीत जाते हैं (जैसे बोफोर्स) लेकिन, दोषी छूट जाते हैं। ज्यादातर मामलों में पैसे सहित छूट जाते हैं, जैसा बोफोर्स मामले में क्वात्रोकि। 2जी मामला सिर्फ नवीनतम उदाहरण है।


    घोटाले का आकार समझा गया 1.76 लाख करोड़ का आंकड़ा देश के जीडीपी का 4.41 फीसदी होता है। यह उस साल के हमारे रक्षा बजट से कुछ अरब डॉल अधिक था। अब सोचिए, थोड़े से स्पेक्ट्रम की इतनी कीमत हो सकती है क्या? क्या भारत का टेलीकॉम सेक्टर इसके लिए इतना पैसा दे सकता था? और यदि ऐसा था तो आपने रक्षा बजट खारिज करके सशस्त्र सेनाओं को यह क्यों नहीं कहा कि वे जो हर साल स्पेक्ट्रम इकट्‌ठा करते जाती हैं उन्हें नीलाम कर दें और जरूरत की सारी तोपें, पनडुब्बियां और जेट खरीद लें। कोयला भी इतना ही क्रूर उदाहरण है। जैसे 2जी, कॉमनवेल्थ गेम्स और अन्य घोटाले थे वैसे ही यूपीए सरकार के तहत कोयले की खदानों के अावंटन में स्कैंडल था। लेकिन, क्या कोयले का हर आवंटन धोखाधड़ी थी? क्या वाकई घाटा लाखों करोड़ों का था, जो विनोद राय के ‘कैग’ का सतही ढंग से किया आकलन था? क्योंकि एनडीए खासतौर पर भाजपा ने बड़ी खुशी से सामने पेश सबसे बड़ा आंकड़ा लपक लिया। नतीजा यह हुआ कि एक बार मामला ‘कोलगेट’ के समय की सरकार के रूप में सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो इसके पास चतुराई दिखाने की गुंजाइश नहीं थी। जब 1993 के बाद के (जिसमें वाजपेयी सरकार के छह साल के कार्यकाल के भी शामिल थे) सारे कोयला आवंटन दरकिनार कर दिए गए तो यह असहाय होकर देखती रही। इसने भाजपा सरकार को पहले बड़े संकट में डाला, जिसका प्रभाव खनन से लेकर बिजली, धातु, सीमेंट लगभग हर सेक्टर पर पड़ा। नया संकट बैंकिंग सेक्टर में पैदा हो रहा है, क्योंकि टेलीकॉम कंपनियों का 8 लाख करोड़ का कर्ज फंस गया है।


    सॉफ्ट बैंक के किंवदंती बन चुके मायासोशी सन भारत में सीरियल निवेशक हैं। 2015 में प्रधानमंत्री मोदी ने उन्हें समय दिया। उन्होंने मोदी से पूछा कि वे भारत में किस तरह का इन्फॉर्मेशन हाईवे बनाएंगे, जबकि दिया गया स्पेक्ट्रम किसी साइकिल ट्रैक से ज्यादा नहीं है। उन्होंने ध्यान दिलाया कि जापान की आबादी 12.76 करोड़ है, जिसके पास 200 मेगाहर्ट्ज का स्पेक्ट्रम है, जबकि दस गुना आबादी के साथ भारत के पास सिर्फ 40 मेगाहर्ट्स है। हमने बुनियादी ढांचे संबंधी मूल आवश्यकता पर मुट्‌ठी इतनी क्यों कस रखी है?


    कारण सरल-सा है। जब कैग ने 2जी स्पेक्ट्रम नीलामी में अनुमानित हानि को 57 हजार करोड़ से 1.76 लाख करोड़ के बीच बताया तो मोदी से लेकर लगभग सारे मीडिया ने सबसे बड़ा आंकड़ा झपट लिया। मीडिया धीरे-धीरे उससे मुक्त हो रहा है लेकिन, भाजपा फंस गई। स्पेक्ट्रम जारी करने के हर दौर में इसे 1.76 लाख करोड़ रुपए के नुकसान की उसी शर्मिंदगी भरी चुनौती का सामना करना पड़ता है, क्योंकि नई नीलामी उसके एक अंश से ज्यादा नहीं दे पाती। इसी कारण और अधिक स्पेक्ट्रम खोलने में संकोच हो रहा है। खुद के पैरों में कुल्हाड़ी मारने का क्लासिक उदाहरण है यह। हम यह दुखद मूवी भूतकाल में भी देख चुके हैं और हमारी तकदीर में इसके सिक्वेल और दोहराव देखना बदा है। वीपी सिंह के नेतृत्व के विपक्ष (भाजपा सहित) ने बोफोर्स को दैत्य बना दिया और भारत को नुकसान हुआ। एक बहुत ही अच्छी शस्त्रप्रणाली बदनाम हो गई, जबकि अब तक न तो किसी को सजा हुई है और न पैसा वसूला जा सका है। एक दुर्घटना (बेंगलुरू में 14 फरवरी 1990) के बाद राजीव गांधी के एयरबस ए-320 के आदेश को घोटाला कहा जाने लगा और वेे विमान खड़े रहे गए। उनकी उड़ान पर लगी पाबंदी हटानी पड़ी क्योंकि खाड़ी युद्ध के दौरान हजारों फंसे पड़े भारतीयों को कुवैत व इराक से स्वदेश लाना था। उन विमानों में कोई गड़बड़ी नहीं थी। वायुसेवा इंडिगो खासतौर पर इसी विमान को उपयोग में लाती है। भ्रष्टाचार के लिए दोषी कभी पकड़े नहीं गए।
    इसी तरह कांग्रेस ने ‘इंडिया शाइनिंग’ के अन्याय और असमानताओं को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया और फिर पूरे दशकभर इसकी कैदी बनी रही। यह अपने ही शासन में हुई आर्थिक वृद्धि का श्रेय नहीं ले पाई। यही कफन घोटाले पर इसके कैम्पेन के साथ हुआ। मतदाता बढ़ते शून्य से प्रभावित होते हैं, जज नहीं। वे तर्कपूर्ण, स्पष्ट सबूत चाहते हैं। आधुनिक कानून में जेल की सजा इससे नहीं बदलती कि अापने 10 करोड़ रुपए चुराए या 10 हजार और चूंकि इससे छोटा कोई आंकड़ा हमें प्रभावित नहीं करता तो 1.76 लाख करोड़ ही क्यों न चुराए हों। आपको सबूत रखने होंगे, सिर्फ जनरोष दिखाने से काम नहीं चलेगा।(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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Web Title: Shekhar Gupta Talking About 2g Scandal
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)

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